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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बड़ा दावा: नेहरू सरकारी पैसे से बाबरी मस्जिद बनवाना चाहते थे, पटेल ने रोक दिया!

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AIN NEWS 1: वडोदरा के पास साधली गांव में आयोजित एक बड़ी जनसभा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती पर उनके योगदान और व्यक्तित्व के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर बात की। ‘एकता मार्च’ के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में राजनाथ सिंह ने स्वतंत्र भारत की राजनीति, नेहरू और पटेल के रिश्तों, और कुछ ऐतिहासिक फैसलों से जुड़ी बातें सामने रखीं। उनके बयानों को लेकर राजनीतिक हलचल भी तेज हो गई है।

🔹 नेहरू का प्रस्ताव और पटेल का विरोध: राजनाथ सिंह का दावा

राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में एक गंभीर दावा करते हुए कहा कि स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद के निर्माण का प्रस्ताव सरकारी खर्च पर रखा था। राजनाथ सिंह के अनुसार यदि उस समय किसी ने इसका खुलकर विरोध किया था, तो वह थे सरदार वल्लभभाई पटेल।

उन्होंने कहा कि पटेल ने स्पष्ट कर दिया था कि सरकारी पैसे से धार्मिक स्थलों का निर्माण नहीं होना चाहिए, और इसी वजह से यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।

राजनाथ सिंह ने यह भी कहा कि पटेल की सोच साफ थी—धर्म का उपयोग राजनीति में या सरकारी तंत्र के माध्यम से नहीं होना चाहिए। उनका मानना था कि जनता अपनी आस्था से जुड़ी चीजें स्वयं तय करे और स्वयं ही उसमें योगदान दे।

🔹 सोमनाथ मंदिर का उदाहरण देकर समझाया अंतर

राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि नेहरू ने एक बार गुजरात में सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार पर सवाल उठाए थे, लेकिन पटेल ने उन्हें स्पष्ट बताया कि मंदिर का पुनर्निर्माण जनता के दान से हो रहा है, सरकारी पैसों से नहीं।

राजनाथ के अनुसार सुधार कार्यों के लिए आवश्यक लगभग 30 लाख रुपये आम लोगों ने दान किए थे, इसलिए इसमें सरकार के पैसे का कोई उपयोग नहीं हुआ।

इस उदाहरण के जरिए राजनाथ सिंह ने यह दिखाने की कोशिश की कि पटेल धार्मिक मुद्दों पर भी बेहद संतुलित और सिद्धांतवादी थे।

🔹 पटेल: लिबरल, सेक्युलर और बिना तुष्टीकरण की राजनीति के नेता

राजनाथ सिंह ने कहा कि पटेल एक सच्चे लिबरल और सेक्युलर नेता थे।

उनका मानना था कि पटेल ने देश की एकता, अखंडता और सामाजिक समरसता के लिए हमेशा कठोर निर्णय लिए, लेकिन कभी तुष्टीकरण की राजनीति नहीं की।

उन्हें हमेशा राष्ट्रहित सबसे ऊपर दिखता था, चाहे वह रियासतों का विलय हो या सामाजिक तनाव से जुड़े मुद्दे।

🔹 प्रधानमंत्री बनने का मौका था, पर सत्ता का लोभ नहीं

रक्षा मंत्री ने अपने भाषण में यह भी कहा कि सरदार पटेल प्रधानमंत्री बन सकते थे, लेकिन उन्होंने कभी पद का लोभ नहीं किया। राजनाथ सिंह ने दावा किया कि 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में अधिकांश प्रदेश कांग्रेस कमेटियों ने पटेल का नाम आगे बढ़ाया था, लेकिन महात्मा गांधी के कहने पर उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया।

इस कदम ने नेहरू को अध्यक्ष बनने का मौका दिया और बाद में वही प्रधानमंत्री बने।

राजनाथ सिंह ने कहा कि विचारधारा के मतभेदों के बावजूद, पटेल ने नेहरू के साथ काम किया क्योंकि वह गांधी के प्रति अपने वचन को निभाना चाहते थे। उन्होंने व्यक्तिगत मतभेदों को राष्ट्रहित से ऊपर कभी नहीं रखा।

🔹 पटेल की स्मृति में जमा धन पर भी विवाद का दावा

अपने भाषण में एक और बड़ा दावा करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि सरदार पटेल की मृत्यु के बाद उनकी याद में जो चंदा जनता से एकत्र किया गया था, उसे लेकर नेहरू ने सुझाव दिया था कि उस पैसे को कुएं और सड़कें बनाने जैसे कामों में लगा दिया जाए।

राजनाथ सिंह के मुताबिक कई लोग इस प्रस्ताव से सहमत नहीं थे, क्योंकि वह धन विशेष रूप से पटेल की स्मृति और उनके नाम से किसी राष्ट्रीय स्मारक या कार्यक्रम के लिए जमा किया गया था।

🔹 इकट्ठे हो रहे हैं नए राजनीतिक प्रश्न

राजनाथ सिंह के इन बयानों ने कई ऐतिहासिक और राजनीतिक बहसों को फिर से जीवित कर दिया है।

नेहरू और पटेल दोनों देश की स्वतंत्रता और प्रशासनिक व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं। दोनों की विचारधाराओं और कार्यशैली पर पहले भी चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन राजनाथ सिंह द्वारा बाबरी मस्जिद और सोमनाथ मंदिर से जुड़े मुद्दों को दोबारा उठाने से नया विवाद खड़ा हो गया है।

राजनीतिक विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ऐसे दावों की पुष्टि के लिए ठोस दस्तावेज़ या ऐतिहासिक प्रमाण होना आवश्यक है। कई इतिहासकारों ने राजनाथ सिंह के इन दावों को लेकर सवाल भी उठाए हैं, जबकि कुछ लोग उनके बयान को उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़कर देखने की सलाह दे रहे हैं।

🔹 सरदार पटेल: आज भी लोगों के दिलों में जीवित

राजनाथ सिंह ने अपने भाषण के अंत में कहा कि सरदार पटेल का पूरा जीवन त्याग, निष्ठा और दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक था। उन्होंने रियासतों को एकजुट कर भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में खड़ा किया।

इसी विरासत को याद करते हुए देश आज उनकी 150वीं जयंती वर्ष को ‘एकता अभियान’ की तरह मना रहा है।

राजनाथ सिंह ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को पटेल के विचारों, उनकी प्रशासनिक क्षमता और उनके राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को समझना चाहिए।

Rajnath Singh’s recent statement alleging that Jawaharlal Nehru proposed using government funds for the Babri Mosque construction, and that Sardar Patel strongly opposed it, has triggered new discussions in Indian politics. The remarks also highlight key differences between Nehru and Patel, including the Somnath Temple restoration, Patel’s leadership, secular values, and his refusal to indulge in appeasement politics. These historical claims have sparked renewed interest in the Babri Masjid history, Patel’s legacy, and political controversies surrounding India’s early leadership.

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