AIN NEWS 1 जबलपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भारत की असली ताकत उसकी एकता और अध्यात्म में है। उन्होंने कहा कि भारत एक ऐसा देश है, जहां विविधता के बावजूद सभी एक सूत्र में बंधे हुए हैं, और इस एकता की डोर को संतों ने सदियों से संभाल रखा है।
डॉ. भागवत सोमवार को जबलपुर के तिलहरी में आयोजित बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था के “जीवन उत्कर्ष महोत्सव” को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने संतों के समाज में योगदान की सराहना की और कहा कि संत ईश्वर का ही अंश होते हैं, जो समाज को सही दिशा दिखाने का कार्य करते हैं।
उन्होंने भावुक स्वर में कहा — “संतों के प्रवचन चलते रहें, इसके लिए हम डंडा लेकर खड़े हैं।”
इस कथन के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि संघ और स्वयंसेवक संतों के मार्गदर्शन और आध्यात्मिक परंपरा के संरक्षण के लिए हरसम्भव प्रयास करते रहेंगे।
संतों की वाणी समाज की शक्ति
मोहन भागवत ने कहा कि संतों की वाणी केवल धार्मिक प्रवचन नहीं होती, बल्कि समाज को दिशा देने वाला सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि “संत हमें यह सिखाते हैं कि जीवन केवल भौतिक नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति का भी नाम है।”
भागवत ने उपस्थित जनसमूह से अपील की कि वे संतों के बताए मार्ग पर चलकर समाज में सद्भाव और एकता को बढ़ावा दें।
उन्होंने कहा, “हमारे देश में संत ही वह शक्ति हैं, जिन्होंने हमें बार-बार जोड़ा है। जब भी समाज में विभाजन की स्थिति बनी, संतों ने अपने वचनों और कर्मों से एकता का संदेश दिया।”
भारत की अनोखी पहचान — जुड़ाव और अध्यात्म
भागवत ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी विशेषता उसका जुड़ाव है। उन्होंने कहा कि “दुनिया के पास बहुत कुछ है, लेकिन जुड़ाव नहीं है। यही वजह है कि दुनिया आज संकट में है और भारत की ओर आशा से देख रही है।”
उन्होंने कहा कि भारत में यह जुड़ाव हमारी संस्कृति, अध्यात्म और संत परंपरा की देन है।
भागवत ने बताया कि भारत का धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक पद्धति है, जो सभी को जोड़ती है। उन्होंने कहा, “सनातन धर्म हमारी सबसे बड़ी ताकत है, और पूरी दुनिया अब इसे सीखना चाहती है।”
संतों के प्रति सेवा भाव
RSS प्रमुख ने कहा कि स्वयंसेवक हमेशा से ही संतों की सेवा में तत्पर रहते हैं। उन्होंने कहा कि संघ की प्रेरणा का मूल भी संतों की शिक्षाओं में निहित है।
भागवत ने कहा, “संतों के प्रवचन और उनके आदर्श समाज के हर वर्ग को जोड़ते हैं। वे समाज के उत्थान के लिए दिशा तय करते हैं, और हमारा दायित्व है कि हम उनके संदेश को जन-जन तक पहुंचाएं।”
उन्होंने संत विभूति प्रमुख स्वामी महाराज की पुस्तक का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी लोगों को उस पुस्तक को पढ़ना चाहिए और उसके सिद्धांतों का अनुकरण करना चाहिए।
उन्होंने कहा, “प्रमुख स्वामी महाराज जैसे संतों ने अपने जीवन से यह दिखाया कि सेवा, करुणा और विनम्रता ही सच्चे धर्म के आधार हैं।”
भारत के लिए संत परंपरा क्यों आवश्यक
मोहन भागवत ने कहा कि भारत का अस्तित्व केवल उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति से है। उन्होंने कहा कि “अगर संस्कृति कमजोर हुई, तो देश भी कमजोर होगा।”
भागवत ने कहा कि भारत का मार्गदर्शन सदियों से संतों और ऋषियों ने किया है, और यही परंपरा आज भी देश की आत्मा को जीवित रखे हुए है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज का समय भले ही तकनीकी और वैज्ञानिक प्रगति का हो, लेकिन अगर आध्यात्मिक दृष्टि खो जाएगी तो मानवता दिशाहीन हो जाएगी। इसलिए संतों के प्रवचन और उनके संदेश समाज को संतुलित और नैतिक बनाए रखते हैं।
संत और भगवान में कोई भेद नहीं
भागवत ने कहा कि “संत और भगवान में कोई अंतर नहीं है। संत भगवान के ही अंश होते हैं, जो समाज के कल्याण के लिए धरती पर अवतरित होते हैं।”
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति संतों की वाणी सुनता है और उस पर अमल करता है, वही सच्चे अर्थों में जीवन की ऊँचाइयों को प्राप्त करता है।
भारत ही दुनिया की आशा
अपने संबोधन के अंत में मोहन भागवत ने कहा कि आज पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है, क्योंकि भारत ही वह देश है जो धर्म और संस्कृति के आधार पर चल रहा है।
उन्होंने कहा कि “भारत के पास ही वह सनातन दृष्टि है जो सबको साथ लेकर चल सकती है। दुनिया के पास भारत के अलावा कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि भारत ही वह भूमि है जो सबको जोड़ती है।”
भागवत ने सभी से आग्रह किया कि वे अपने भीतर संतों की शिक्षाओं को अपनाएं और समाज में शांति, एकता और प्रेम का संदेश फैलाएं।
In his address at the Jeevan Utkarsh Mahotsav in Jabalpur, RSS Chief Mohan Bhagwat emphasized the importance of saints and their role in shaping society. He said, “We stand with a stick to ensure that saints’ discourses continue,” highlighting that saints embody divine energy and guide people toward righteousness. Bhagwat reiterated that India’s spiritual unity and Sanatan Dharma are the core strengths that make the nation a beacon for the world. He called upon citizens to follow the teachings of saints and uphold India’s eternal values of harmony, service, and faith.



















