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संभल हिंसा मामला: युवक को गोली लगने पर CJM कोर्ट का बड़ा आदेश, ASP अनुज चौधरी समेत पुलिसकर्मियों पर FIR के निर्देश!

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AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश के संभल जिले से जुड़ा हिंसा का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस बार वजह है अदालत का वह सख्त आदेश, जिसमें पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। संभल की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) विभांशु सुधीर की अदालत ने हिंसा के दौरान एक युवक को गोली लगने के मामले में ASP अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज तोमर सहित कुल 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं।

यह आदेश ऐसे समय आया है जब अक्सर पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठने पर जांच लंबी खिंच जाती है। ऐसे में अदालत का यह कदम पीड़ित परिवार के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

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🔴 क्या है पूरा मामला?

यह मामला नवंबर 2024 में संभल में हुई हिंसा से जुड़ा है। उस दौरान हालात काफी तनावपूर्ण हो गए थे और पुलिस बल को हालात संभालने के लिए मैदान में उतरना पड़ा था। इसी बीच एक युवक को गोली लग गई थी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया।

युवक के पिता का आरोप है कि उनके बेटे को गोली किसी अपराधी या उपद्रवी ने नहीं, बल्कि पुलिस फायरिंग के दौरान लगी। उनका कहना है कि पुलिस ने बिना चेतावनी और बिना किसी ठोस कारण के गोली चलाई, जिसका शिकार उनका बेटा हुआ।

🔴 पिता ने कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया?

पीड़ित युवक के पिता का कहना है कि घटना के बाद उन्होंने स्थानीय थाने और पुलिस अधिकारियों से कई बार शिकायत की, लेकिन पुलिस ने अपने ही अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया।

जब कहीं सुनवाई नहीं हुई, तब मजबूर होकर उन्होंने न्यायालय में याचिका दायर की। याचिका में साफ तौर पर कहा गया कि यह मामला गंभीर है और इसमें पुलिस अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

🔴 अदालत ने क्या कहा?

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विभांशु सुधीर ने याचिका पर सुनवाई के दौरान उपलब्ध तथ्यों और मेडिकल रिपोर्ट्स को देखा। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता के आरोप सिर्फ आरोप भर नहीं हैं, बल्कि प्रथम दृष्टया जांच के योग्य हैं।

इसी आधार पर अदालत ने धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। आदेश में ASP अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज तोमर और अन्य पुलिसकर्मियों के नाम शामिल हैं, जबकि कुछ पुलिसकर्मी अज्ञात भी बताए गए हैं।

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🔴 किन अधिकारियों पर लगे हैं आरोप?

अदालत के आदेश में जिन अधिकारियों का उल्लेख है, उनमें शामिल हैं:

तत्कालीन ASP / CO अनुज चौधरी

इंस्पेक्टर अनुज तोमर

अन्य 10 से अधिक पुलिसकर्मी (नाम जांच के बाद स्पष्ट होंगे)

इन सभी पर आरोप है कि इन्होंने हिंसा के दौरान नियमों का पालन किए बिना फायरिंग की।

🔴 पुलिस प्रशासन का क्या कहना है?

इस पूरे मामले पर पुलिस प्रशासन की भी प्रतिक्रिया सामने आई है। संभल पुलिस का कहना है कि घटना की पहले ही न्यायिक जांच हो चुकी है, जिसमें पुलिस कार्रवाई को सही ठहराया गया था।

पुलिस अधिकारियों का दावा है कि:

फायरिंग हालात को काबू में करने के लिए की गई

गोली किसकी तरफ से चली, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं

कोर्ट के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की जाएगी

हालांकि, अदालत के आदेश के बाद अब यह मामला पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगा।

🔴 क्यों अहम है यह आदेश?

भारत में अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि क्या पुलिस पर भी कानून उसी तरह लागू होता है जैसे आम नागरिक पर? संभल मामले में अदालत का यह आदेश इसी सवाल का जवाब देता नजर आता है।

यह आदेश इसलिए भी अहम है क्योंकि:

यह पुलिस जवाबदेही की मिसाल बन सकता है

पीड़ित परिवार को न्याय की उम्मीद मिली है

यह दिखाता है कि अदालतें स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकती हैं

🔴 आगे क्या होगा?

अब आगे की प्रक्रिया में:

संबंधित थाने में एफआईआर दर्ज की जानी है

मामले की निष्पक्ष जांच होगी

जांच में दोषी पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई होगी

पुलिस की अपील पर उच्च अदालत फैसला ले सकती है

फिलहाल मामला न्यायिक प्रक्रिया में है और अंतिम सच जांच के बाद ही सामने आएगा।

संभल हिंसा मामले में CJM कोर्ट का यह आदेश सिर्फ एक एफआईआर का निर्देश नहीं है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था की मजबूती और निष्पक्षता का संकेत भी है। चाहे आरोपी आम नागरिक हो या वर्दी में कोई अधिकारी, कानून सबके लिए बराबर है — यही इस आदेश का सबसे बड़ा संदेश है।

अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि जांच किस दिशा में जाती है और क्या पीड़ित परिवार को इंसाफ मिल पाता है या नहीं।

The Sambhal violence case has taken a significant legal turn as the CJM court ordered an FIR against ASP Anuj Chaudhary and other police officers over alleged police firing that injured a youth. This development highlights growing concerns about police accountability in India and underscores the role of courts in ensuring justice in cases involving law enforcement actions during riots or violence.

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