AIN NEWS 1: सुप्रीम कोर्ट ने पांच लापता रोहिंग्या नागरिकों का पता लगाने संबंधी याचिका पर सुनवाई करते हुए बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साफ कहा कि सीमा से जुड़े मुद्दे साधारण नहीं होते और इन्हें सामान्य दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिकाकर्ता से सीधे सवाल करते हुए कहा—“क्या हम उनके लिए लाल कालीन बिछा दें?” यह टिप्पणी साफ संकेत देती है कि अदालत ऐसे मामलों को राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से अत्यंत गंभीरता के साथ देख रही है।

राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि: अदालत ने कही स्पष्ट बात
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सीमा सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि सीमा क्षेत्र बेहद संवेदनशील होते हैं। वहां कोई भी गतिविधि, चाहे वह मानव तस्करी हो, अवैध घुसपैठ हो या संदिग्ध व्यक्तियों की आवाजाही, देश की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है। इसलिए ऐसे इलाकों में अतिरिक्त सतर्कता और सख्त निगरानी अनिवार्य है।
अदालत के अनुसार, जब मामला सीमा पार से आए लोगों या अवैध प्रवासियों का हो, तो राज्यों और केंद्रीय एजेंसियों को मिलकर निर्णय लेना चाहिए, क्योंकि इससे सुरक्षा तंत्र पर सीधा असर पड़ता है। पाँच रोहिंग्या नागरिकों के गायब होने की बात सामने आने पर अदालत ने कहा कि यह सिर्फ गायब होने का मामला नहीं है, बल्कि सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
अदालत का सवाल—सरकार को लापरवाही क्यों दिखानी चाहिए?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से बेहद सीधे और सख्त लहजे में पूछा कि आखिर अदालत राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में हस्तक्षेप कैसे कर सकती है? उन्होंने कहा:
“क्या हम सरकार को कहें कि हर किसी को सीमा पार आने दें? क्या हमें उनके लिए लाल कालीन बिछा देना चाहिए?”
यह टिप्पणी इस बात का संकेत है कि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में न्यायपालिका का दखल सीमित होना चाहिए, क्योंकि सुरक्षा संबंधी मामलों की समझ और जिम्मेदारी कार्यपालिका पर होती है।
याचिकाकर्ता ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ये पाँच रोहिंग्या नागरिक रहस्यमय तरीके से गायब हो गए हैं और उन्हें सुरक्षा एजेंसियों द्वारा हिरासत में लिए जाने की आशंका है। इसलिए अदालत को हस्तक्षेप कर उनके बारे में जानकारी जुटाने का निर्देश देना चाहिए।
याचिकाकर्ता का कहना था कि मानवाधिकारों की रक्षा भी आवश्यक है और किसी भी व्यक्ति को बिना कानूनी प्रक्रिया के गायब नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि लापता रोहिंग्याओं के परिवार बेहद परेशान हैं और उन्हें अपने परिजनों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल रही है।
सुप्रीम कोर्ट का जवाब—मानवाधिकार ज़रूरी, लेकिन…
अदालत ने मानवाधिकारों के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति के साथ कानून के अनुसार व्यवहार होना चाहिए। लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब मामला देश की सुरक्षा का हो तो कोई भी ढील नहीं दी जा सकती।
चीफ जस्टिस ने कहा कि रोहिंग्या समुदाय की स्थिति को लेकर पहले भी कई बार अदालतें विचार कर चुकी हैं, और यह भी ध्यान में रखा गया है कि म्यांमार से आने वाले रोहिंग्या नागरिक बिना वैध दस्तावेजों के भारत में प्रवेश करते हैं, जिससे सुरक्षा खतरे बढ़ जाते हैं।
सीमा क्षेत्र की संवेदनशीलता पर अदालत का जोर
अदालत ने सीमा क्षेत्रों को लेकर कहा कि इन इलाकों में तैनात सुरक्षा एजेंसियों के पास जमीन की स्थिति और जोखिम की सही जानकारी होती है। इसलिए अदालत उनके निर्णयों को हल्के में नहीं ले सकती। अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि याचिकाकर्ता के दावों की पुष्टि कैसे की जाए, और क्या यह सिर्फ एक पक्ष की सुनाई गई कहानी है या इसके पीछे कोई ठोस सबूत भी हैं?
सरकार को नोटिस या निर्देश देने से पहले अदालत की सावधानी
बेंच ने कहा कि वह इस तरह के मामलों में बिना पूरे तथ्यों और सरकारी रिपोर्ट के कोई आदेश जारी नहीं कर सकती। अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह की याचिकाएँ कई बार सुरक्षा एजेंसियों के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप का कारण बन जाती हैं, जिससे गलत संदेश जाता है।
रोहिंग्या मुद्दा क्यों संवेदनशील है?
भारत में रोहिंग्या नागरिकों के प्रवेश को लेकर सरकार लंबे समय से सख्त रुख अपनाए हुए है। सरकार का तर्क है कि इनमें से कई व्यक्ति सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकते हैं, क्योंकि कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में ऐसे कथित लिंक सामने आए हैं, जिनमें कट्टरपंथी संगठनों की भूमिका का उल्लेख है। ऐसे में अदालतें भी सावधानी बरत रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कुछ साल पहले भी केंद्र सरकार को अनुमति दी थी कि वह रोहिंग्या नागरिकों की पहचान कर उन्हें वापस भेजने या उनके ठहराव को नियंत्रित करने के लिए कठोर कदम उठा सकती है।
अगली सुनवाई में क्या होगा?
अदालत ने फिलहाल मामले पर विस्तृत सुनवाई के लिए केंद्र सरकार से प्रतिक्रिया मांगी है। सरकार से पूछा गया है कि क्या किसी एजेंसी ने इन पाँच रोहिंग्या नागरिकों को हिरासत में लिया है या वे वास्तव में लापता हैं।
अगली सुनवाई में केंद्र से स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने की उम्मीद है। इसके बाद अदालत फैसला करेगी कि इस मामले में आगे किस प्रकार की कार्रवाई आवश्यक है।
The Supreme Court of India has taken a strict stance regarding the petition to trace five missing Rohingya individuals, emphasizing national security, border area sensitivity, and the need for government caution in handling such cases. With CJI Surya Kant questioning the petitioner sharply, the case highlights the growing concern around illegal migration, Rohingya refugees, and security risks along India’s borders.






