AIN NEWS 1: मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने पोक्सो (POCSO) अधिनियम की व्याख्या और किशोर सुरक्षा के दृष्टिकोण पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी लड़की की उम्र 18 साल होने में केवल कुछ दिन बचे हों और वह अपनी मर्जी से किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाए, तो इसे पोक्सो कानून के अंतर्गत अपराध नहीं माना जाएगा।
यह मामला कोयंबटूर की निचली अदालत का था, जिसने पहले आरोपी को पांच साल की सजा सुनाई थी। आरोपी ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, और न्यायमूर्ति जी.के. इलांथिरायन ने निचली अदालत के आदेश को पलट दिया।
मामला कैसे शुरू हुआ?
इस मामले की शुरुआत तब हुई जब एक युवक और एक लड़की, जिनके बीच प्रेम संबंध थे, ने आपसी सहमति से संबंध बनाए। लड़की की उम्र उस समय 18 साल से कुछ दिन कम थी। लड़की के परिवार ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद युवक पर पोक्सो अधिनियम और आईपीसी की धारा 363 (किसी को बहला-फुसलाकर या जबरन भगाना) के तहत मामला दर्ज किया गया।
निचली अदालत ने आरोपी को दोषी मानते हुए पांच साल की सजा सुनाई। लेकिन हाईकोर्ट ने मामले की पुन: समीक्षा करते हुए कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को ध्यान में रखा।
हाईकोर्ट का निर्णय
मद्रास हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जी.के. इलांथिरायन ने निर्णय सुनाते हुए कहा कि:
पीड़िता उस समय अपने कार्यों के परिणाम को समझने में सक्षम थी।
मामले में बहलाने-फुसलाने या जबरदस्ती का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला।
पीड़िता के परिवार को पहले से ही उनके प्रेम संबंध की जानकारी थी।
इस स्थिति में आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 363 लागू नहीं होती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब लड़की अपनी मर्जी और समझ के साथ संबंध बनाती है और उसकी उम्र 18 साल पूरी होने में केवल कुछ दिन ही शेष हैं, तो ऐसे मामलों को पोक्सो अपराध नहीं माना जा सकता।
पोक्सो कानून और इस फैसले का महत्व
पोक्सो अधिनियम (Protection of Children from Sexual Offences Act) का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना है। अधिनियम के अनुसार 18 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ यौन संबंध अपराध हैं, चाहे वे सहमति से ही क्यों न हों।
लेकिन इस मामले में हाईकोर्ट ने परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए कहा कि अगर लड़की अपनी समझ से निर्णय ले रही है और उम्र लगभग 18 साल है, तो इसे अपराध की श्रेणी में रखना न्यायसंगत नहीं होगा।
कानूनी विशेषज्ञ की राय
हमने इस मामले पर वरिष्ठ वकील अर्जुन मेहता से बात की। उन्होंने कहा:
“हाईकोर्ट ने जिस तरह से इस मामले को देखा, वह केस के वास्तविक तथ्यों पर आधारित था। यह फैसला यह संकेत देता है कि न्यायपालिका पोक्सो कानून को कठोरता से लागू करने में परिस्थितियों को भी ध्यान में रखती है। हालांकि, इसे सामान्य नियम नहीं माना जा सकता। हर केस अलग होता है और उच्च न्यायालय के फैसले केवल उस विशिष्ट मामले के लिए होते हैं।”
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला प्रिसिडेंट के रूप में देखा जा सकता है और आने वाले समय में ऐसे मामलों में अदालतों की व्याख्या को प्रभावित कर सकता है।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया
महिला अधिकार कार्यकर्ता नीलम वर्मा कहती हैं:
“यह निर्णय यह दिखाता है कि किशोरों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी है। जबकि कानून बच्चों को सुरक्षित रखने का प्रयास करता है, अदालत ने देखा कि लड़की अपनी मर्जी और समझ के साथ निर्णय लेने में सक्षम थी। समाज को भी यह समझना होगा कि प्रेम संबंध और सहमति पर आधारित मामलों में कानून की कठोरता हमेशा न्यायसंगत नहीं होती।”
नीलम ने यह भी जोड़ा कि ऐसे फैसले समाज में किशोरों और युवाओं के अधिकारों की समझ बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
समाज और परिवार की भूमिका
इस मामले से यह भी स्पष्ट हुआ कि परिवार और समाज की जागरूकता महत्वपूर्ण है। अदालत ने पाया कि पीड़िता के परिवार को उसके प्रेम संबंध की जानकारी थी। यह दर्शाता है कि केवल कानून के माध्यम से नहीं, बल्कि परिवार और समाज की समझ से भी किशोरों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
विशेषज्ञों का संतुलित दृष्टिकोण
कानूनी और सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला केवल तथ्य-आधारित है। यदि पीड़िता की उम्र कई साल कम होती या उसमें सहमति नहीं होती, तो पोक्सो अधिनियम स्वतः लागू होता।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि कानून के तहत किशोरों की सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन परिस्थितियों का न्यायिक मूल्यांकन भी जरूरी है।
फैसले का निष्कर्ष
मद्रास हाईकोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि:
1. उम्र 18 साल के करीब होने पर सहमति से यौन संबंध पोक्सो अधिनियम के तहत अपराध नहीं होंगे।
2. बहलाने-फुसलाने या जबरदस्ती के प्रमाण होना जरूरी है।
3. परिवार की जानकारी और लड़की की समझ महत्वपूर्ण मानी गई।
यह फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों में मार्गदर्शन देगा, जहां सहमति और उम्र के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता है।
The Madras High Court delivered a landmark ruling on the POCSO Act, stating that if a girl is only a few days away from turning 18 and engages in a consensual relationship, it should not be treated as a criminal offence. The court clarified that there was no evidence of coercion, fraud, or force, and the victim’s family was aware of the relationship. This decision highlights the balance between child protection and personal consent and may influence future legal interpretations of consent law in India.


















