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बिहार में माताओं के दूध में यूरेनियम की मौजूदगी का खुलासा: दूषित पानी से बढ़ रही स्वास्थ्य चिंता

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AIN NEWS 1 | बिहार से सामने आई एक नई वैज्ञानिक रिपोर्ट ने लोगों को गहरी चिंता में डाल दिया है। पटना स्थित महावीर कैंसर संस्थान और दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन में यह पाया गया है कि राज्य की कई महिलाओं के स्तन के दूध में यूरेनियम की मौजूदगी है। यह खोज न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि नवजात बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे का संकेत भी देती है।

यह अध्ययन राज्य के छह जिलों—कटिहार, बेगूसराय, खगड़िया, भोजपुर, समस्तीपुर और नालंदा—में हाल ही में मातृत्व प्राप्त महिलाओं के 40 नमूनों पर आधारित है। हर नमूने में यूरेनियम की उपस्थिति ने विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है।

अध्ययन कैसे किया गया?

शोधकर्ताओं ने विभिन्न जिलों से महिलाओं के दूध के नमूने एकत्र किए और AIIMS दिल्ली में उन्नत तकनीकों की मदद से उनका विश्लेषण किया। जांच प्रक्रिया बेहद संवेदनशील रही और नतीजों ने स्पष्ट दिखाया कि यह समस्या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है।

रिपोर्ट बताती है कि यूरेनियम का स्तर उन सीमाओं के काफी करीब या अधिक है जो मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानी जाती हैं। इस खोज ने सरकारी संस्थानों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का ध्यान तुरंत अपनी ओर खींचा है।

यूरेनियम दूध तक कैसे पहुंच रहा है?

विशेषज्ञों के अनुसार, इसका सबसे बड़ा कारण है दूषित भूजल

बिहार के लाखों लोग पीने और घरेलू जरूरतों के लिए भूमिगत पानी पर निर्भर हैं। कई जिलों में पहले भी आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन की अत्यधिक मात्रा पाई गई है। अब यूरेनियम की मिलावट इस संकट को और गंभीर बनाती है।

यूरेनियम शरीर में इन माध्यमों से पहुंच सकता है:

  • पीने का दूषित पानी

  • उसी पानी से सिंचाई की गई सब्जियाँ

  • दूषित मिट्टी से आने वाले रसायन

  • लंबे समय तक भारी धातुओं से प्रभावित खान-पान

गर्भावस्था और प्रसव के बाद महिलाएँ जो भी पानी और भोजन ग्रहण करती हैं, उसका प्रभाव सीधे स्तन के दूध पर पड़ता है। इसी कारण नवजात शिशुओं तक यह रेडियोधर्मी तत्व पहुँच जा रहा है।

नवजात शिशुओं के लिए कितना खतरनाक?

नवजात बच्चों का शरीर बेहद संवेदनशील होता है। उनकी किडनी, दिमाग और अन्य अंग तेजी से विकसित हो रहे होते हैं। ऐसे में किसी भी जहरीले तत्व का असर अधिक गंभीर हो जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार:

  • बच्चों में किडनी संबंधी समस्याएँ बढ़ सकती हैं

  • न्यूरोलॉजिकल विकास प्रभावित हो सकता है

  • सीखने और समझने की क्षमता पर असर

  • लंबे समय में कैंसर का खतरा

  • इम्यून सिस्टम कमजोर हो सकता है

हालाँकि डॉक्टरों ने स्पष्ट कहा है कि यह स्थिति चिंता का विषय है, पर इसका मतलब यह नहीं कि स्तनपान बंद कर दिया जाए। माँ का दूध अभी भी बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित और आवश्यक भोजन है।

डॉक्टरों और विशेषज्ञों की सलाह

अध्ययन के बाद डॉक्टरों ने महिलाओं के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं:

✓ शुद्ध पानी का उपयोग

केवल RO नहीं, बल्कि ऐसा फिल्टर उपयोग करें जो भारी धातुओं को भी निकाल सके। सीधे हैंडपंप और नल का पानी पीने से बचें।

✓ सब्जियाँ अच्छी तरह धोकर पकाएँ

क्योंकि दूषित पानी से उगाई गई सब्जियों में भी यूरेनियम मौजूद हो सकता है।

✓ स्तनपान बंद करने का निर्णय खुद न लें

केवल डॉक्टर की सलाह पर ही ऐसा कोई कदम उठाएँ।

✓ सरकारी स्तर पर तुरंत जांच

जिन जिलों में यह समस्या मिली है, वहाँ पानी और मिट्टी की व्यापक जांच बेहद जरूरी है।

क्या यह समस्या अचानक उत्पन्न हुई?

वास्तव में नहीं। बिहार में पानी की गुणवत्ता लंबे समय से चुनौती रही है। कई वर्षों से अलग-अलग संगठनों की रिपोर्टों में यह सामने आता रहा है कि गंगा के आसपास बसे जिलों में मिट्टी और पानी में भारी धातुओं की मात्रा बढ़ रही है।

इसका कारण कई हो सकते हैं:

  • भूगर्भीय बदलाव

  • गहरे ट्यूबवेल से पानी खींचना

  • औद्योगिक कचरे का अनियंत्रित प्रवाह

  • फसलों में रसायनयुक्त खाद और कीटनाशक

यूरेनियम का मिलना इस लंबे समय से चली आ रही समस्या की गंभीरता को और बढ़ा देता है।

स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया

रिपोर्ट सामने आने के बाद लोग डर और असमंजस में हैं। कई परिवारों ने बताया कि उन्हें कभी अंदाज़ा भी नहीं था कि उनके घर का पीने का पानी इस हद तक खतरनाक हो सकता है। कुछ इलाकों में लोग बोतल का पानी खरीदने लगे हैं। सामाजिक संगठनों ने भी सरकार से सुरक्षित पानी उपलब्ध कराने की मांग की है।

आगे क्या कदम उठाए जाने चाहिए?

विशेषज्ञों के अनुसार यह रिपोर्ट केवल चेतावनी नहीं है—यह आने वाले वक्त में बड़े स्वास्थ्य संकट का संकेत है।

इसके लिए आवश्यक कदम:

  • राज्य सरकार को बड़े स्तर पर पानी की जांच अभियान शुरू करना चाहिए

  • प्रभावित क्षेत्रों में RO आधारित सामुदायिक जल केंद्र बनाए जाएँ

  • कृषि विभाग को मिट्टी और सब्जियों की जांच करनी चाहिए

  • गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित पानी उपलब्ध कराने के लिए विशेष योजनाएँ बनाई जाएँ

  • लगातार मॉनिटरिंग और हेल्थ सर्वे किए जाएँ

यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में हजारों परिवारों को इसके दुष्परिणाम झेलने पड़ सकते हैं।

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