AIN NEWS 1: प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान एक बड़ा धार्मिक-प्रशासनिक विवाद सामने आया है। ज्योतिष्पीठ से जुड़े शंकराचार्य पद को लेकर मेला प्रशासन और अविमुक्तेश्वरानंद के बीच तनातनी अब औपचारिक नोटिस तक पहुंच गई है। माघ मेला प्राधिकरण ने अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी करते हुए 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा है और सवाल उठाया है कि वे किस आधार पर स्वयं को ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य बता रहे हैं।
यह पूरा मामला मौनी अमावस्या के दिन हुए घटनाक्रम के बाद और गंभीर हो गया। उस दिन प्रयागराज माघ मेले में स्नान पर्व के दौरान यूपी सरकार के गृह सचिव मोहित गुप्ता, मेला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी और अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के बीच विवाद हो गया था। आरोप है कि इस दौरान अधिकारियों और शिष्यों के बीच तीखी नोक-झोंक हुई, और शिष्यों के साथ कथित रूप से मारपीट भी की गई।
मौनी अमावस्या की घटना से बढ़ा तनाव
मौनी अमावस्या माघ मेले का सबसे पवित्र और संवेदनशील स्नान पर्व माना जाता है। लाखों श्रद्धालु इस दिन संगम में डुबकी लगाने पहुंचते हैं। ऐसे में प्रशासन और धार्मिक संगठनों के बीच समन्वय बेहद अहम होता है। लेकिन इसी दिन अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर के बाहर हालात बिगड़ गए। विवाद के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने न केवल मौनी अमावस्या का स्नान करने से इनकार कर दिया, बल्कि प्रशासन के खिलाफ खुले विरोध का रास्ता भी चुन लिया।
घटना के बाद से वे अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठे हैं। उनका कहना है कि प्रशासन ने उनके शिष्यों के साथ अनुचित व्यवहार किया और धार्मिक मर्यादाओं का उल्लंघन हुआ। वहीं प्रशासन का पक्ष इससे अलग बताया जा रहा है।
मेला प्रशासन का नोटिस और कानूनी आधार
अब इस विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। मेला प्राधिकरण की ओर से भेजे गए नोटिस में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश का हवाला दिया गया है। नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि जब तक हाईकोर्ट द्वारा ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य पद से जुड़े पट्टाभिषेक को लेकर कोई अंतिम या अग्रिम आदेश पारित नहीं किया जाता, तब तक कोई भी व्यक्ति स्वयं को ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य घोषित नहीं कर सकता।
नोटिस में अविमुक्तेश्वरानंद से यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि वे किस कानूनी या धार्मिक प्रक्रिया के तहत खुद को शंकराचार्य बता रहे हैं। प्रशासन ने इस जवाब के लिए 24 घंटे की समयसीमा तय की है, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया है।
ज्योतिष्पीठ और शंकराचार्य पद का महत्व
ज्योतिष्पीठ चार प्रमुख शंकराचार्य पीठों में से एक माना जाता है, जिसकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी। इस पद का धार्मिक, दार्शनिक और सामाजिक महत्व अत्यंत गहरा है। शंकराचार्य न केवल एक धार्मिक गुरु होते हैं, बल्कि सनातन परंपरा के संरक्षक भी माने जाते हैं। ऐसे में इस पद को लेकर किसी भी तरह का विवाद स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन जाता है।
प्रशासन बनाम धर्माचार्य — संतुलन की चुनौती
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। एक ओर प्रशासन कानून और न्यायालय के आदेशों का पालन कराने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अविमुक्तेश्वरानंद अपने साथ हुए व्यवहार को सम्मान और आस्था से जोड़कर देख रहे हैं।
उनके समर्थकों का कहना है कि यह सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि धार्मिक स्वायत्तता का भी सवाल है। वहीं प्रशासन का तर्क है कि सार्वजनिक आयोजन और मेले में कानून का पालन सर्वोपरि है, चाहे वह कोई भी व्यक्ति या पद क्यों न हो।
आगे क्या?
अब सबकी निगाहें अविमुक्तेश्वरानंद के जवाब पर टिकी हैं। 24 घंटे के भीतर दिया जाने वाला उनका उत्तर यह तय करेगा कि यह मामला आगे किस दिशा में बढ़ेगा—क्या यह कानूनी लड़ाई का रूप लेगा या किसी संवाद और समाधान की राह निकलेगी।
फिलहाल प्रयागराज माघ मेला इस विवाद के कारण धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रशासनिक और कानूनी बहस का केंद्र बन गया है।
The Prayagraj Magh Mela has witnessed a major controversy after the administration issued a notice to Avimukteshwaranand questioning his claim as the Shankaracharya of Jyotishpeeth. Citing an Allahabad High Court order, officials have asked him to respond within 24 hours, stating that no religious leader can claim the Jyotishpeeth Shankaracharya title without a court-approved Pattabhishek. The dispute escalated after an alleged clash between officials and his disciples on Mauni Amavasya, bringing legal and religious questions to the forefront during the Magh Mela.




















