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CBSE के त्रिभाषा नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, केंद्र और बोर्ड से जवाब तलब!

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AIN NEWS 1: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (Central Board of Secondary Education) द्वारा नई शिक्षा नीति (National Education Policy 2020) के तहत लागू किए गए त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। कक्षा 9वीं और 10वीं में तीन भाषाओं को अनिवार्य किए जाने के फैसले पर अब कानूनी चुनौती सामने आ गई है।

इस मामले में दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court of India) ने केंद्र सरकार और CBSE दोनों से जवाब तलब किया है। अदालत ने इस नीति के प्रभावों को गंभीर मानते हुए सभी पक्षों को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

क्या है विवाद की वजह?

CBSE ने हाल ही में घोषणा की है कि आगामी शैक्षणिक सत्र से कक्षा 9 और 10 के छात्रों को तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य होगा। इनमें दो भाषाएं भारतीय मूल की होना जरूरी बताया गया है। इसके अलावा तीसरी भाषा के रूप में विदेशी भाषा का विकल्प केवल कुछ शर्तों के साथ उपलब्ध होगा।

इस नए नियम को लेकर छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच असंतोष देखने को मिल रहा है। कई लोगों का मानना है कि बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी के बीच अचानक अतिरिक्त भाषाओं का दबाव छात्रों पर मानसिक बोझ बढ़ा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में कहा गया है कि यह नीति छात्रों के शैक्षणिक विकास पर असर डाल सकती है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कक्षा 10 जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा के दौरान भाषा भार बढ़ाना छात्रों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।

मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि इस नीति के व्यापक प्रभावों को समझना आवश्यक है। अदालत ने केंद्र सरकार और CBSE से पूछा है कि इस निर्णय को लागू करने का आधार क्या है और इसका छात्रों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

हालांकि अदालत ने फिलहाल इस नियम पर किसी भी प्रकार की अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया है। इसका मतलब है कि नीति अभी लागू रह सकती है, लेकिन मामले की आगे विस्तृत सुनवाई जारी रहेगी।

त्रिभाषा फॉर्मूले पर बहस क्यों?

भारत में शिक्षा नीति के तहत लंबे समय से त्रिभाषा फॉर्मूला चर्चा में रहा है। इसका उद्देश्य छात्रों को बहुभाषी बनाने और क्षेत्रीय भाषाओं के साथ-साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय भाषाओं को बढ़ावा देना बताया जाता है।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि हर राज्य और क्षेत्र की अपनी भाषाई विविधता होती है, ऐसे में एक समान नियम सभी छात्रों पर लागू करना व्यावहारिक नहीं हो सकता। विशेषकर उन राज्यों में जहां पहले से ही दो भाषाओं का संतुलन बना हुआ है, वहां तीसरी भाषा जोड़ना अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकता है।

छात्रों और अभिभावकों की चिंता

इस नीति को लेकर छात्रों और अभिभावकों में सबसे बड़ी चिंता परीक्षा के दबाव को लेकर है। कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा पहले से ही एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जाती है, ऐसे में अतिरिक्त विषय जोड़ने से छात्रों की तैयारी प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

कई शिक्षकों का भी कहना है कि यदि भाषा नीति को लागू करना ही है तो इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए ताकि छात्रों को अनुकूलन का समय मिल सके।

सरकार और CBSE की भूमिका

अब केंद्र सरकार और CBSE से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे इस नीति के पीछे के शैक्षणिक और प्रशासनिक कारणों को स्पष्ट करें। अदालत में दिए जाने वाले जवाब से यह तय होगा कि आगे इस नियम में कोई बदलाव होगा या नहीं।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक नियम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की शिक्षा प्रणाली और भाषा नीति की दिशा को भी प्रभावित कर सकता है।

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई के मध्य में तय की है। तब तक केंद्र और CBSE को अपने जवाब दाखिल करने होंगे। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि इस नीति को जारी रखा जाए, संशोधित किया जाए या उस पर रोक लगाने की आवश्यकता है।

फिलहाल छात्रों के लिए यह नियम लागू माना जा रहा है, लेकिन अंतिम निर्णय अदालत की सुनवाई के बाद ही सामने आएगा।

The ongoing debate over the CBSE three-language policy under the National Education Policy 2020 has reached the Supreme Court of India, where students and parents have challenged the new academic requirement for Classes 9 and 10. The Supreme Court has issued notices to both the central government and CBSE seeking clarification on the implementation and impact of the policy. The case has become a significant topic in Indian education reform discussions, focusing on student academic pressure, multilingual education, and curriculum structure changes in schools across the country.

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