AIN NEWS 1: प्रयागराज में आयोजित माघ मेला हमेशा से आस्था, साधना और सनातन परंपराओं का प्रतीक रहा है। लेकिन इस बार यह धार्मिक आयोजन एक बड़े विवाद की वजह से चर्चा में आ गया है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच हुआ टकराव अब सिर्फ एक मामूली बहस नहीं रह गया, बल्कि यह प्रशासनिक कार्रवाई, नोटिस और संभावित प्रतिबंधों तक पहुंच गया है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
मामले की शुरुआत तब हुई जब माघ मेला के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों और पुलिस प्रशासन के बीच झड़प की खबर सामने आई। बताया गया कि मेला क्षेत्र में प्रवेश और आवागमन को लेकर कुछ निर्देशों का पालन नहीं किया गया, जिस पर पुलिस ने रोकने की कोशिश की। इसी दौरान विवाद बढ़ गया और मामला सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया।
मेरठ के उजैद कुरैशी का आतंकी कनेक्शन, अलकायदा से जुड़ाव की जांच तेज
मेला अथॉरिटी के दो नोटिस क्यों अहम हैं?
अब इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ है कि मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक नहीं बल्कि दो अलग-अलग नोटिस भेजे थे।
पहला नोटिस मेला नियमों के उल्लंघन से जुड़ा था, जिसमें प्रशासन ने यह जानना चाहा कि किस आधार पर मेला क्षेत्र में एक विशेष ढांचे, शिविर या गतिविधि की अनुमति ली गई थी।
दूसरा और ज्यादा संवेदनशील नोटिस उस समय चर्चा में आया, जब मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से शंकराचार्य होने से संबंधित दस्तावेजी प्रमाण मांगे। इस नोटिस ने धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ दी।
शंकराचार्य पद को लेकर सवाल क्यों उठा?
शंकराचार्य का पद सनातन धर्म में अत्यंत प्रतिष्ठित और परंपरागत माना जाता है। आमतौर पर इस पद से जुड़े विवाद आस्था से ज्यादा परंपरा और उत्तराधिकार से जुड़े होते हैं। लेकिन जब प्रशासन किसी संत से इस पद का प्रमाण मांगता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह प्रशासनिक प्रक्रिया है या धार्मिक हस्तक्षेप।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों का कहना है कि शंकराचार्य पद किसी सरकारी मान्यता का मोहताज नहीं होता, बल्कि यह सनातन परंपरा से तय होता है।
क्या जमीन भी ली जा सकती है?
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मेला प्रशासन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर कोई बड़ा एक्शन ले सकता है?
सूत्रों के मुताबिक, यदि यह साबित होता है कि मेला नियमों का उल्लंघन हुआ है या अनुमति शर्तों का पालन नहीं किया गया, तो प्रशासन शिविर की जमीन को खाली कराने या भविष्य में मेला क्षेत्र में प्रवेश पर रोक लगाने जैसे कदम उठा सकता है।
हालांकि, अभी तक जमीन कब्जाने या स्थायी प्रतिबंध को लेकर कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया गया है।
प्रशासन की दलील क्या है?
मेला प्रशासन का कहना है कि माघ मेला जैसे विशाल आयोजन में नियम सभी के लिए समान होते हैं। चाहे वह संत हों, अखाड़े हों या आम श्रद्धालु। प्रशासन के मुताबिक, नोटिस भेजना एक सामान्य प्रक्रिया है और इसका उद्देश्य किसी की आस्था पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि व्यवस्था बनाए रखना है।
संत समाज में नाराजगी
इस मामले के सामने आने के बाद संत समाज के एक वर्ग में नाराजगी भी देखी गई है। कई संतों और धार्मिक संगठनों का मानना है कि प्रशासन को परंपरागत धार्मिक पदों पर सवाल उठाने से बचना चाहिए।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि माघ मेला जैसे आयोजन संतों की मौजूदगी से ही जीवंत रहते हैं और ऐसे मामलों से धार्मिक माहौल प्रभावित हो सकता है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज
विवाद बढ़ने के साथ-साथ राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। कुछ नेताओं ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखा है, जबकि कुछ ने प्रशासन के कदम को कानून व्यवस्था के दायरे में बताया है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से नोटिस का जवाब देने की प्रक्रिया चल रही है। माना जा रहा है कि जवाब के बाद ही मेला प्रशासन अगला कदम तय करेगा।
यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है, क्योंकि इसमें आस्था, प्रशासन और परंपरा—तीनों जुड़े हुए हैं।
प्रयागराज माघ मेला का यह विवाद सिर्फ एक संत और प्रशासन के बीच का टकराव नहीं है, बल्कि यह सवाल खड़ा करता है कि धार्मिक परंपराओं और प्रशासनिक नियमों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि मेला प्रशासन आगे क्या फैसला लेता है और क्या यह विवाद किसी समझौते के साथ खत्म होता है या एक बड़े धार्मिक-प्रशासनिक टकराव की शक्ल लेता है।
The Prayagraj Magh Mela controversy involving Swami Avimukteshwaranand has intensified after the Magh Mela Authority issued two official notices. The dispute revolves around alleged violations of mela rules and the verification of his Shankaracharya status. The issue has sparked debates across Uttar Pradesh regarding religious authority, administrative power, and the rights of saints during large religious gatherings like the Magh Mela in Prayagraj.


















