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इलाहाबाद हाई कोर्ट की यूपी पुलिस और नौकरशाही पर सख्त टिप्पणी: ‘संविधान नहीं, सत्ता के प्रति ज्यादा दिखती है वफादारी’!

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इलाहाबाद हाई कोर्ट की यूपी पुलिस और नौकरशाही पर बड़ी टिप्पणी, गैंगस्टर एक्ट के दुरुपयोग और मनमानी कार्रवाई पर जताई चिंता

AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान कई गंभीर टिप्पणियां की हैं। अदालत ने कहा कि राज्य में कुछ अधिकारियों का आचरण ऐसा दिखाई देता है, मानो उनकी प्राथमिक निष्ठा संविधान और कानून के शासन के बजाय सत्ता प्रतिष्ठान के प्रति अधिक हो गई हो। कोर्ट ने पुलिस द्वारा गैंगस्टर एक्ट के कथित दुरुपयोग, मनमानी गिरफ्तारियों, चुनिंदा कार्रवाई और प्रशासनिक व्यवस्था में राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी चिंता व्यक्त की।

यह मामला गाजियाबाद के एक परिवार के खिलाफ दर्ज गैंगस्टर एक्ट की कार्यवाही से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि एक व्यावसायिक विवाद को आपराधिक रंग देकर कठोर कानून का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद न्यायालय ने परिवार के तीन सदस्यों के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द कर दिया और पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए।

गैंगस्टर एक्ट मामले में हाई कोर्ट का फैसला

जस्टिस विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने इस मामले में विस्तृत 31 पृष्ठों का फैसला सुनाया। अदालत के सामने यह तर्क रखा गया कि संबंधित परिवार को एक कारोबारी विवाद के चलते गैंगस्टर एक्ट जैसे सख्त कानून के तहत आरोपी बनाया गया था।

मामले की समीक्षा के बाद कोर्ट ने पाया कि उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर इस कठोर कानून के इस्तेमाल को उचित नहीं ठहराया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि कानून का उद्देश्य संगठित अपराध और गंभीर आपराधिक गतिविधियों पर नियंत्रण करना है, लेकिन यदि इसका उपयोग व्यक्तिगत या व्यावसायिक विवादों में किया जाता है तो यह न्याय व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।

महिला की गिरफ्तारी पर अदालत की नाराजगी

मामले में 35 वर्षीय गृहिणी ललिता त्यागी की गिरफ्तारी पर भी अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने के अगले ही दिन महिला को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि उसके खिलाफ पर्याप्त और ठोस सबूत सामने नहीं आए थे।

अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी किसी भी आपराधिक मामले में अंतिम विकल्प होनी चाहिए, न कि शुरुआती कदम। कानून प्रवर्तन एजेंसियों को गिरफ्तारी से पहले सभी तथ्यों और साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।

अधिकारियों की जवाबदेही पर उठाए सवाल

फैसले में अदालत ने प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक अधिकारी की पहली जिम्मेदारी संविधान, कानून और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना है।

न्यायालय ने कहा कि जब अधिकारियों के निर्णयों पर राजनीतिक प्रभाव हावी होने लगता है, तब निष्पक्ष प्रशासन प्रभावित होता है। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि कुछ मामलों में अधिकारी कानून के शासन को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी मानने के बजाय एक औपचारिक प्रक्रिया समझते हैं।

एनकाउंटर और चुनिंदा कार्रवाई पर टिप्पणी

हाई कोर्ट ने पुलिस कार्रवाई के तौर-तरीकों पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि समय-समय पर ऐसे मामले न्यायपालिका के सामने आते रहे हैं जिनमें पुलिस एनकाउंटर, चुनिंदा व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई और कठोर कानूनों के कथित मनमाने इस्तेमाल को लेकर शिकायतें सामने आई हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का इस्तेमाल समान रूप से होना चाहिए। किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई केवल उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर की जानी चाहिए, न कि किसी अन्य प्रभाव या दबाव के आधार पर।

ट्रांसफर-पोस्टिंग व्यवस्था पर भी टिप्पणी

अपने फैसले में अदालत ने प्रशासनिक ढांचे में ट्रांसफर और पोस्टिंग की व्यवस्था पर भी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि आम धारणा यह है कि प्रभावशाली और महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां कई बार अधिकारियों की कार्यशैली और सत्ता के साथ उनके संबंधों के आधार पर प्रभावित होती हैं।

न्यायालय ने कहा कि यदि कोई अधिकारी स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम करता है तो उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। प्रशासनिक व्यवस्था का उद्देश्य कानून का निष्पक्ष पालन सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि किसी विशेष हित की पूर्ति।

कानूनी प्रक्रिया के पालन पर जोर

अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। चाहे वह आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) हो या नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), प्रत्येक जांच और गिरफ्तारी निर्धारित नियमों के अनुरूप होनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि नागरिकों को कानून द्वारा दिए गए अधिकार केवल कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे इन अधिकारों का सम्मान करें और निष्पक्ष तरीके से उनका पालन सुनिश्चित करें।

गृह विभाग की भूमिका पर भी सवाल

फैसले में अदालत ने राज्य के गृह विभाग और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पर भी चिंता जताई। कोर्ट का मानना है कि संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों का कर्तव्य निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखना है।

अदालत ने कहा कि प्रशासनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है जब वे राजनीतिक या व्यक्तिगत प्रभाव से ऊपर उठकर कानून के अनुरूप कार्य करें।

सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है मुद्दा

हाई कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1986 से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन हैं। इसी कारण न्यायालय ने इस कानून की संवैधानिक वैधता या उससे जुड़े व्यापक मुद्दों पर अंतिम टिप्पणी करने से परहेज किया।

हालांकि, अदालत ने अपने फैसले के माध्यम से यह स्पष्ट संकेत दिया कि कठोर कानूनों का इस्तेमाल बेहद सावधानी और जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए। किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है

इलाहाबाद हाई कोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं मानी जा रही है, बल्कि इसे उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने साफ किया कि लोकतंत्र में संविधान सर्वोपरि है और पुलिस व प्रशासन का पहला दायित्व कानून के शासन को बनाए रखना है। गैंगस्टर एक्ट जैसे सख्त कानूनों का उपयोग केवल उन्हीं मामलों में होना चाहिए जहां इसकी वास्तविक आवश्यकता हो। साथ ही, गिरफ्तारी, जांच और प्रशासनिक कार्रवाई पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए।

The Allahabad High Court has raised serious concerns over the functioning of the Uttar Pradesh Police and bureaucracy while hearing a case related to the alleged misuse of the UP Gangster Act. Justice Vinod Diwakar observed that arbitrary arrests, selective police action, encounter-related controversies, and political influence in administrative decisions pose challenges to constitutional governance and the rule of law. The court’s remarks came while quashing criminal proceedings against members of a Ghaziabad family, highlighting concerns about misuse of legal provisions and abuse of police powers.

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