AIN NEWS 1 दिल्ली: सूचना के अधिकार (RTI) कानून के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए दो कथित RTI कार्यकर्ताओं की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि RTI एक्टिविज्म का इस्तेमाल कुछ मामलों में गलत तरीके से किया जा रहा है और यह अब एक “नया बिजनेस” बनता जा रहा है।
मामला पंजाब में सड़क निर्माण कार्य से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि दोनों व्यक्तियों ने सड़क निर्माण कार्य में बाधा डाली और सरकारी कर्मचारियों के काम में हस्तक्षेप किया। इसी मामले में उन्होंने गिरफ्तारी से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अग्रिम जमानत की मांग की थी, लेकिन शीर्ष अदालत ने राहत देने से इनकार कर दिया।
सड़क निर्माण रोकने का आरोप, कोर्ट ने पूछे सवाल
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई शामिल थे, ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि किसी सरकारी परियोजना की निगरानी करने का अधिकार RTI कार्यकर्ताओं को किस आधार पर है। अदालत ने पूछा कि क्या वे किसी अधिकृत संस्था, इंजीनियर या सरकारी एजेंसी के प्रतिनिधि हैं, जो निर्माण कार्य की निगरानी कर सकें।
कोर्ट ने कहा कि सरकारी योजनाओं और निर्माण कार्यों की निगरानी के लिए संबंधित विभाग और अधिकारी मौजूद हैं। केवल RTI कार्यकर्ता होने के आधार पर किसी को सरकारी काम रोकने या उसमें बाधा डालने का अधिकार नहीं मिल जाता।
RTI कानून का उद्देश्य पारदर्शिता, लेकिन दुरुपयोग पर चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में RTI कानून की मूल भावना और उसके दुरुपयोग के बीच अंतर को रेखांकित किया। सूचना का अधिकार कानून नागरिकों को सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने का अधिकार देता है। इसके जरिए लोग सरकारी फैसलों, योजनाओं और खर्च से जुड़ी जानकारी मांग सकते हैं।
हालांकि अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि कोई व्यक्ति RTI के नाम पर सरकारी अधिकारियों पर दबाव बनाता है, विकास कार्यों में रुकावट पैदा करता है या अपने निजी हितों के लिए इस कानून का इस्तेमाल करता है, तो ऐसे मामलों को गंभीरता से देखा जाएगा।
आरोपियों का पक्ष क्या था?
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने सड़क निर्माण में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को उजागर करने का प्रयास किया था। उनका दावा था कि उनके खिलाफ दर्ज मामला उन्हें चुप कराने की कोशिश है।
वहीं, पुलिस और शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप था कि दोनों लोगों ने सड़क निर्माण कार्य में बाधा डाली, कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार किया और सरकारी कामकाज प्रभावित किया। इन्हीं आरोपों के आधार पर अदालत से अग्रिम जमानत की मांग की गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी बनी चर्चा का विषय
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बन गई। अदालत ने RTI एक्टिविज्म के कुछ मामलों में बढ़ते कथित दुरुपयोग पर चिंता जताई और कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारों का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि RTI कानून देश में पारदर्शिता और जवाबदेही का महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। हजारों मामलों में RTI के जरिए सरकारी योजनाओं में गड़बड़ियों को सामने लाने और नागरिकों को जानकारी उपलब्ध कराने में मदद मिली है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि कानून के सही इस्तेमाल और दुरुपयोग के बीच अंतर बनाए रखा जाए।
RTI एक्टिविस्टों के लिए बड़ा संदेश
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को उन लोगों के लिए एक संदेश के रूप में देखा जा रहा है जो RTI कानून का इस्तेमाल करते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सूचना मांगना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन सरकारी कार्यों में अनधिकृत हस्तक्षेप करना या काम में बाधा पहुंचाना कानून के दायरे में नहीं आता।
इस मामले में दो RTI कार्यकर्ताओं को अग्रिम जमानत नहीं मिली, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि अदालत सरकारी कामकाज में बाधा डालने के आरोपों को गंभीरता से देख रही है।
RTI कानून देश में पारदर्शिता का मजबूत हथियार है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी बताती है कि किसी भी अधिकार का इस्तेमाल जिम्मेदारी और कानूनी सीमाओं के भीतर होना चाहिए। अदालत का यह फैसला RTI के सही उपयोग और कथित दुरुपयोग के बीच बहस को फिर से सामने ले आया है।
The Supreme Court of India has rejected the anticipatory bail plea of two RTI activists accused of obstructing a road construction project in Punjab. The court observed that misuse of RTI activism is becoming a concern and remarked that RTI activism has become a new business in some cases. The verdict highlights the importance of maintaining transparency through the Right to Information Act while preventing unauthorized interference in government projects. The Supreme Court RTI case has sparked debate about RTI misuse, citizen rights, public accountability, and legal boundaries for activists.


















