AIN NEWS 1 | हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने की दिशा में भारत ने एक बड़ा कदम उठाया है। भारत और इंडोनेशिया ने मिलकर इंडोनेशिया के सबांग पोर्ट (Sabang Port) को विकसित करने पर सहमति बनाई है। यह बंदरगाह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के पश्चिमी प्रवेश द्वार पर स्थित है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना पूरी तरह विकसित होती है, तो भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश क्षेत्र में रणनीतिक उपस्थिति मिलेगी। यह कदम भारत की समुद्री सुरक्षा, व्यापार और इंडो-पैसिफिक नीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
होर्मुज से मिला बड़ा सबक
हाल के वर्षों में दुनिया ने देखा कि किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर तनाव पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़े तनाव के दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का मुद्दा बार-बार सामने आया। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत समुद्री तेल व्यापार का रास्ता इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।
इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि समुद्री व्यापार मार्गों पर नियंत्रण या प्रभाव किसी भी देश की रणनीतिक शक्ति को कई गुना बढ़ा सकता है। यही कारण है कि अब भारत भी हिंद महासागर में अपनी रणनीतिक मौजूदगी मजबूत करने पर लगातार काम कर रहा है।
क्या है सबांग पोर्ट?
सबांग पोर्ट इंडोनेशिया के आचेह (Aceh) प्रांत के सबांग द्वीप पर स्थित है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी भौगोलिक स्थिति है।
यह बंदरगाह मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी मुहाने पर स्थित है, जहां से हिंद महासागर से आने वाले जहाज मलक्का में प्रवेश करते हैं। इस कारण यह समुद्री निगरानी और व्यापारिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
सबांग पोर्ट भारत के ग्रेट निकोबार द्वीप से लगभग 100 मील (करीब 160 किलोमीटर) की दूरी पर स्थित है। इसी वजह से दोनों परियोजनाओं को एक-दूसरे का पूरक माना जा रहा है।
क्या है मलक्का जलडमरूमध्य?
मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यह हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर से जोड़ता है।
यह जलडमरूमध्य इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच स्थित है।
सदियों पहले मसालों के व्यापार के दौरान यही मार्ग भारत, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने का प्रमुख समुद्री रास्ता था। आज भी इसकी रणनीतिक और आर्थिक अहमियत पहले से कहीं अधिक है।
दुनिया के व्यापार की लाइफलाइन
मलक्का जलडमरूमध्य से हर वर्ष लगभग 2.8 ट्रिलियन डॉलर मूल्य का वैश्विक व्यापार गुजरता है।
यही रास्ता एशिया के अधिकांश औद्योगिक देशों को पश्चिम एशिया और अफ्रीका से जोड़ता है।
इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले प्रमुख सामानों में शामिल हैं—
- कच्चा तेल
- एलएनजी (प्राकृतिक गैस)
- कोयला
- कंटेनर कार्गो
- मशीनरी
- इलेक्ट्रॉनिक्स
- पाम ऑयल
- चीन में निर्मित वस्तुएं
अनुमान है कि दुनिया के लगभग 25 प्रतिशत समुद्री व्यापार का आवागमन इसी जलडमरूमध्य से होता है।
भारत के लिए क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
भारत का पूर्वी एशिया के देशों—जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, वियतनाम और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों—के साथ होने वाला अधिकांश समुद्री व्यापार मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।
भारत के लिए यह मार्ग कई कारणों से महत्वपूर्ण है—
- पूर्वी एशिया के साथ व्यापार का प्रमुख समुद्री मार्ग
- ऊर्जा और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात-आयात की सुविधा
- कंटेनर और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क की मजबूती
- “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” को गति
- हिंद महासागर में रणनीतिक उपस्थिति
यदि इस क्षेत्र में भारत की भूमिका मजबूत होती है, तो भविष्य में भारतीय नौसेना और व्यापारिक जहाजों को भी लाभ मिल सकता है।
चीन की सबसे बड़ी चिंता: ‘मलक्का दुविधा’
चीन की अर्थव्यवस्था काफी हद तक समुद्री व्यापार पर निर्भर है।
चीन का अधिकांश आयातित तेल और प्राकृतिक गैस पश्चिम एशिया और अफ्रीका से मलक्का जलडमरूमध्य के रास्ते चीन पहुंचती है।
इसी कारण वर्ष 2003 में तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ ने पहली बार “मलक्का दुविधा (Malacca Dilemma)” शब्द का प्रयोग किया था।
इसका अर्थ था कि यदि किसी युद्ध या अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान मलक्का जलडमरूमध्य बाधित हो गया, तो चीन की ऊर्जा सुरक्षा और निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो सकता है।
यही कारण है कि चीन लगातार वैकल्पिक समुद्री और स्थलीय मार्ग विकसित करने में लगा हुआ है।
भारत-इंडोनेशिया समझौते की अहमियत
भारत और इंडोनेशिया ने सबांग पोर्ट के विकास के लिए सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है।
दोनों देशों के बीच इस परियोजना पर चर्चा पहले भी हो चुकी थी। वर्ष 2018 में भी सहयोग की रूपरेखा तैयार की गई थी, लेकिन अब बदलते भू-राजनीतिक हालात और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण इस परियोजना को नई गति मिलने की संभावना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे के दौरान दोनों देशों ने समुद्री सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति जताई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक बंदरगाह परियोजना नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से कैसे जुड़ेगा सबांग?
भारत पहले से ही अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना में शामिल हैं—
- अंतरराष्ट्रीय ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट
- ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट
- आधुनिक टाउनशिप
- बिजली उत्पादन परियोजनाएं
- लॉजिस्टिक्स हब
ग्रेट निकोबार परियोजना का उद्देश्य भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के निकट एक प्रमुख समुद्री और व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित करना है।
यदि दूसरी ओर सबांग पोर्ट भी विकसित होता है, तो भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के दोनों ओर रणनीतिक पहुंच मिल सकती है।
चीन के ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ का जवाब?
पिछले एक दशक में चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति के तहत हिंद महासागर क्षेत्र में कई बंदरगाहों में निवेश किया है।
इनमें प्रमुख हैं—
- पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह
- श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह
- म्यांमार का क्याउकफ्यू बंदरगाह
विश्लेषकों का मानना है कि भारत द्वारा सबांग पोर्ट और ग्रेट निकोबार परियोजना को आगे बढ़ाना हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
हालांकि, भारत सरकार ने इस परियोजना को किसी देश के खिलाफ सैन्य पहल के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। आधिकारिक तौर पर इसका उद्देश्य समुद्री संपर्क, व्यापार, लॉजिस्टिक्स और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना बताया गया है।
हिंद महासागर में भारत की बढ़ती भूमिका
भारत और इंडोनेशिया दोनों ही मुक्त, सुरक्षित और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक व्यवस्था का समर्थन करते हैं।
दोनों देशों की प्राथमिकताओं में शामिल हैं—
- समुद्री व्यापार की सुरक्षा
- आपूर्ति श्रृंखलाओं की मजबूती
- नौवहन की स्वतंत्रता
- समुद्री सहयोग
- क्षेत्रीय स्थिरता
सबांग पोर्ट परियोजना इन्हीं साझा हितों को आगे बढ़ाने का प्रयास मानी जा रही है।
सबांग पोर्ट और ग्रेट निकोबार परियोजना मिलकर भारत की समुद्री रणनीति को नई दिशा दे सकती हैं। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट मजबूत उपस्थिति भारत को व्यापार, लॉजिस्टिक्स और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण लाभ दे सकती है।
हालांकि, इस परियोजना का वास्तविक प्रभाव इसके विकास की गति, भारत-इंडोनेशिया सहयोग और भविष्य की क्षेत्रीय भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। यदि दोनों परियोजनाएं योजनानुसार आगे बढ़ती हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति को पहले से कहीं अधिक मजबूत कर सकता है।


















