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भगोड़े आरोपियों को पकड़ने के लिए रिश्तेदारों को परेशान नहीं कर सकती पुलिस, इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी!

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AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश से एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सामने आया है, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी फरार या वांछित आरोपी को पकड़ने के लिए उसके परिवार, रिश्तेदारों या परिचितों को परेशान करना कानून और संविधान दोनों के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि पुलिस को अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए केवल वैधानिक और संवैधानिक तरीकों का ही सहारा लेना चाहिए। किसी निर्दोष व्यक्ति को केवल इसलिए प्रताड़ित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका संबंध किसी आरोपी से है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पुलिस के रवैये पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति फरार है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी, बच्चे या अन्य रिश्तेदारों को बार-बार थाने बुलाया जाए, उन्हें धमकाया जाए या मानसिक रूप से परेशान किया जाए।

खंडपीठ ने कहा कि यह तरीका कानून के शासन के अनुरूप नहीं है। पुलिस की जिम्मेदारी आरोपी को कानून के अनुसार तलाशना और गिरफ्तार करना है, लेकिन इसके लिए किसी निर्दोष नागरिक की स्वतंत्रता और सम्मान से समझौता नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 21 का हवाला

अदालत ने अपने आदेश में संविधान के अनुच्छेद 21 का विशेष उल्लेख किया, जो प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। न्यायालय ने कहा कि बिना किसी कानूनी आधार के रिश्तेदारों को हिरासत में रखना, पूछताछ के नाम पर घंटों बैठाना या उन पर दबाव बनाना इस मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक की गरिमा की रक्षा करता है। केवल रिश्तेदारी किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं बना देती और न ही पुलिस को उसके खिलाफ मनमानी करने का अधिकार देती है।

औपनिवेशिक सोच’ पर अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी के परिवार वालों को परेशान कर उसके आत्मसमर्पण के लिए दबाव बनाना ब्रिटिश शासन के समय अपनाई जाने वाली औपनिवेशिक सोच का हिस्सा था। स्वतंत्र भारत में ऐसी कार्यप्रणाली की कोई जगह नहीं है।

अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को आधुनिक तकनीक, जांच कौशल और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से अपराधियों तक पहुंचना चाहिए, न कि उनके निर्दोष परिजनों को परेशान करके।

पुलिस को दिए महत्वपूर्ण निर्देश

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में पुलिस को स्पष्ट संदेश दिया कि यदि किसी आरोपी की तलाश की जा रही है तो जांच पूरी तरह कानून के दायरे में रहकर की जाए। किसी भी रिश्तेदार को केवल आरोपी का संबंधी होने के आधार पर थाने बुलाना, डराना या मानसिक दबाव बनाना उचित नहीं है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी रिश्तेदार के खिलाफ स्वतंत्र रूप से कोई आपराधिक साक्ष्य मौजूद है, तभी उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। अन्यथा उसे परेशान करना संविधान और कानून दोनों के विपरीत होगा।

नागरिकों के अधिकारों पर जोर

इस फैसले को नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने दोहराया कि कानून सभी के लिए समान है और पुलिस भी संविधान से ऊपर नहीं है।

यदि पुलिस किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो संबंधित व्यक्ति अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। न्यायपालिका का दायित्व है कि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करे।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में पुलिस जांच की प्रक्रिया को अधिक जवाबदेह बनाएगी। इससे पुलिस को यह संदेश मिलेगा कि अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए केवल वैधानिक उपाय अपनाए जाएं और निर्दोष लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए।

विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला संविधान में निहित व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानव गरिमा और विधि के शासन की भावना को और मजबूत करता है।

पुलिस जांच और मानवाधिकारों के बीच संतुलन

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अपराधियों को पकड़ना पुलिस की जिम्मेदारी है और कानून व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक है। लेकिन यह जिम्मेदारी निभाते समय मानवाधिकारों और संवैधानिक सीमाओं का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए।

यदि पुलिस जांच के नाम पर किसी निर्दोष नागरिक को प्रताड़ित करती है, तो इससे कानून व्यवस्था मजबूत होने के बजाय जनता का भरोसा कमजोर होता है।

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फैसले का व्यापक प्रभाव

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि यह पूरे देश की पुलिस एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक भारत में जांच एजेंसियों को संवैधानिक मूल्यों का पालन करते हुए ही कार्रवाई करनी होगी।

यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में मिसाल के रूप में भी देखा जा सकता है, जहां आरोपी के परिवार वालों को अनावश्यक रूप से परेशान किए जाने की शिकायतें सामने आती हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत ने साफ कर दिया है कि फरार आरोपी की तलाश के नाम पर उसके निर्दोष रिश्तेदारों को परेशान करना न केवल अनुचित है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन भी है। पुलिस को अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया, आधुनिक जांच तकनीकों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए। न्यायालय का यह संदेश कानून के शासन, मानव गरिमा और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

The Allahabad High Court has ruled that police cannot harass the relatives of an absconding accused during investigation. The Division Bench observed that such practices violate Article 21 of the Constitution, which guarantees the right to life and personal liberty. The judgment emphasizes that law enforcement agencies must use legal and constitutional methods instead of intimidating family members. This significant ruling strengthens fundamental rights, human rights, police accountability, constitutional protections, and due process in India, making it an important development in Indian legal and judicial news.

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