पंजाब सरकार ने साढ़े चार साल में खरीदीं 43 करोड़ से अधिक ब्यूप्रेनॉर्फिन टैबलेट, नशामुक्ति अभियान पर विधानसभा समिति ने उठाए अहम सवाल
AIN NEWS 1 चंडीगढ़: पंजाब में नशे की समस्या लंबे समय से सरकार और समाज दोनों के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है। इस चुनौती से निपटने के लिए राज्य सरकार लगातार नशामुक्ति कार्यक्रम चला रही है। इसी बीच पंजाब विधानसभा की एक समिति की रिपोर्ट में सामने आया है कि पिछले लगभग साढ़े चार वर्षों के दौरान राज्य सरकार ने नशे के आदी मरीजों के इलाज के लिए 43 करोड़ से अधिक ब्यूप्रेनॉर्फिन (Buprenorphine) टैबलेट खरीदी हैं। यह दवा विशेष रूप से उन लोगों के उपचार में उपयोग की जाती है जो हेरोइन, अफीम या अन्य ओपिओइड आधारित नशे के शिकार हो चुके हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में इलाज के लिए पंजीकृत मरीजों की संख्या भी लगातार बढ़ी है। वर्ष 2022 में जहां करीब 2 लाख मरीज सरकारी नशामुक्ति कार्यक्रम से जुड़े थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 3.17 लाख से अधिक हो चुकी है। इससे स्पष्ट होता है कि बड़ी संख्या में लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से नशे से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या है ब्यूप्रेनॉर्फिन और क्यों दी जाती है?
ब्यूप्रेनॉर्फिन एक ऐसी दवा है जिसका उपयोग Opioid Substitution Therapy (OST) के तहत किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से हेरोइन, अफीम या अन्य ओपिओइड नशे का आदी है तो अचानक नशा छोड़ने पर उसे गंभीर शारीरिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में डॉक्टर नियंत्रित मात्रा में ब्यूप्रेनॉर्फिन देते हैं ताकि मरीज धीरे-धीरे नशे की लत से बाहर निकल सके। यह उपचार केवल प्रशिक्षित चिकित्सकों की निगरानी में किया जाता है और इसे बिना चिकित्सकीय सलाह के लेना खतरनाक माना जाता है।
कितनी टैबलेट खरीदी गईं?
विधानसभा समिति की रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने वर्षवार बड़ी मात्रा में टैबलेट खरीदी हैं।
वर्ष 2022 में लगभग 7 करोड़ टैबलेट।
वर्ष 2023 में करीब 9.44 करोड़ टैबलेट।
वर्ष 2024 में लगभग 10 करोड़ टैबलेट।
वर्ष 2025 में करीब 11 करोड़ टैबलेट।
वर्ष 2026 में जून तक लगभग 6 करोड़ टैबलेट।
इन सभी को मिलाकर कुल खरीद 43.44 करोड़ टैबलेट के आसपास पहुंचती है।
मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी
सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्यभर में संचालित OOAT (Outpatient Opioid Assisted Treatment) केंद्रों में इलाज कराने वाले मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
जहां पहले करीब 2 लाख लोग इन केंद्रों से जुड़े थे, वहीं अब यह संख्या 3.17 लाख से अधिक हो गई है। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि अधिक लोग इलाज के लिए आगे आ रहे हैं, जिससे नशामुक्ति अभियान को मजबूती मिली है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मरीजों की बढ़ती संख्या यह संकेत भी देती है कि राज्य में नशे की चुनौती अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
पंजाब की जेलों में भी चल रहे हैं OOAT क्लीनिक
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि राज्य की विभिन्न जेलों में भी OOAT क्लीनिक संचालित किए जा रहे हैं ताकि जेलों में बंद नशे के आदी कैदियों का उपचार किया जा सके।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 40,830 कैदी इन उपचार केंद्रों में पंजीकृत हैं।
जेल प्रशासन के अनुसार इन केंद्रों में डॉक्टरों, मनोवैज्ञानिकों और काउंसलरों की मदद से कैदियों का इलाज किया जाता है ताकि जेल से बाहर आने के बाद वे सामान्य जीवन जी सकें।
विधानसभा समिति ने क्या जताई चिंता?
हालांकि रिपोर्ट में नशामुक्ति कार्यक्रम की उपलब्धियों का उल्लेख किया गया है, लेकिन विधानसभा समिति ने कुछ गंभीर सवाल भी उठाए हैं।
समिति का कहना है कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मरीज लंबे समय तक केवल ब्यूप्रेनॉर्फिन पर निर्भर न रह जाएं। इलाज का अंतिम उद्देश्य मरीज को पूरी तरह नशामुक्त बनाना होना चाहिए।
रिपोर्ट में कुछ मामलों का भी उल्लेख किया गया है जिनमें इस दवा के दुरुपयोग की शिकायतें सामने आई हैं। जानकारी के अनुसार कुछ लोग टैबलेट को पानी में घोलकर इंजेक्शन के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास करते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है।
इसी कारण समिति ने निगरानी व्यवस्था को और मजबूत बनाने की सिफारिश की है।
अवैध नशामुक्ति केंद्रों पर भी कार्रवाई की सिफारिश
समिति ने राज्य में संचालित अवैध नशामुक्ति केंद्रों पर भी चिंता व्यक्त की है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बिना मान्यता वाले कई केंद्र नियमों का पालन नहीं करते, जिससे मरीजों की जान और स्वास्थ्य दोनों को खतरा हो सकता है।
समिति ने सरकार से ऐसे सभी केंद्रों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और केवल अधिकृत संस्थानों के माध्यम से उपचार सुनिश्चित करने की सिफारिश की है।
सरकार का क्या कहना है?
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि पंजाब सरकार नशे के खिलाफ व्यापक अभियान चला रही है। राज्यभर में सरकारी अस्पतालों और OOAT केंद्रों के माध्यम से हजारों मरीजों को नियमित उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है।
सरकार का दावा है कि दवा के साथ-साथ मरीजों की काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और पुनर्वास पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है ताकि इलाज केवल दवा तक सीमित न रहे बल्कि मरीज सामान्य जीवन में वापस लौट सके।
विशेषज्ञों की राय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ब्यूप्रेनॉर्फिन नशामुक्ति उपचार की वैज्ञानिक रूप से स्वीकृत दवा है। लेकिन इसका उपयोग केवल प्रशिक्षित डॉक्टरों की निगरानी में ही होना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल दवा देना पर्याप्त नहीं है। मरीजों को मनोवैज्ञानिक सहायता, पारिवारिक सहयोग, रोजगार और सामाजिक पुनर्वास जैसी सुविधाएं भी मिलनी चाहिए, तभी स्थायी रूप से नशे की लत से छुटकारा मिल सकता है।
आगे की चुनौती
पंजाब लंबे समय से नशे की समस्या से जूझ रहा है। सरकार के प्रयासों के बावजूद यह चुनौती अभी भी बनी हुई है।
विधानसभा समिति की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि इलाज की पहुंच बढ़ी है, लेकिन इसके साथ-साथ उपचार की गुणवत्ता, दवा के दुरुपयोग की रोकथाम और मरीजों के पूर्ण पुनर्वास पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक होगा।
यदि सरकार, स्वास्थ्य विभाग, सामाजिक संगठन और आम नागरिक मिलकर काम करें तो नशामुक्त पंजाब की दिशा में बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
साढ़े चार वर्षों में 43 करोड़ से अधिक ब्यूप्रेनॉर्फिन टैबलेट की खरीद यह दर्शाती है कि पंजाब सरकार ने नशे की समस्या से निपटने के लिए बड़े स्तर पर संसाधन लगाए हैं। वहीं मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी यह बताती है कि अधिक लोग इलाज के लिए आगे आ रहे हैं। हालांकि विधानसभा समिति ने दवा के संभावित दुरुपयोग, मरीजों की दीर्घकालिक निर्भरता और अवैध नशामुक्ति केंद्रों पर चिंता जताते हुए निगरानी और सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया है।
The Punjab Government has procured more than 43 crore Buprenorphine tablets over the last four and a half years to strengthen its drug de-addiction program through OOAT (Outpatient Opioid Assisted Treatment) clinics. According to the latest Punjab Assembly report, the number of registered patients has increased from 2 lakh to over 3.17 lakh, while treatment facilities have also been expanded inside state prisons. The report highlights the importance of Buprenorphine, opioid substitution therapy, drug rehabilitation, and Punjab’s anti-drug campaign, while also raising concerns about the possible misuse of the medicine and the need for stronger monitoring and rehabilitation measures. This development is significant for India’s ongoing efforts to combat opioid addiction and improve public healthcare.



















