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एक ढाबा जिसने रच दी सफलता की कहानी: मुरथल का अमरीक सुखदेव बना ₹100 करोड़ का ब्रांड!

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Amrik Sukhdev Dhaba: From Highway Stop to ₹100 Crore Restaurant Empire

अमरीक सुखदेव ढाबा: मुरथल का वो ढाबा जो बना 100 करोड़ का रेस्टोरेंट ब्रांड

AIN NEWS 1: आज जिस अमरीक सुखदेव ढाबे की चमक-दमक हम देखते हैं, उसकी शुरुआत बहुत ही साधारण तरीके से हुई थी। बात है साल 1956 की, जब सरदार प्रकाश सिंह ने हरियाणा के मुरथल में एक छोटा सा ढाबा शुरू किया। उस समय यह ढाबा मुख्य रूप से हाईवे पर सफर करने वाले ट्रक ड्राइवरों के लिए था, जो थकान मिटाने और पेट भरने के लिए यहां रुकते थे।

प्रकाश सिंह का मकसद बड़ा नहीं था, सिर्फ इतना था कि जो भी आए, उसे घर जैसा खाना मिले और इज्जत के साथ बैठकर खा सके।

धीरे-धीरे बढ़ता गया स्वाद और नाम

जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, ढाबे की लोकप्रियता बढ़ती गई। वहां का स्वाद, सफाई और व्यवहार लोगों को खींचने लगा। यही वजह थी कि मुरथल में यात्रा करने वाले लोग जानबूझकर यहां रुकने लगे।

1990 में जब प्रकाश सिंह के दोनों बेटे, अमरीक और सुखदेव, भी इस कारोबार में शामिल हुए, तब ढाबे का कायाकल्प होने लगा। दोनों भाइयों ने पारंपरिक ढाबा कल्चर को बनाए रखते हुए आधुनिकता की झलक भी देना शुरू किया।

नई सोच, नई शुरुआत

अमरीक और सुखदेव ने ढाबे को केवल ट्रक ड्राइवरों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने आम परिवारों, टूरिस्ट्स और युवाओं को भी टारगेट किया। मेन्यू में बदलाव किए गए, बैठने की जगह को बड़ा और साफ-सुथरा बनाया गया। खाने के स्वाद को पहले जैसा बनाए रखते हुए हाइजीन और प्रेजेंटेशन पर भी ध्यान दिया गया।

धीरे-धीरे ढाबा “अमरीक सुखदेव” नाम से एक ब्रांड बन गया।

दैनिक ग्राहकों की संख्या और स्टाफ

आज की बात करें तो, अमरीक सुखदेव में रोजाना लगभग 5,000 से 10,000 लोग खाना खाने आते हैं। ये सिर्फ एक ढाबा नहीं रहा, बल्कि एक फूड डेस्टिनेशन बन चुका है। यहां 500 से ज्यादा कर्मचारियों की एक मजबूत टीम है जो इस भारी भीड़ को संभालती है और हर ग्राहक को अच्छी सेवा देने की कोशिश करती है।

इन कर्मचारियों में से कुछ लोग किचन में होते हैं, कुछ सर्विस में और कुछ लोग हाउसकीपिंग और व्यवस्थापन में। यह सब एक बेहतरीन मैनेजमेंट सिस्टम के तहत चलता है।

₹100 करोड़ की सालाना कमाई

अमरीक सुखदेव अब सिर्फ एक ढाबा नहीं रहा, यह एक बड़ा बिजनेस ब्रांड बन चुका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रतिष्ठान की सालाना कमाई करीब ₹100 करोड़ तक पहुंच चुकी है। यह कमाई केवल फूड से नहीं है, बल्कि उनकी पैकेजिंग, ऑनलाइन ऑर्डरिंग, प्राइवेट पार्टी बुकिंग और अन्य सेवाओं से भी होती है।

ग्राहकों के लिए अनुभव, सिर्फ खाना नहीं

यहां आने वाले ग्राहकों के लिए अमरीक सुखदेव सिर्फ खाना खाने की जगह नहीं, बल्कि एक अनुभव है। परिवार यहां घंटों बैठता है, फोटो खींचता है, और अलग-अलग व्यंजनों का स्वाद लेता है। यहां का आलू का पराठा, मक्खन और लस्सी तो अब लीजेंड बन चुके हैं।

यह ढाबा युवाओं के लिए सेल्फी प्वाइंट बन गया है, वहीं बुजुर्गों के लिए यह एक भरोसेमंद ठिकाना।

सोशल मीडिया और मार्केटिंग का उपयोग

अमरीक सुखदेव ने समय के साथ-साथ सोशल मीडिया और डिजिटल मार्केटिंग का भी बखूबी इस्तेमाल किया। इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स पर लगातार अपने किचन, रेसिपीज़ और ग्राहक अनुभवों को शेयर करते रहते हैं। इससे ना सिर्फ ब्रांड की पहचान बढ़ी बल्कि नई पीढ़ी तक भी इसकी पहुंच बनी।

भविष्य की योजनाएं

अब अमरीक सुखदेव सिर्फ मुरथल तक सीमित नहीं रहना चाहता। सूत्रों के मुताबिक, आने वाले समय में वे अन्य राज्यों में भी अपनी ब्रांच खोलने की योजना बना रहे हैं। खासकर दिल्ली-एनसीआर, पंजाब और राजस्थान जैसे क्षेत्रों में। इससे ब्रांड की पहुंच और भी विस्तृत होगी।

अमरीक सुखदेव की कहानी सिर्फ एक ढाबे की नहीं, बल्कि एक सपने को हकीकत में बदलने की कहानी है। जहां सादगी, मेहनत और परिवार की एकता ने मिलकर एक छोटे से ढाबे को ₹100 करोड़ की कंपनी बना दिया। यह उन सभी के लिए प्रेरणा है जो छोटे स्तर से शुरुआत करके बड़ा सपना देखते हैं।

Amrik Sukhdev Dhaba in Murthal, Haryana, has transformed from a humble highway stop for truck drivers into a ₹100 crore restaurant empire. Starting in 1956 by Sardar Parkash Singh, the dhaba now serves over 10,000 customers daily, with a team of over 500 employees. It stands as a shining example of a successful family-run food business in India, known for its delicious North Indian cuisine and exceptional service. This iconic stop on NH-44 has redefined highway dining in India.

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