Aniruddhacharya slams Akhilesh Yadav: “How can a king serve the nation if he hates the people?”
अनिरुद्धाचार्य का अखिलेश यादव पर तंज: “राजा अगर प्रजा से द्वेष रखेगा, तो देश की सेवा कैसे करेगा?”
AIN NEWS 1: हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो जमकर वायरल हो रहा है, जिसमें समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव और प्रसिद्ध कथा वाचक अनिरुद्धाचार्य के बीच की बातचीत देखी जा सकती है। इस वीडियो में अखिलेश यादव कथावाचक से कहते हुए नजर आ रहे हैं कि “हमारे रास्ते अलग-अलग हैं।”
इस बयान के बाद अनिरुद्धाचार्य ने भी पलटवार करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “अगर राजा ही अपनी प्रजा से द्वेष रखेगा, तो वह देश और समाज की सेवा कैसे कर पाएगा?” इस टिप्पणी को लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल है और लोग इसे अखिलेश यादव की सोच पर एक बड़ा सवाल मान रहे हैं।
घटना की शुरुआत कैसे हुई?
उत्तर प्रदेश में एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान कथावाचक अनिरुद्धाचार्य और सपा प्रमुख अखिलेश यादव आमने-सामने आए। इस दौरान जब दोनों के बीच बातचीत हो रही थी, तो किसी ने उस पल को रिकॉर्ड कर लिया और वह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
वीडियो में अखिलेश यादव कहते नजर आ रहे हैं—
“हम दोनों के रास्ते अलग हैं।”
इस बात का इशारा शायद अनिरुद्धाचार्य की धार्मिक गतिविधियों और अखिलेश यादव की राजनीतिक विचारधारा के अंतर की ओर था। लेकिन यह टिप्पणी अनिरुद्धाचार्य को कुछ खास पसंद नहीं आई।
अनिरुद्धाचार्य का पलटवार
अखिलेश यादव के बयान के बाद अनिरुद्धाचार्य ने सोशल मीडिया और मीडिया से बातचीत में कहा:
“राजा को अपने राज्य की हर प्रजा से प्रेम रखना चाहिए। अगर कोई नेता ही द्वेष की भावना रखेगा तो वह समाज का भला नहीं कर सकता।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि धर्मगुरुओं को राजनीति से ऊपर रखा जाना चाहिए, क्योंकि वे समाज में सद्भाव और आध्यात्म का संदेश लेकर आते हैं। अगर नेता उनसे दूरी बनाएंगे या उन्हें विरोधी दृष्टि से देखेंगे, तो यह एक चिंता का विषय है।
राजनीतिक माहौल में हलचल
अनिरुद्धाचार्य के इस तंज के बाद राजनीतिक हलकों में कई प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे धार्मिक नेताओं का राजनीति में हस्तक्षेप मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे नेताओं की असहिष्णुता का प्रतीक कह रहे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि नेताओं को समाज के हर वर्ग से संवाद बनाकर रखना चाहिए— चाहे वो धार्मिक हो, सामाजिक हो या बौद्धिक वर्ग। इस तरह की दूरी केवल वैचारिक नहीं बल्कि सामाजिक भी बन जाती है, जिससे नेताओं की छवि पर असर पड़ता है।
क्या कहते हैं लोग?
सोशल मीडिया पर आम जनता के बीच भी इस विषय पर चर्चा गर्म है। कुछ लोग अनिरुद्धाचार्य की बातों को सही ठहरा रहे हैं और कह रहे हैं कि “धार्मिक संतों को लेकर इस तरह की टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।” वहीं कुछ लोग अखिलेश यादव के बयान को “वैचारिक स्वतंत्रता” का नाम दे रहे हैं।
धर्म और राजनीति के बीच की खाई
इस विवाद ने एक बार फिर यह बहस खड़ी कर दी है कि क्या धार्मिक संतों को राजनीति से दूर रहना चाहिए या क्या राजनेताओं को हर वर्ग का सम्मान करते हुए संवाद बनाए रखना चाहिए?
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में यह उम्मीद की जाती है कि नेता हर व्यक्ति से बिना भेदभाव बात करें, खासकर उन लोगों से जो समाज में मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं।
वीडियो के वायरल होने का प्रभाव
यह वीडियो मात्र कुछ सेकंड का है, लेकिन इसके प्रभाव ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सोशल मीडिया की ताकत कितनी व्यापक है और एक छोटे से संवाद को भी राष्ट्रीय बहस का विषय बना सकती है।
इस पूरे मामले से यह सीख मिलती है कि संवाद में गरिमा बनाए रखना कितना आवश्यक है, खासकर तब जब बात धर्म और राजनीति जैसे संवेदनशील विषयों की हो। नेताओं को हर वर्ग का सम्मान करते हुए ही आगे बढ़ना चाहिए, ताकि समाज में सद्भाव और विश्वास बना रहे।
A video of Akhilesh Yadav and Aniruddhacharya has gone viral, sparking a controversy where the Hindu spiritual leader responded strongly to the politician’s remark about “different paths.” Aniruddhacharya questioned how a leader who harbors hatred toward his own people can serve the country. This incident highlights the increasing tension between politics and religion in India and reflects on the need for respectful political discourse in a diverse society.


















