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इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, रिटायरमेंट तक नहीं सुन सकेंगे आपराधिक मामले!

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AIN NEWS 1: भारत के न्याय तंत्र में ऐसा कम ही होता है जब सुप्रीम कोर्ट किसी हाई कोर्ट के मौजूदा जज को सीधे तौर पर फटकार लगाता है। लेकिन हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया जहां सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस प्रशांत कुमार को उनके एक फैसले पर गंभीर टिप्पणियां करते हुए यह निर्देश दे दिया कि वे अब रिटायरमेंट तक किसी भी आपराधिक मामले की सुनवाई नहीं करेंगे — और अगर करेंगे भी, तो केवल सीनियर जज की मौजूदगी में।

मामला क्या था?

मामला शुरू हुआ एक व्यापारिक विवाद से, जो ‘ललिता टेक्सटाइल कंसर्न’ और ‘शिखर केमिकल्स’ नामक दो कंपनियों के बीच था। ललिता टेक्सटाइल थोक और खुदरा धागा सप्लाई करने का काम करती है, जबकि शिखर केमिकल्स उन्हीं धागों से बने कपड़े बनाती और बेचती है।

ललिता टेक्सटाइल का दावा है कि उसने शिखर केमिकल्स को 52 लाख 34 हजार 385 रुपये का धागा सप्लाई किया, जिसमें से 47 लाख 75 हजार रुपये का भुगतान तो मिला लेकिन बाकी 4 लाख 59 हजार 385 रुपये की रकम अगस्त 2019 से बकाया है।

कंपनी ने कई बार संपर्क किया, लेकिन जब भुगतान नहीं हुआ, तो उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कर दी।

कैसे दीवानी मामला बना आपराधिक?

शिकायत पहले GST विभाग तक पहुंची, फिर पुलिस और अंततः मजिस्ट्रेट कोर्ट तक गई। यहां मजिस्ट्रेट ने IPC की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत मामला दर्ज कर समन जारी कर दिया।

शिखर केमिकल्स ने इस फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी, जहां मामला जस्टिस प्रशांत कुमार की अदालत में पहुंचा। लेकिन यहां भी उन्हें राहत नहीं मिली। जस्टिस कुमार ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश को सही बताया और याचिका खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

शिखर केमिकल्स ने इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यहां जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने इस केस की सुनवाई की और जस्टिस प्रशांत कुमार के फैसले पर कड़ी टिप्पणी की।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

“हाई कोर्ट के जज ने एक सिविल विवाद को जानबूझकर आपराधिक मामले की तरह ट्रीट किया है, जो न्यायिक प्रणाली के लिए बेहद चिंताजनक है।”

SC ने इस फैसले को “सबसे खराब और गलत आदेशों में से एक” करार दिया।

 क्यों नाराज हुआ सुप्रीम कोर्ट?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा कि:

जस्टिस कुमार ने यह कहा कि सिविल उपाय अपनाना सही नहीं होगा क्योंकि उसमें समय लग सकता है।

इसलिए शिकायतकर्ता को आपराधिक कार्यवाही की अनुमति दी जानी चाहिए।

इस पर SC ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि,

“यह सोचना ही गलत है कि देरी के कारण आपराधिक केस शुरू कर देना चाहिए।”

SC ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट के जज को यह समझना चाहिए था कि आरोपों की प्रकृति क्या है — क्या मामला आपराधिक है भी या नहीं।

अगला कदम क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस प्रशांत कुमार का आदेश रद्द कर दिया।

केस को दोबारा विचार के लिए हाई कोर्ट वापस भेज दिया गया, लेकिन यह साफ कहा गया कि इस बार कोई और जज इस केस की सुनवाई करेंगे।

इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया कि जस्टिस प्रशांत कुमार को अब कोई भी आपराधिक केस न दिया जाए, और अगर दिया जाए तो सीनियर जज की निगरानी में।

न्यायपालिका के लिए क्या सीख?

यह मामला केवल एक फैसले की समीक्षा नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर जिम्मेदारी और न्यायिक अनुशासन की याद दिलाता है। यह दिखाता है कि कैसे एक जज का निर्णय न केवल पक्षों को प्रभावित करता है, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था की साख पर असर डाल सकता है।

The Supreme Court of India has barred Allahabad High Court Judge Justice Prashant Kumar from hearing criminal cases until his retirement after he wrongly treated a civil dispute between Lalita Textile Concern and Shikhar Chemicals as a criminal matter under IPC 406. The apex court, led by Justices JB Pardiwala and R Mahadevan, criticized the judge’s reasoning as one of the most erroneous legal orders, emphasizing that civil issues must not be mischaracterized as criminal just because of procedural delays. This strong stance by the Supreme Court reaffirms judicial accountability and integrity in the Indian judiciary system.

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