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वकील ने दर्ज कराए झूठे केस, अदालत से मिली उम्रकैद और 5 लाख का जुर्माना

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AIN NEWS 1 | लखनऊ की एक विशेष अदालत ने हाल ही में एक बेहद अहम फैसला सुनाया है, जिसने न्याय व्यवस्था में कानून के दुरुपयोग की गंभीरता को उजागर किया है। एडवोकेट परमानंद गुप्ता (Advocate Parmanand Gupta) को अदालत ने दोषी पाते हुए आजीवन कारावास (Life Imprisonment) और ₹5 लाख का जुर्माना लगाया है। गुप्ता पर आरोप था कि उन्होंने व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए SC/ST एक्ट जैसे संवेदनशील कानून का गलत इस्तेमाल किया और अपने विरोधियों के खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज करवाए।

यह फैसला न केवल पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में अहम कदम है, बल्कि उन लोगों के लिए भी सख्त चेतावनी है जो कानून की आड़ में अपनी निजी रंजिशें मिटाने का प्रयास करते हैं।

मामला कैसे शुरू हुआ?

कहानी की शुरुआत एक संपत्ति विवाद से हुई। गुप्ता की पत्नी संगीता और पड़ोस में रहने वाले यादव परिवार के बीच जायदाद को लेकर मतभेद चल रहे थे। इसी विवाद का फायदा उठाते हुए गुप्ता ने योजना बनाई और पूजा रावत नाम की एक दलित महिला को मोहरे की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।

जांच में सामने आया कि गुप्ता ने खुद लगभग 18 फर्जी मामले दर्ज कराए थे, जबकि पूजा रावत के नाम से करीब 11 और केस पुलिस में दर्ज करवाए गए। इन मामलों में बलात्कार, छेड़छाड़ और SC/ST एक्ट जैसे गंभीर अपराधों के झूठे आरोप शामिल थे।

पूजा रावत की भूमिका

अदालत की सुनवाई के दौरान साफ हुआ कि पूजा रावत को गुप्ता ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। वह घटनास्थल पर मौजूद भी नहीं थीं, जबकि आरोप मार्च से जुलाई 2024 के बीच की घटनाओं से जुड़े हुए थे।

पूजा ने अदालत के सामने कहा कि उसे दबाव और डर दिखाकर झूठे बयान देने के लिए मजबूर किया गया। न्यायालय ने इस आधार पर उसे दोषमुक्त कर दिया, लेकिन चेतावनी दी कि भविष्य में इस तरह के किसी भी षड्यंत्र का हिस्सा बनने पर कड़ी कार्रवाई होगी।

अदालत का फैसला

विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने अपने आदेश में कहा कि इस तरह का अपराध न केवल पीड़ित पक्ष को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि पूरी न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।

अदालत के मुख्य आदेश:

  1. आजीवन कारावास और जुर्माना
    गुप्ता को उम्रकैद और ₹5 लाख का जुर्माना।

  2. बार काउंसिल को सूचना
    अदालत ने आदेश दिया कि इस फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश और भारत की बार काउंसिल को भेजी जाए ताकि गुप्ता पर वकालत करने और कोर्ट परिसर में प्रवेश करने पर रोक लग सके।

  3. पुलिस को निर्देश
    पुलिस को कहा गया कि यदि कोई व्यक्ति या परिवार बार-बार SC/ST या रेप जैसे मामलों की एफआईआर दर्ज कराता है तो उसका विशेष रिकॉर्ड तैयार किया जाए। इसके लिए AI आधारित टूल्स का इस्तेमाल कर पैटर्न की पहचान की जाए।

  4. न्यायपालिका की प्रतिष्ठा की रक्षा
    अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का गलत इस्तेमाल उसी तरह है जैसे “दूध के समुद्र में खट्टे की एक बूंद डालना।” इससे पूरे न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा डगमगाने लगता है।

बड़ा सबक

यह केस समाज और कानून दोनों के लिए बड़ी सीख लेकर आया है। संवेदनशील अधिनियमों का उद्देश्य पीड़ितों को सुरक्षा देना है, न कि किसी की व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने का हथियार बनना।

लखनऊ अदालत का यह फैसला साफ संदेश देता है कि चाहे अपराधी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, अगर वह कानून का दुरुपयोग करता है तो उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी।

न्यायालय का यह आदेश केवल गुप्ता जैसे वकील के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। अगर कोई व्यक्ति कानूनी प्रावधानों का गलत इस्तेमाल करेगा, तो उसका अंजाम बेहद गंभीर होगा।

इस फैसले ने यह भी साबित किया कि भारतीय न्यायपालिका अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने और न्याय के नाम पर हो रहे खिलवाड़ को रोकने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

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