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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: आपसी सहमति से बना रिश्ता धोखाधड़ी नहीं, बीएनएस की धारा 69 पर अहम टिप्पणी!

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AIN NEWS 1: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल के एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि लंबे समय तक आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को बाद में केवल रिश्ता टूट जाने के कारण ‘धोखाधड़ी’ नहीं कहा जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा मामला अपराध की श्रेणी में नहीं आता, बल्कि यह दो व्यक्तियों के बीच संबंध समाप्त होने से उत्पन्न हुई व्यक्तिगत निराशा का विषय हो सकता है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की खंडपीठ ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ नोएडा में दर्ज एक FIR को रद्द कर दिया, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत आरोप लगाए गए थे।

🔹 क्या था पूरा मामला?

मामले की शुरुआत 12 दिसंबर 2024 को हुई, जब एक महिला ने नोएडा सेक्टर-63 थाना में युवक के खिलाफ FIR दर्ज कराई। शिकायत में महिला ने आरोप लगाया था कि युवक ने उससे शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाए, बाद में उसे धमकाया और मारपीट भी की।

शिकायतकर्ता का कहना था कि युवक ने धोखे से संबंध बनाए, इसलिए उसके खिलाफ BNS की धारा 69 के तहत कार्रवाई की जाए। इस धारा में ऐसे मामलों को अपराध माना गया है, जहाँ किसी महिला से छल या धोखे के जरिए शारीरिक संबंध स्थापित किए जाते हैं।

🔹 हाईकोर्ट क्यों पहुंचा मामला?

FIR दर्ज होने के बाद आरोपी युवक ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और FIR को रद्द करने की मांग की। याची की ओर से अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि दोनों पक्षों के बीच संबंध पूरी तरह से आपसी सहमति से थे।

अधिवक्ता ने यह भी बताया कि याची और शिकायतकर्ता जोधपुर में एक साथ LLM की पढ़ाई कर चुके हैं और उनके बीच संबंध लंबे समय तक चले। ऐसे में इसे जबरन या धोखे से बनाया गया रिश्ता नहीं कहा जा सकता।

🔹 अदालत का अहम अवलोकन

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने BNS की धारा 69 की गहराई से व्याख्या की। कोर्ट ने कहा कि:

यदि कोई रिश्ता लंबे समय तक आपसी सहमति से चला है,

दोनों वयस्क हैं और अपनी समझ से संबंध में आए हैं,

और बाद में किसी कारणवश रिश्ता टूट जाता है,

तो केवल इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि शुरुआत से ही धोखाधड़ी की गई थी।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 69 का उद्देश्य ऐसे मामलों को दंडित करना है, जहाँ शुरू से ही मंशा गलत हो — यानी शादी का झूठा वादा केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए किया गया हो।

🔹 “रिश्ता टूटना अपराध नहीं”

खंडपीठ ने अपने फैसले में बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि हर टूटा हुआ रिश्ता अपराध की श्रेणी में नहीं आता। कई बार रिश्ते भावनात्मक कारणों, परिस्थितियों या मतभेदों की वजह से खत्म हो जाते हैं। इसे आपराधिक मामला बनाना कानून की मंशा के खिलाफ है।

कोर्ट ने कहा कि:

“आपसी सहमति से बने संबंधों के टूटने से उत्पन्न निराशा को धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।”

🔹 FIR क्यों रद्द की गई?

हाईकोर्ट ने पाया कि FIR में लगाए गए आरोपों से यह साबित नहीं होता कि आरोपी की मंशा शुरुआत से ही धोखा देने की थी। इसलिए BNS धारा 69 के तहत दर्ज FIR को रद्द कर दिया गया।

हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि FIR में अन्य गंभीर आरोप हों और उनके समर्थन में ठोस साक्ष्य हों, तो उन पर कानून अपने तरीके से आगे बढ़ सकता है। लेकिन केवल सहमति से बने रिश्ते को अपराध नहीं माना जा सकता।

🔹 क्यों है यह फैसला अहम?

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हाल के वर्षों में ‘शादी के झूठे वादे’ के आधार पर दर्ज मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे में यह निर्णय कानून के सही इस्तेमाल और दुरुपयोग के बीच की रेखा खींचता है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला:

सहमति और धोखे के अंतर को स्पष्ट करता है

वयस्कों के निजी संबंधों में अनावश्यक आपराधिक हस्तक्षेप को रोकता है

और कानून के संतुलित इस्तेमाल का उदाहरण पेश करता है

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय न केवल BNS की धारा 69 की स्पष्ट व्याख्या करता है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि हर भावनात्मक विफलता को आपराधिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। आपसी सहमति से बने रिश्तों की जिम्मेदारी दोनों पक्षों की होती है, और उनका टूटना हमेशा अपराध नहीं होता।

The Allahabad High Court clarified the scope of BNS Section 69 by ruling that a long-term consensual physical relationship cannot later be treated as cheating merely because the relationship ended. Quashing an FIR filed in Noida, the court emphasized that cheating under Indian law requires proof of deception or false intent from the beginning, and consensual relationships between adults do not automatically attract criminal liability.

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