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इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त आदेश: SC/ST एक्ट केस में 4.5 लाख लौटाने का निर्देश, 5 लाख का जुर्माना भी!

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त आदेश: SC/ST एक्ट केस में 4.5 लाख लौटाने का निर्देश, 5 लाख का जुर्माना भी

AIN NEWS 1 State Advisor (UP): Advocate Pawan Kumar Tiwari, Allahabad: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में न सिर्फ एक आपराधिक अपील को खारिज किया, बल्कि शिकायतकर्ता और उनकी बहुओं को सरकार से मिली 4.5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता वापस करने का आदेश भी दिया। इतना ही नहीं, न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप और भ्रम पैदा करने की कोशिश पर अपीलकर्ताओं पर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

यह आदेश जस्टिस शेखर कुमार यादव की बेंच ने सुनाया।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 2021 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। एफआईआर में भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराएँ—147, 148, 149, 323, 504, 506, 452 और 354(ख)—के साथ-साथ SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(va) भी लगाई गई थी। आरोप था कि शिकायतकर्ता और उनके परिवार के साथ मारपीट, धमकी और आपराधिक कृत्य किए गए।

इस मामले में स्पेशल जज (SC/ST एक्ट), प्रयागराज ने 1 जुलाई 2024 को समन आदेश जारी किया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए रामेश्वर सिंह उर्फ रामेश्वर प्रताप सिंह और 18 अन्य लोगों ने हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की।

यह अपील SC/ST एक्ट की धारा 14-A(1) के तहत दाखिल की गई थी, जिसमें समन आदेश रद्द करने की मांग की गई थी।

अपीलकर्ताओं की दलील क्या थी?

सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं के वकील ने दावा किया कि एफआईआर सही तरीके से दर्ज नहीं हुई थी। उनका कहना था कि शिकायतकर्ता श्रीमती राम कली का अंगूठे का निशान एक खाली कागज पर लिया गया था और बाद में उस पर मनमर्जी से लिखकर एफआईआर दर्ज कर दी गई।

यह आरोप गंभीर था, क्योंकि अगर यह सही होता तो पूरी जांच और मुकदमे की नींव ही संदिग्ध हो जाती।

कोर्ट ने क्या किया?

कोर्ट ने इस आरोप को हल्के में नहीं लिया। जस्टिस यादव ने मामले की गंभीरता को देखते हुए डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (यमुनापार), जांच अधिकारी और खुद शिकायतकर्ता को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया।

दो दिन बाद जब दोबारा सुनवाई हुई, तो शिकायतकर्ता राम कली ने कोर्ट में यह स्वीकार किया कि उनका अंगूठे का निशान खाली कागज पर लिया गया था।

यह बयान चौंकाने वाला था।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य की ओर से पेश वकील ने शिकायतकर्ता के इस दावे का विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि 16 अप्रैल 2021 को राम कली की लिखित शिकायत के आधार पर विधिवत एफआईआर दर्ज की गई थी।

साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि:

शिकायतकर्ता और उनकी दो बहुओं के बयान CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज हुए थे।

बाद में CrPC की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने भी बयान दर्ज हुए।

इन बयानों में तीनों महिलाओं ने अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन किया था।

राज्य सरकार की ओर से तीनों महिलाओं को कुल 4.5 लाख रुपये (प्रत्येक को 1.5 लाख) का मुआवजा भी दिया गया था।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम पर गहरी चिंता जताई। जस्टिस शेखर कुमार यादव ने कहा कि जब शिकायतकर्ता ने शपथपूर्वक बयान दिए, मुआवजा प्राप्त किया और कानूनी प्रक्रिया में भाग लिया, तब अब जाकर एफआईआर से ही इनकार करना गंभीर मामला है।

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह आचरण प्रथम दृष्टया न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग प्रतीत होता है। साथ ही, SC/ST एक्ट जैसे महत्वपूर्ण कानून के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल भी नजर आता है।

न्यायालय ने इसे आपराधिक न्याय प्रणाली को गुमराह करने और राज्य को धोखा देने की संभावित कोशिश बताया।

मुआवजा लौटाने का आदेश

कोर्ट ने आदेश दिया कि शिकायतकर्ता राम कली और उनकी दोनों बहुएं सरकार से प्राप्त 4.5 लाख रुपये की पूरी राशि संबंधित प्राधिकरण को वापस करें।

अदालत का मानना था कि जब अब शिकायतकर्ता खुद ही मामले से पीछे हट रही हैं और पूर्व बयानों से इनकार कर रही हैं, तो ऐसे में सरकारी मुआवजा बनाए रखना उचित नहीं है।

5 लाख रुपये का जुर्माना

सिर्फ यहीं तक बात नहीं रुकी।

कोर्ट ने अपीलकर्ताओं पर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। अदालत का कहना था कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और भ्रम की स्थिति पैदा करने की कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

उन्हें निर्देश दिया गया कि 20 दिनों के भीतर यह राशि हाईकोर्ट वेलफेयर फंड में जमा कराई जाए। यदि समय पर भुगतान नहीं हुआ, तो रजिस्ट्रार जनरल को जबरन वसूली की कार्रवाई शुरू करने का अधिकार दिया गया।

ट्रायल कोर्ट को निर्देश

हाईकोर्ट ने स्पेशल जज (SC/ST एक्ट), प्रयागराज को निर्देश दिया कि वे चल रहे ट्रायल को कानून के अनुसार आगे बढ़ाएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता के बदलते रुख या हाईकोर्ट की टिप्पणियों से ट्रायल प्रभावित नहीं होना चाहिए।

मतलब साफ है—मुकदमे की प्रक्रिया अपने कानूनी आधार पर जारी रहेगी।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

यह आदेश कई मायनों में अहम है।

अदालत ने साफ संदेश दिया कि किसी भी कानून—चाहे वह कितना भी संवेदनशील क्यों न हो—का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

न्यायिक प्रक्रिया में विरोधाभासी बयान देकर भ्रम पैदा करने वालों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया जाएगा।

सरकारी मुआवजा केवल उन्हीं मामलों में वैध है, जहां शिकायत और बयान सुसंगत और विश्वसनीय हों।

यह फैसला यह भी दर्शाता है कि अदालतें न केवल आरोपियों के अधिकारों की रक्षा करती हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं।

रामेश्वर सिंह @ रामेश्वर प्रताप सिंह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जो आदेश दिया है, वह न्यायिक व्यवस्था की गंभीरता और संतुलन को दर्शाता है।

एक ओर कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया, दूसरी ओर शिकायतकर्ता को मिला मुआवजा लौटाने का निर्देश देकर स्पष्ट किया कि कानून के साथ खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जाएगा।

यह फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल बन सकता है।

In a significant ruling, the Allahabad High Court dismissed a criminal appeal filed under Section 14-A(1) of the SC/ST Act and ordered the complainant to refund ₹4.5 lakh compensation received from the government. The bench of Justice Shekhar Kumar Yadav observed that contradictory statements regarding the FIR and allegations of misuse of the SC/ST Act indicated a possible manipulation of the judicial process. The court also imposed a ₹5 lakh fine on the appellants and directed the Prayagraj Special Court to continue the trial strictly in accordance with law.

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