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अंकिता भंडारी मर्डर केसः इंसाफ के बाद भी टूट चुके हैं मां-बाप, घर में कैद जिंदगी और खत्म होती उम्मीद!

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AIN NEWS 1: उत्तराखंड की पहाड़ियों में बसा एक छोटा-सा गांव दोभश्रीकोट आज भी एक बेटी की चीखें अपने भीतर दबाए बैठा है। यह वही गांव है, जहां की रहने वाली थी अंकिता भंडारी — एक साधारण परिवार की बेटी, जो सपनों के साथ ऋषिकेश के वनंतरा रिजॉर्ट में नौकरी करने गई थी। लेकिन 18 सितंबर 2022 की वह रात उसके परिवार के लिए कभी खत्म न होने वाला अंधेरा बन गई।

अंकिता की हत्या सिर्फ एक अपराध नहीं थी, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल थी, जहां ताकत और रसूख के सामने इंसान की जान की कीमत शून्य हो जाती है। आरोप है कि ‘एक्स्ट्रा सर्विस’ देने से इनकार करने पर उसकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। सबूत मिटाने के लिए उसका कमरा तक तोड़ दिया गया। मामला धीरे-धीरे पूरे उत्तराखंड में आंदोलन का रूप ले गया।

मीडिया, आंदोलन और टूटते मां-बाप

दिल्ली से लेकर देहरादून तक, देशभर का मीडिया अंकिता के माता-पिता के घर के बाहर डेरा जमाए रहा। कैमरे, माइक और सवाल — सब कुछ उनके जख्मों को बार-बार कुरेदता रहा। लेकिन दर्द इतना गहरा था कि वे खुद को घर में बंद कर लेने को मजबूर हो गए।

एक पत्रकार जब उनसे मिलने पहुंचीं, तो अंकिता की मां ने एक शर्त रखी —

“आप मुझसे पत्रकार बनकर नहीं, मेरी बेटी बनकर बात करेंगी।”

इसके बाद जो टूटा, वह सिर्फ एक मां नहीं थी। वह एक ऐसी औरत थी, जो अपनी बेटी को खो चुकी थी, इंसाफ के लिए लड़ी थी और अब जिंदगी से हारती नजर आ रही थी। रोते-रोते वह पूछ बैठीं —

“क्या हम मर जाएं? सुबह से कुछ खाया नहीं है। न कमाई है, न राशन खरीदने के पैसे।”

उनके पति गंभीर रूप से बीमार हैं। गांव के लोग, रिश्तेदार, यहां तक कि पड़ोसी भी धीरे-धीरे दूर हो गए। दर्द के साथ अकेलापन जुड़ गया।

इंसाफ मिला, लेकिन जिंदगी नहीं

30 मई 2025 को कोटद्वार की अदालत ने इस मामले में पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत का फैसला आया, लेकिन पीड़ित परिवार के हालात नहीं बदले।

हाल ही में एक ऑडियो क्लिप वायरल हुई, जिसने इस मामले को फिर से चर्चा में ला दिया। सड़कों पर नारे लगे, उत्तराखंड बंद हुआ, लेकिन इन सबके बीच अंकिता के माता-पिता अपने ही घर में कैद होकर रह गए।

वे कहते हैं —

“लोगों को बयान चाहिए, हमारी जिंदगी नहीं।”

गांव तक पहुंचने का संघर्ष

गढ़वाल जिले के श्रीनगर से करीब 45 किलोमीटर दूर, पहाड़ों के बीच बसा है बरसूड़ी गांव। यहां से नीचे उतरकर करीब सात किलोमीटर पैदल चलने पर दोभश्रीकोट गांव आता है। रास्ता इतना कठिन है कि कहीं पगडंडी है, तो कहीं रास्ता ही गायब हो जाता है।

गांव में मुश्किल से दो-तीन परिवार रहते हैं। चारों ओर जंगल है। रात के समय भालू और बाघ तक गांव के पास आ जाते हैं।

अंकिता का घर उत्तराखंड की पारंपरिक शैली में पत्थरों से बना है। तीन कमरे हैं और हर कमरे के बाहर ताले लटके हुए हैं। बीच में खुला आंगन है, जहां चूल्हे पर रखा एल्युमिनियम का पतीला अब काला पड़ चुका है। सामने एक बछिया बंधी है — जैसे किसी पुराने जीवन की आखिरी निशानी।

समाज से कट चुकी जिंदगी

अंकिता के माता-पिता अब किसी से मिलना नहीं चाहते। न मीडिया से, न नेताओं से, न समाज से। वे कहते हैं कि हर मुलाकात उन्हें फिर उसी दिन में ले जाती है, जब उनकी बेटी लौटकर नहीं आई थी।

न नौकरी है, न नियमित आय। इंसाफ की लड़ाई में जो थोड़ी-बहुत ताकत थी, वह भी अब खत्म हो चुकी है। गांव में चर्चा है, आंदोलन है, लेकिन उनके घर में सिर्फ सन्नाटा है।

यह कहानी सिर्फ अंकिता की नहीं

अंकिता भंडारी का मामला अब सिर्फ एक हत्या नहीं रहा। यह सवाल बन चुका है —

क्या इंसाफ मिल जाने से पीड़ित परिवार की जिंदगी सच में बेहतर हो जाती है?

यह कहानी उन मां-बाप की है, जिन्होंने अपनी बेटी के लिए लड़ाई लड़ी, जीती भी… लेकिन खुद हार गए। पहाड़ों के बीच खड़ा वह घर आज भी पूछता है —

क्या न्याय सिर्फ अदालत की फाइलों तक सीमित है?

The Ankita Bhandari murder case remains one of the most shocking crime stories in Uttarakhand. Despite the life imprisonment verdict against Pulkit Arya and others, Ankita Bhandari’s parents continue to struggle with poverty, isolation, and trauma. This ground report highlights the emotional impact of the Vanantra resort murder case and raises serious questions about justice, victim support, and life after court verdicts.

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