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अरावली पर्वतमाला: भारत से भी पुराना इतिहास, अब वजूद पर मंडराता खतरा!

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AIN NEWS 1: जब हम भारत के पहाड़ों की बात करते हैं तो सबसे पहले हिमालय का नाम सामने आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हिमालय से भी कहीं ज्यादा पुरानी, दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक अरावली आज खामोशी से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

अरावली कोई साधारण पहाड़ी श्रृंखला नहीं है। इसका जन्म उस दौर में हुआ था जब न गंगा अस्तित्व में थी, न हिमालय, और न ही आज की तरह महाद्वीप अलग-अलग दिखाई देते थे। यह वह समय था जब पृथ्वी पर जीवन की शुरुआती हलचल शुरू हो रही थी।

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🔹 250 करोड़ साल पुरानी धरती की गवाह

वैज्ञानिकों के अनुसार अरावली पर्वतमाला की उम्र करीब 250 करोड़ साल है। यह इसे दुनिया की सबसे पुरानी फोल्डेड माउंटेन रेंज बनाती है। उस समय पृथ्वी की सतह आज जैसी स्थिर नहीं थी। टेक्टोनिक प्लेट्स आपस में टकरा रही थीं, जुड़ रही थीं और टूट रही थीं। इन्हीं भू-गर्भीय हलचलों के दौरान अरावली का निर्माण हुआ।

आज जहां हिमालय युवा पर्वत माना जाता है, वहीं अरावली एक बुज़ुर्ग पर्वतमाला है, जो समय के साथ घिसती चली गई। यही कारण है कि इसकी ऊंचाई हिमालय की तुलना में कम है। लेकिन कम ऊंचाई का मतलब कम महत्व बिल्कुल नहीं होता।

🔹 अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं, एक जीवन रेखा

अरावली पर्वतमाला गुजरात से लेकर दिल्ली तक फैली हुई है और राजस्थान, हरियाणा व दिल्ली के बड़े हिस्से को छूती है। यह पर्वतमाला थार रेगिस्तान को पूर्वी भारत की हरियाली से अलग करने वाली प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती है।

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अगर अरावली न होती, तो थार का रेगिस्तान बहुत पहले ही गंगा के मैदानों तक फैल चुका होता।

इसके अलावा अरावली:

भूजल रिचार्ज में मदद करती है

मानसून की दिशा को प्रभावित करती है

जैव विविधता का बड़ा केंद्र है

दिल्ली-NCR की हवा को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती है

🔹 खनन और विकास की आड़ में विनाश

इतनी ऐतिहासिक और पर्यावरणीय अहमियत के बावजूद अरावली आज सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। खनन, पत्थर तोड़ने, अवैध निर्माण और रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स ने इस पर्वतमाला को अंदर से खोखला कर दिया है।

राजस्थान और हरियाणा के कई इलाकों में अरावली की पहाड़ियों को समतल किया जा चुका है। कहीं पहाड़ काटे गए, कहीं उनकी ऊंचाई कम की गई, तो कहीं उन्हें “बेकार ज़मीन” बताकर मिटा दिया गया।

यह ठीक वैसा ही है जैसे यह कहना कि जो जीव लंबे नहीं हैं, उन्हें खत्म कर देना चाहिए।

🔹 अदालतों के आदेश, फिर भी हालात खराब

सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) कई बार अरावली को बचाने के आदेश दे चुके हैं। खनन पर प्रतिबंध भी लगाया गया, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे अलग है।

अवैध खनन आज भी जारी है, बस उसके तरीके बदल गए हैं। रात के अंधेरे में पहाड़ काटे जाते हैं और सुबह तक ट्रक निकल जाते हैं। प्रशासनिक मिलीभगत के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं।

🔹 दिल्ली की सांसों से जुड़ी अरावली

दिल्ली और NCR क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण के पीछे अरावली का क्षरण भी एक बड़ी वजह है। यह पर्वतमाला धूल भरी हवाओं को रोकने और तापमान संतुलन बनाए रखने में मदद करती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अरावली पूरी तरह नष्ट हो गई, तो दिल्ली एक स्थायी “डस्ट बाउल” में बदल सकती है।

🔹 जैव विविधता पर भी खतरा

अरावली सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं है। यहां:

तेंदुए

सियार

नीलगाय

सैकड़ों पक्षी प्रजातियां

दुर्लभ पौधे

पाए जाते हैं। पहाड़ियों के कटते ही इनका प्राकृतिक आवास खत्म हो रहा है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहा है।

🔹 क्या अब भी बचाई जा सकती है अरावली?

पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर सख्त कानून लागू किए जाएं, अवैध खनन रोका जाए और स्थानीय समुदायों को संरक्षण से जोड़ा जाए, तो अरावली को अभी भी बचाया जा सकता है।

यह सिर्फ पर्यावरण का सवाल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का मुद्दा है।

The Aravalli Range is one of the oldest mountain ranges in the world, dating back nearly 2.5 billion years. Located across western and northern India, the Aravalli mountains play a crucial role in preventing desertification, supporting biodiversity, regulating climate, and recharging groundwater. Despite its geological and environmental importance, the Aravalli Range is facing severe threats from illegal mining, urban expansion, and deforestation. Protecting the Aravalli Range is essential for India’s environmental balance, especially for regions like Delhi-NCR and Rajasthan.

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