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प्रदेश संगठन महामंत्री की परीक्षा में फेल हुए बीजेपी के कई जिलाध्यक्ष, नोएडा बैठक में खुली पोल!

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AIN NEWS 1 गाजियाबाद/नोएडा: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का संगठन हमेशा से चुनावी जीत की रीढ़ माना जाता रहा है। लेकिन हाल ही में नोएडा में हुई एक समीक्षा बैठक ने पार्टी के पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठन की जमीनी हकीकत सामने रख दी। प्रदेश संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने जब जिलाध्यक्षों और महानगर अध्यक्षों से बूथ और शक्ति केंद्रों से जुड़े सवाल पूछे, तो अधिकतर नेता जवाब देने में असमर्थ रहे। यह स्थिति देखकर खुद संगठन महामंत्री भी नाराज़ हो उठे।

नोएडा की बैठक का माहौल

यह बैठक अनुसूचित मोर्चा की समीक्षा बैठक के बाद बुलाई गई थी। सूत्रों के मुताबिक बैठक का मकसद आगामी पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन की मजबूती को परखना था।

जब धर्मपाल सिंह ने एक-एक कर जिलाध्यक्षों से सवाल पूछने शुरू किए, तो कई अध्यक्षों के चेहरे उतर गए। सवाल साधारण थे –

बूथ अध्यक्ष कौन हैं?

शक्ति केंद्र प्रमुख का नाम बताइए?

बूथों की सक्रियता कितनी है?

लेकिन अधिकतर जिलाध्यक्ष इन बुनियादी सवालों का जवाब नहीं दे सके।

किन जिलों का रहा खराब प्रदर्शन

सूत्रों के अनुसार सबसे पहले रामपुर के अध्यक्ष असफल हुए। इसके बाद गाजियाबाद जिला और महानगर, फिर मेरठ जिला और मेरठ महानगर के अध्यक्षों की भी स्थिति बेहद खराब रही।

यहां तक कि नोएडा के दोनों अध्यक्ष भी रिपोर्ट पेश करने में फेल साबित हुए।

गाजियाबाद के अध्यक्षों की स्थिति तो इतनी खराब रही कि वे बूथ अध्यक्षों और शक्ति केंद्र प्रमुखों के नाम तक नहीं बता पाए।

धर्मपाल सिंह का सख्त संदेश

धर्मपाल सिंह ने बैठक में साफ शब्दों में कहा –

“अगर बूथ मजबूत नहीं होगा तो चुनावी जीत की गारंटी नहीं दी जा सकती। बूथ जीतो, चुनाव जीतो – यही मंत्र है।”

उन्होंने चेतावनी दी कि केवल बैठकों में मालाएँ पहनकर फोटो खिंचवाने से संगठन मजबूत नहीं होता। काम करके दिखाना होगा, वरना कुर्सी पर बने रहना मुश्किल होगा।

कौन रहे बेहतर

हालांकि, सब जिलों का प्रदर्शन खराब नहीं था।

बिजनौर

बुलंदशहर

सहारनपुर जिला और महानगर

की रिपोर्ट अपेक्षाकृत बेहतर रही।

कार्यकर्ताओं की आवाज

समीक्षा बैठक के बाद कार्यकर्ताओं के मन की बात भी सामने आई।

गाजियाबाद के एक बूथ कार्यकर्ता ने कहा –

“हम दिन-रात बूथ पर काम करते हैं। लेकिन जब जिला अध्यक्ष ही हमें पहचानते नहीं तो हमारी मेहनत का क्या फायदा? इससे मनोबल टूटता है।”

मेरठ के एक पुराने कार्यकर्ता ने कहा –

“बीजेपी की असली ताकत बूथ कार्यकर्ता है। अगर जिलाध्यक्ष उनसे कटे रहेंगे तो संगठन खोखला हो जाएगा।”

नोएडा के एक युवा नेता ने कहा –

“आजकल नए जिलाध्यक्ष सिर्फ सोशल मीडिया और फोटो तक सीमित हैं। लेकिन चुनाव इंस्टाग्राम पर नहीं, बूथ पर जीते जाते हैं।”

नेताओं की प्रतिक्रिया

बुलंदशहर के एक जिलाध्यक्ष, जिनका प्रदर्शन बेहतर रहा, ने कहा –

“हमने पहले से ही बूथ और शक्ति केंद्रों की पूरी सूची तैयार कर ली थी। यही कारण रहा कि हमारी रिपोर्ट संतोषजनक रही।”

एक भाजपा विधायक ने टिप्पणी की –

“यह समीक्षा बेहद ज़रूरी थी। धर्मपाल सिंह का रुख सख्त है और होना भी चाहिए। 2027 विधानसभा चुनाव तक अगर संगठन को कस कर नहीं रखा गया तो नुकसान हो सकता है।”

संगठनात्मक कमजोरी – कारण क्या हैं?

राजनीतिक जानकारों के अनुसार जिलाध्यक्षों की असफलता के पीछे कई कारण हो सकते हैं –

1. नए जिलाध्यक्षों का अनुभवहीन होना – कई जिलों में हाल ही में नियुक्तियाँ हुई हैं।

2. औपचारिकता तक सीमित होना – कुछ नेता सिर्फ कार्यक्रमों में शामिल होने और दिखावे तक सीमित रह गए हैं।

3. जमीनी स्तर से दूरी – बूथ कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद न होना सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो रही है।

पंचायत और विधानसभा चुनाव पर असर

भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव और आने वाले पंचायत चुनावों की तैयारियों में जुटी है। पार्टी जानती है कि बूथ स्तर पर कमजोरी से चुनावी समीकरण बिगड़ सकते हैं।

धर्मपाल सिंह की समीक्षा ने साफ कर दिया है कि अब संगठन की कसौटी और सख्त होगी।

भविष्य की तस्वीर

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले महीनों में भाजपा संगठनात्मक स्तर पर कई बदलाव कर सकती है।

निष्क्रिय जिलाध्यक्षों को बदला जा सकता है।

जमीनी कार्यकर्ताओं को अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है।

संगठन की समीक्षा सभी जिलों में दोहराई जाएगी।

भाजपा हमेशा से अपने बूथ प्रबंधन और संगठनात्मक मजबूती पर गर्व करती आई है। लेकिन नोएडा की बैठक में सामने आया सच यह दिखाता है कि संगठन के निचले स्तर पर अभी भी बड़ी चुनौतियाँ हैं।

धर्मपाल सिंह की सख्ती से संकेत साफ हैं – अब केवल नाम का जिलाध्यक्ष चलने वाला नहीं है। जो काम करेगा वही टिकेगा।

In a crucial BJP review meeting held in Noida, state organization minister Dharmapal Singh expressed strong dissatisfaction as several district and city presidents from western Uttar Pradesh failed to provide details about booth committees and Shakti Kendra heads. Party workers criticized their leaders, saying grassroots efforts are often ignored. Analysts believe this organizational weakness could impact upcoming Panchayat and 2027 Assembly elections. While districts like Rampur, Ghaziabad, and Meerut performed poorly, Bijnor, Bulandshahr, and Saharanpur presented better reports. The BJP leadership may soon replace non-performing presidents to strengthen booth-level management for future victories.

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