दिल्ली-NCR की जहरीली हवा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CJI बोले- AQI 400 के करीब, आखिर प्रदूषण रोकने के लिए सरकार ने क्या किया?
AIN NEWS 1 नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में बढ़ते वायु प्रदूषण ने एक बार फिर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। सर्दियों की शुरुआत के साथ ही दिल्ली की हवा जहरीली होती जा रही है। हालात ऐसे हैं कि कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 400 के पार पहुंच गया है। हवा में घुले प्रदूषक कण लोगों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन रहे हैं। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण के मुद्दे पर सुनवाई करते हुए केंद्र और संबंधित सरकारी एजेंसियों से सवाल किए।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने प्रदूषण के बढ़ते स्तर पर नाराजगी जताते हुए कहा कि लगातार बैठकें हो रही हैं, बयान दिए जा रहे हैं और सुझाव भी सामने आ रहे हैं, लेकिन जमीनी स्थिति में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि जब दिल्ली का AQI लगभग 400 तक पहुंच रहा है, तो प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं?
इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के अलावा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।
रोज 30 सिगरेट पीने जैसा खतरा, अदालत में उठी गंभीर चिंता
सुनवाई के दौरान अदालत में मौजूद एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) अपराजिता सिंह ने दिल्ली की प्रदूषित हवा से होने वाले स्वास्थ्य संबंधी खतरों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने प्रदूषण की गंभीरता समझाते हुए इसकी तुलना रोजाना करीब 30 सिगरेट पीने से होने वाले नुकसान से की।
यह तुलना प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को समझाने के लिए दी गई थी। इसे किसी व्यक्ति के वास्तविक सिगरेट सेवन या वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित निश्चित मात्रा के बराबर नहीं समझना चाहिए।
दरअसल, दिल्ली-NCR की हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। PM2.5 इतने छोटे होते हैं कि फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से अस्थमा, सांस लेने में परेशानी, फेफड़ों की बीमारियां और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस या दिल की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए ऐसी हवा विशेष रूप से नुकसानदायक हो सकती है।
वाहनों का धुआं प्रदूषण की बड़ी वजह, दिल्ली-NCR के ट्रैफिक पर सुप्रीम कोर्ट की नजर
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के पीछे वाहनों से निकलने वाले धुएं को एक प्रमुख कारण बताया। अदालत ने दिल्ली की सड़कों और आसपास के शहरों को जोड़ने वाले मार्गों पर लगातार बढ़ते ट्रैफिक पर चिंता व्यक्त की।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि दिल्ली से गाजियाबाद, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम और फरीदाबाद को जोड़ने वाली सड़कों पर वाहनों की भारी आवाजाही दिखाई देती है। कई जगहों पर बंपर-टू-बंपर ट्रैफिक की स्थिति रहती है।
अदालत का मानना था कि इतनी बड़ी संख्या में वाहनों का सड़कों पर चलना और ट्रैफिक जाम में लंबे समय तक खड़े रहना प्रदूषण की समस्या को गंभीर बना रहा है।
विशेष रूप से पुराने और अधिक धुआं छोड़ने वाले वाहन, डीजल से चलने वाले वाहन तथा यातायात का दबाव वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इसलिए केवल प्रदूषण बढ़ने के बाद प्रतिबंध लगाने के बजाय परिवहन व्यवस्था में दीर्घकालिक सुधार की जरूरत है।
सरकार ने अदालत में गिनाए प्रदूषण रोकने के उपाय
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को प्रदूषण नियंत्रण के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार की रणनीति पांच प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित है।
1. औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला प्रदूषण।
2. वाहनों से होने वाला उत्सर्जन।
3. निर्माण और तोड़फोड़ के दौरान उड़ने वाली धूल।
4. सड़कों की धूल और अन्य स्थानीय प्रदूषण स्रोत।
5. खेतों में पराली जलाने से निकलने वाला धुआं।
सरकार की ओर से बताया गया कि कुछ श्रेणियों के वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए प्रमाणपत्र जारी करने वाले केंद्रों की जियो-टैगिंग की जा रही है।
इसके अलावा सड़कों पर दिखाई देने वाले अधिक धुआं छोड़ने वाले वाहनों के खिलाफ शिकायतों और सोशल मीडिया के माध्यम से मिलने वाली सूचनाओं के आधार पर कार्रवाई की व्यवस्था भी की गई है।
हालांकि, अदालत की चिंता यह थी कि इन उपायों के बावजूद दिल्ली की हवा लगातार खराब हो रही है। इसलिए अब तत्काल प्रभाव वाले कदमों के साथ मध्यम और दीर्घकालिक योजनाओं को भी प्रभावी ढंग से लागू करना जरूरी है।
पराली जलाने का मुद्दा भी उठा, किसानों को मशीनों के इस्तेमाल के लिए जागरूक करने पर जोर
दिल्ली-NCR के प्रदूषण में हर साल पराली जलाने का मुद्दा प्रमुखता से सामने आता है। पंजाब, हरियाणा और आसपास के कृषि क्षेत्रों में फसल कटाई के बाद खेतों में बचा अवशेष जलाने से निकलने वाला धुआं मौसम की परिस्थितियों के अनुसार दिल्ली तक पहुंच सकता है।
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से बताया गया कि 5 नवंबर को दिल्ली के प्रदूषण में पराली जलाने की हिस्सेदारी लगभग 14 प्रतिशत रही।
सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या का समाधान केवल किसानों पर कार्रवाई करने तक सीमित रखने के बजाय उन्हें जागरूक करने और वैकल्पिक व्यवस्थाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया।
अदालत ने कहा कि किसानों को ऐसी मशीनों और तकनीकों के इस्तेमाल के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए, जिनकी मदद से फसल के अवशेषों का निपटारा बिना जलाए किया जा सके।
पराली प्रबंधन के लिए किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन, मशीनों की उपलब्धता और स्थानीय स्तर पर संग्रहण की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण मानी गई।
गरीब और मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों की ओर भी ध्यान दिलाया। अदालत ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर लोग प्रदूषण का सबसे अधिक नुकसान झेलते हैं, क्योंकि उन्हें रोजी-रोटी के लिए सड़कों और खुले स्थानों पर काम करना पड़ता है।
निर्माण श्रमिक, रेहड़ी-पटरी लगाने वाले, डिलीवरी कर्मचारी, रिक्शा चालक और दिहाड़ी मजदूर लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने को मजबूर होते हैं।
अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि त्योहारों का समय इन लोगों के लिए कमाई का महत्वपूर्ण अवसर होता है। ऐसे में प्रदूषण नियंत्रण के उपाय बनाते समय उनकी आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव को भी समझना आवश्यक है।
प्रदूषण का समाधान इस तरह होना चाहिए कि पर्यावरण की सुरक्षा के साथ-साथ गरीब और मेहनतकश लोगों की रोजी-रोटी भी प्रभावित न हो।
स्कूल बंद करने या हाइब्रिड कक्षाओं पर भी विचार
सुनवाई के दौरान बच्चों की सेहत से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा भी सामने आया। अदालत में ऐसी याचिका पर विचार किया गया, जिसमें मांग की गई थी कि जब AQI एक निर्धारित स्तर से ऊपर पहुंच जाए तो सभी आयु वर्ग के विद्यार्थियों के लिए स्कूल बंद किए जाएं या ऑनलाइन और ऑफलाइन पढ़ाई की हाइब्रिड व्यवस्था लागू की जाए।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल कोई व्यापक आदेश देने के बजाय विशेषज्ञों की राय के आधार पर निर्णय लेने की बात कही।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बच्चे बाहर खेलने, स्कूल आने-जाने और अन्य गतिविधियों के दौरान प्रदूषित हवा के संपर्क में आते हैं। लगातार खराब वायु गुणवत्ता उनकी सांस संबंधी सेहत को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, स्कूल बंद करने या हाइब्रिड कक्षाएं लागू करने का कोई नया सार्वभौमिक आदेश इस सुनवाई में जारी नहीं किया गया।
6 नवंबर को दिल्ली का AQI 391, कई इलाकों में स्थिति गंभीर
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बीच दिल्ली की वायु गुणवत्ता भी लगातार बिगड़ती दिखाई दी।
6 नवंबर 2026 को सुबह उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार दिल्ली का औसत AQI 391 तक पहुंच गया था। यह स्तर बेहद खराब (Very Poor) श्रेणी में आता है और गंभीर (Severe) श्रेणी की सीमा के काफी करीब है।
दिल्ली के 59 निगरानी केंद्रों में से 30 केंद्रों पर सुबह 9 बजे AQI 400 से ऊपर दर्ज किया गया। रोहिणी में AQI 475 और IIT दिल्ली के आसपास 472 तक पहुंच गया।
वायु गुणवत्ता सूचकांक की श्रेणियां इस प्रकार हैं:
– 0 से 50: अच्छा
– 51 से 100: संतोषजनक
– 101 से 200: मध्यम
– 201 से 300: खराब
– 301 से 400: बेहद खराब
– 401 से 500: गंभीर
इसका मतलब है कि दिल्ली का औसत AQI भले ही 400 से थोड़ा नीचे था, लेकिन राजधानी के कई इलाकों में हवा गंभीर श्रेणी में पहुंच चुकी थी।
GRAP के तहत प्रतिबंध और आगे की कार्रवाई
दिल्ली-NCR में प्रदूषण बढ़ने पर ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) लागू किया जाता है। इसके तहत वायु गुणवत्ता की स्थिति के अनुसार अलग-अलग चरणों में प्रतिबंध और नियंत्रण के उपाय किए जाते हैं।
इनमें निर्माण गतिविधियों पर नियंत्रण, धूल रोकने के उपाय, प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर कार्रवाई और औद्योगिक इकाइयों की निगरानी जैसे कदम शामिल हैं।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से यह स्पष्ट हुआ कि केवल आपातकालीन प्रतिबंधों से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, वाहनों की संख्या और उत्सर्जन नियंत्रित करना, निर्माण स्थलों पर धूल रोकना तथा पराली प्रबंधन को प्रभावी बनाना भी जरूरी है।
16 नवंबर को फिर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण से जुड़े इस मामले में आगे आदेश पारित करने की बात कही है। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 16 नवंबर 2026 की तारीख निर्धारित की है। दिवाली अवकाश के बाद मामले पर दोबारा विचार किया जाएगा।
इस सुनवाई में अदालत के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि दिल्ली-NCR के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सरकार और संबंधित एजेंसियों की योजनाएं जमीन पर कितनी प्रभावी साबित हो रही हैं।
दिल्ली-NCR के लोगों के लिए जरूरी सावधानी
वायु प्रदूषण के मौजूदा हालात को देखते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सामान्य सलाह है कि लोग अनावश्यक रूप से लंबे समय तक खुले वातावरण में रहने से बचें। विशेषकर बच्चों, बुजुर्गों और सांस या हृदय संबंधी परेशानी वाले लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
जरूरत पड़ने पर बाहर निकलते समय अच्छी फिटिंग वाला N95 मास्क इस्तेमाल किया जा सकता है। सुबह और शाम के समय बाहर व्यायाम करने से पहले स्थानीय AQI की स्थिति जरूर जांचें। घर के भीतर धुएं और अन्य प्रदूषण स्रोतों को भी कम रखें।
दिल्ली-NCR का प्रदूषण अब केवल मौसमी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, परिवहन व्यवस्था और पर्यावरण प्रबंधन से जुड़ी बड़ी चुनौती बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि केवल बैठकें, घोषणाएं और अस्थायी प्रतिबंध पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत ऐसे ठोस कदमों की है जिनका असर दिल्ली और आसपास के शहरों की हवा में दिखाई दे।
Delhi air pollution has become a major public health concern as the Air Quality Index (AQI) approaches 400 across several parts of the National Capital Region. The Supreme Court of India, led by Chief Justice Surya Kant, has raised serious concerns over vehicular emissions, traffic congestion, stubble burning and ineffective pollution control measures. Delhi’s AQI reached 391 on November 6, 2026, with several monitoring stations recording severe air quality. The court has emphasized immediate, medium-term and long-term solutions to tackle air pollution, improve public transport, control industrial emissions and protect vulnerable populations.



















