AIN NEWS 1: भोपाल जिला न्यायालय में एक ऐसा चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने न्याय व्यवस्था और बार काउंसिल की प्रमाणन प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक व्यक्ति, जो पिछले 18 वर्षों से खुद को वकील बताकर न्यायालय में पेश हो रहा था, असल में वकील था ही नहीं। उसने फर्जी दस्तावेजों के बल पर न केवल वकालत की, बल्कि सैकड़ों लोगों को कानूनी सलाह भी दी और उनसे पैसे भी वसूले।
फर्जी वकील की पहचान कैसे हुई?
इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब अधिवक्ता राजेश व्यास ने भोपाल के एमपी नगर थाने में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि एक व्यक्ति, जो खुद को रविन्द्र कुमार गुप्ता नाम से वकील बताता है, दरअसल फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर वकालत कर रहा है।
शिकायत की जांच के बाद ये खुलासा हुआ कि रविन्द्र कुमार गुप्ता ने मध्यप्रदेश राज्य अधिवक्ता परिषद का एक फर्जी प्रमाण पत्र तैयार किया था। इसके जरिए उसने वर्ष 2013 में भोपाल जिला अभिभाषक संघ की सदस्यता भी हासिल कर ली थी। उसे सदस्य संख्या 4008 दी गई थी।
बार काउंसिल प्रमाणपत्र भी निकला फर्जी
मामला यहीं नहीं रुका। रविन्द्र गुप्ता ने बाद में वर्ष 2016 में एक और फर्जी प्रमाण पत्र तैयार किया, जो कथित रूप से बार काउंसिल ऑफ एमपी द्वारा 17 अगस्त 1999 को जारी किया गया था। इस प्रमाण पत्र का क्रमांक 1629/1999 बताया गया।
जब जांच में इस प्रमाण पत्र की पुष्टि की गई, तो पता चला कि यह प्रमाण पत्र वास्तव में प्रदीप कुमार शर्मा, उज्जैन निवासी एक वैध अधिवक्ता के नाम पर जारी किया गया था। यानि रविन्द्र गुप्ता ने किसी और के नाम से नकली दस्तावेज तैयार कर अपने नाम पर इस्तेमाल किया।
असली दस्तावेज मांगे गए, फिर भी पेश किए नकली
इस खुलासे के बाद रविन्द्र कुमार गुप्ता को नोटिस भेजा गया और उसे अपने असली दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए कहा गया। 3 अप्रैल 2017 को उसने जो प्रमाण पत्र पेश किया, वह भी जांच में फर्जी पाया गया।
इस तरह, यह सिद्ध हो गया कि रविन्द्र गुप्ता न तो बार काउंसिल का पंजीकृत सदस्य था, और न ही वकील बनने के लिए कोई वैध योग्यता रखता था।
18 साल तक करता रहा धोखाधड़ी
सबसे हैरानी की बात यह रही कि रविन्द्र कुमार गुप्ता ने वर्ष 1999 से लेकर 2017 तक, करीब 18 सालों तक, भोपाल की विभिन्न अदालतों में काला कोट पहनकर वकालत की। उसने पुलिस, न्यायालय और पक्षकारों को लगातार धोखा दिया। इस अवधि में वह कई मामलों में पक्षकारों का प्रतिनिधित्व भी करता रहा।
इतना ही नहीं, उसने लोगों से अवैध रूप से फीस वसूली और उन्हें कानूनी सलाहें भी दीं, जबकि उसे ऐसा करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था।
किन धाराओं में मामला दर्ज हुआ?
इस गंभीर अपराध के चलते पुलिस ने उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया, जिसमें शामिल हैं:
धारा 419 – किसी अन्य व्यक्ति के रूप में धोखाधड़ी से पेश आना
धारा 420 – धोखा देकर किसी से धन प्राप्त करना
धारा 467 – फर्जी दस्तावेज तैयार करना
धारा 468 – धोखाधड़ी के इरादे से फर्जी दस्तावेज बनाना
धारा 471 – फर्जी दस्तावेज का प्रयोग करना
कोर्ट का फैसला: 3 साल की जेल और जुर्माना
इस केस की सुनवाई भोपाल के 25वें अपर सत्र न्यायाधीश श्री पहलाज सिंह कैमेथिया की अदालत में हुई। लोक अभियोजक सतीश समैया ने अभियोजन पक्ष की पैरवी की।
अदालत ने आरोप सिद्ध होने के बाद रविन्द्र कुमार गुप्ता को तीन साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई और चार हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
न्याय व्यवस्था पर सवाल, पर बड़ी सीख भी
यह मामला न केवल न्याय व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है, बल्कि समाज के लिए भी एक सबक है। 18 साल तक एक व्यक्ति फर्जी दस्तावेजों के दम पर अदालतों में खुलेआम वकालत करता रहा और किसी को शक नहीं हुआ। यह दिखाता है कि बार काउंसिल और न्यायालयों में दस्तावेजों की जांच व्यवस्था कितनी कमजोर हो सकती है।
रविन्द्र कुमार गुप्ता का मामला भले ही कानून के शिकंजे में आ गया हो, लेकिन यह घटना उन सभी संस्थाओं और लोगों के लिए एक चेतावनी है, जो बिना पृष्ठभूमि जांच किए किसी पर भरोसा कर लेते हैं। इस केस ने यह भी साबित किया कि सत्य चाहे जितना भी छिपाया जाए, वह एक दिन सामने आ ही जाता है।
अगर आप भी किसी अधिवक्ता से कानूनी सलाह ले रहे हैं, तो यह आवश्यक है कि आप उनकी योग्यता और पंजीकरण की जांच जरूर करें। क्योंकि कानून की लड़ाई में वकील आपकी सबसे बड़ी ढाल होता है — लेकिन अगर वो ही नकली निकले, तो इंसाफ मिलने से पहले ही इंसाफ खत्म हो सकता है।
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In a shocking revelation, a fake advocate named Ravindra Kumar Gupta practiced law for 18 years in Bhopal District Court using forged Bar Council of Madhya Pradesh certificates. The case was registered by advocate Rajesh Vyas at MP Nagar police station. The court, under Judge Pehlaj Singh Kamethia, sentenced Gupta to 3 years of imprisonment and imposed a fine of Rs. 4000. This incident highlights a serious loophole in legal verification processes and has raised concerns about legal ethics in India.


















