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ग्रेटर नोएडा हादसा: युवराज को बचाने के बाद चश्मदीद मनिंदर का आरोप—“पांच घंटे थाने में बैठाया गया, अब जान का खतरा”!

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AIN NEWS 1: ग्रेटर नोएडा में हुए दर्दनाक हादसे ने सिर्फ एक युवा की जान नहीं ली, बल्कि सिस्टम की कई खामियों को भी उजागर कर दिया। इस मामले में अब एक नया और चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है। हादसे के चश्मदीद मनिंदर, जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर युवराज को बचाने की कोशिश की थी, अब खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

मनिंदर का दावा है कि हादसे के बाद पुलिस ने उन्हें मददगार मानने के बजाय शक की नजर से देखा और करीब पांच घंटे तक थाने में बैठाए रखा। उनका कहना है कि उन्होंने जो देखा और जो किया, वही बात उन्होंने बार-बार पुलिस को बताई, इसके बावजूद उन्हें मानसिक दबाव में रखा गया।

हादसे का मंजर: “सब कुछ आंखों के सामने हुआ”

मनिंदर बताते हैं कि जिस वक्त हादसा हुआ, वह मौके पर मौजूद थे। बेसमेंट में पानी भरा हुआ था और एक कार तेजी से अंदर डूब रही थी। कार के अंदर युवराज फंसा हुआ था और बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था।

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मनिंदर कहते हैं,

“उस वक्त कोई अधिकारी नहीं था, न ही कोई रेस्क्यू टीम। जो भी था, आम लोग थे। मैंने सोचा अगर अभी नहीं उतरा तो शायद उसकी जान चली जाएगी।”

उन्होंने बिना देर किए गड्डे में उतरने का फैसला किया, जबकि उन्हें तैरना भी ठीक से नहीं आता था। पानी इतना गहरा था कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था।

जान जोखिम में डालकर की मदद

मनिंदर के मुताबिक, उन्होंने युवराज को कार से बाहर निकालने की पूरी कोशिश की, लेकिन पानी का दबाव और कीचड़ आड़े आ रहा था। कुछ और लोगों ने भी मदद की, मगर हालात बेहद खतरनाक थे।

“मैं खुद डर गया था कि कहीं मैं भी बाहर न निकल पाऊं, लेकिन उस वक्त दिमाग में बस यही था कि किसी तरह उसे बचा लिया जाए,” मनिंदर बताते हैं।

दुर्भाग्य से, समय पर पुख्ता रेस्क्यू न मिलने के कारण युवराज को बचाया नहीं जा सका।

पुलिस का रवैया बना सवाल

हादसे के बाद मनिंदर को उम्मीद थी कि पुलिस उनसे सहयोगी की तरह बात करेगी। लेकिन उनका आरोप है कि उन्हें थाने ले जाकर घंटों बैठाए रखा गया।

मनिंदर कहते हैं,

“मुझसे वही सवाल बार-बार पूछे गए। ऐसा लग रहा था जैसे मैं कोई अपराधी हूं, जबकि मैं तो मदद करने गया था।”

उनका दावा है कि पांच घंटे तक उन्हें थाने में बैठाकर रखा गया, न ठीक से खाना दिया गया और न ही बाहर जाने की अनुमति।

“अब मुझे अपनी जान का डर है”

मनिंदर ने यह भी आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में बड़े बिल्डर को बचाने की कोशिश हो रही है। उनका कहना है कि हादसे की असली वजह बेसमेंट में अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी थी।

“ऐसे लोग बहुत ताकतवर होते हैं। मुझे डर है कि सच्चाई सामने आने से पहले मुझे ही चुप करा दिया जाए,” मनिंदर कहते हैं।

उनका कहना है कि उन्होंने जो बयान दिया है, वही सच्चाई है और वे किसी भी दबाव में इसे बदलने वाले नहीं हैं।

बिल्डर और प्रशासन पर उठते सवाल

इस हादसे ने एक बार फिर बड़े बिल्डरों और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या बेसमेंट में पानी भरने की जानकारी पहले से थी?

क्या सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था?

और सबसे अहम सवाल—रेस्क्यू टीम समय पर क्यों नहीं पहुंची?

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह हादसा अचानक नहीं हुआ, बल्कि लापरवाही का नतीजा था।

परिवार का दर्द और इंसाफ की मांग

युवराज के परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। उनके पिता पहले ही आरोप लगा चुके हैं कि अगर समय पर मदद मिल जाती, तो उनका बेटा आज जिंदा होता।

अब चश्मदीद मनिंदर की गवाही इस मामले में बेहद अहम मानी जा रही है। लेकिन अगर गवाह ही खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है, तो न्याय की राह और कठिन हो जाती है।

क्या मिलेगा इंसाफ?

यह मामला अब सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की परीक्षा बन चुका है।

अगर चश्मदीदों को डराया जाएगा,

अगर सवाल पूछने वालों को दबाया जाएगा,

तो फिर ऐसे हादसे रुकेंगे कैसे?

मनिंदर की आंखों देखी कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सच बोलना आज भी सुरक्षित है?

The Greater Noida accident involving the tragic death of Yuvraj has raised serious questions about builder negligence, police accountability, and eyewitness safety. Eyewitness Maninder, who risked his life to save Yuvraj, alleges police pressure and claims he was detained for hours after the incident. The case highlights issues related to basement flooding, delayed rescue operations, and the influence of powerful builders in Greater Noida. This incident has become a crucial example of how negligence and lack of timely action can lead to irreversible loss of life.

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