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अलग केंद्रशासित प्रदेश की मांग को लेकर जम्मू में कश्मीरी पंडितों का जोरदार प्रदर्शन, जम्मू-श्रीनगर हाईवे घंटों जाम!

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AIN NEWS 1: कश्मीरी पंडितों के पलायन की 36वीं बरसी पर जम्मू में एक बार फिर दर्द, गुस्सा और न्याय की मांग सड़कों पर दिखाई दी। जम्मू के जगती इलाके में देर रात हजारों विस्थापित कश्मीरी पंडितों ने एकजुट होकर जोरदार प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग को कई घंटों तक जाम रखा, जिससे लंबा ट्रैफिक जाम लग गया और आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

यह प्रदर्शन केवल सड़क जाम तक सीमित नहीं था, बल्कि यह उन हजारों परिवारों की पीड़ा की अभिव्यक्ति था, जो 1990 के दशक में कश्मीर से पलायन करने को मजबूर हुए थे और आज भी स्थायी समाधान का इंतजार कर रहे हैं।

📍 पलायन की 36वीं बरसी और पुराना जख्म

कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए यह दिन सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक ऐसा जख्म है जो हर साल ताजा हो जाता है। 36 साल पहले आतंक, धमकी और असुरक्षा के माहौल में लाखों कश्मीरी पंडितों को अपना घर, जमीन, मंदिर और पहचान छोड़कर पलायन करना पड़ा था।

जगती टाउनशिप में आयोजित इस प्रदर्शन में बुजुर्गों से लेकर महिलाएं और युवा तक शामिल हुए। कई लोगों की आंखों में आंसू थे, तो कई के हाथों में तख्तियां—जिन पर न्याय, सुरक्षा और सम्मान की मांग लिखी थी।

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🚧 जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर घंटों जाम

प्रदर्शनकारियों ने देर रात जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम कर दिया। देखते ही देखते हाईवे के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। बसें, ट्रक और निजी वाहन घंटों तक फंसे रहे।

हालांकि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, लेकिन गुस्से और निराशा की भावना साफ झलक रही थी। पुलिस और प्रशासन मौके पर मौजूद रहा और स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश करता रहा।

📢 क्या हैं कश्मीरी पंडितों की मुख्य मांगें?

प्रदर्शन कर रहे कश्मीरी पंडितों ने केंद्र सरकार से तीन प्रमुख मांगें उठाईं—

अलग केंद्रशासित प्रदेश की मांग

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कश्मीर घाटी में सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी तभी संभव है, जब उनके लिए अलग केंद्रशासित प्रदेश या सुरक्षित प्रशासनिक क्षेत्र बनाया जाए।

एंटी-जेनोसाइड बिल लागू करने की मांग

समुदाय का आरोप है कि उनके साथ सुनियोजित तरीके से जातीय और धार्मिक आधार पर हिंसा हुई, जिसे आज तक आधिकारिक रूप से ‘जनसंहार’ के रूप में मान्यता नहीं दी गई।

जनसंहार पीड़ित का दर्जा

कश्मीरी पंडितों ने मांग की कि उन्हें आधिकारिक तौर पर ‘Genocide Victims’ का दर्जा दिया जाए, ताकि उन्हें कानूनी, सामाजिक और आर्थिक न्याय मिल सके।

🗣️ प्रदर्शनकारियों की पीड़ा

प्रदर्शन में शामिल कई लोगों ने बताया कि वे दशकों से अस्थायी कैंपों में रह रहे हैं। बच्चों ने वहीं पढ़ाई की, युवा वहीं बड़े हुए और बुजुर्ग वहीं बूढ़े हो गए—लेकिन ‘घर वापसी’ अब भी एक सपना ही है।

एक बुजुर्ग महिला ने कहा,

“हमने सिर्फ घर नहीं छोड़ा, हमने अपनी पूरी जिंदगी पीछे छोड़ दी। आज भी हमें न्याय का इंतजार है।”

युवाओं का कहना था कि वे सिर्फ मुआवजा नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा के साथ पुनर्वास चाहते हैं।

🏛️ सरकार पर उठे सवाल

प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार और प्रशासन पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि हर साल वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर हालात जस के तस हैं।

कई प्रदर्शनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि घाटी में काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा आज भी खतरे में है, बावजूद इसके कोई ठोस सुरक्षा नीति लागू नहीं की गई।

⚠️ सुरक्षा और भविष्य की चिंता

हाल के वर्षों में घाटी में कश्मीरी पंडितों पर हुए टारगेट किलिंग के मामलों ने समुदाय की चिंता और बढ़ा दी है। इसी कारण वे अब सिर्फ वापसी नहीं, बल्कि स्थायी सुरक्षा ढांचे की मांग कर रहे हैं।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक उनकी सुरक्षा, पहचान और अधिकारों की गारंटी नहीं दी जाती, तब तक उनकी वापसी संभव नहीं है।

आंदोलन आगे भी जारी रखने की चेतावनी

प्रदर्शन के अंत में समुदाय के प्रतिनिधियों ने साफ कहा कि अगर उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि न्याय की लड़ाई है, जिसे वे तब तक जारी रखेंगे जब तक उन्हें उनका हक नहीं मिल जाता।

Thousands of displaced Kashmiri Pandits gathered in Jammu to protest on the 36th anniversary of their exodus from Kashmir. The protesters blocked the Jammu-Srinagar National Highway while demanding a separate Union Territory, implementation of an anti-genocide law, and official recognition as genocide victims. The protest highlighted long-standing issues of rehabilitation, security, and justice for Kashmiri Pandits who have been living in displacement for decades.

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