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प्रज्ञा ठाकुर का सनसनीखेज आरोप: मालेगांव केस में मोदी, योगी और RSS प्रमुख को फंसाने की थी कोशिश

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AIN NEWS 1 | मालेगांव ब्लास्ट केस, जो देश के सबसे चर्चित आतंकवादी मामलों में से एक रहा है, एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। इस बार वजह है बीजेपी की पूर्व सांसद और आरोपी रह चुकीं प्रज्ञा सिंह ठाकुर का एक बड़ा बयान। कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के बाद प्रज्ञा ठाकुर ने मीडिया के सामने दावा किया कि इस केस की जांच कर रहे अधिकारियों ने उन पर दबाव डाला कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का नाम लें।

यह बयान केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि देश की राजनीति और जांच एजेंसियों पर गंभीर सवाल उठाने वाला है।

 मालेगांव ब्लास्ट केस: एक नजर

29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल में लगे बम में विस्फोट हुआ, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए। इस मामले में यूएपीए और आईपीसी की कई धाराओं के तहत कार्रवाई हुई और कुल 14 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

हालांकि समय के साथ सात आरोपियों को बरी कर दिया गया और केवल 7 के खिलाफ मुकदमा चला, जिसमें से सभी को 31 जुलाई 2025 को एनआईए कोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।

 कोर्ट का फैसला

एनआईए की विशेष अदालत ने यह कहते हुए फैसला सुनाया कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं। इसके बाद ही प्रज्ञा ठाकुर ने प्रेस से बातचीत में अपनी बात रखी और उन दिनों की घटनाओं को विस्तार से बताया जब उन्हें इस केस में फंसाया गया था।

 प्रज्ञा ठाकुर के गंभीर आरोप

प्रज्ञा ठाकुर ने कहा:

“मुझसे जांच अधिकारी बार-बार कुछ नाम लेने को कहते थे। उनमें प्रधानमंत्री मोदी, योगी आदित्यनाथ, राम माधव और मोहन भागवत जैसे नाम शामिल थे। उन्होंने मुझ पर शारीरिक और मानसिक दबाव बनाया। मेरे फेफड़े खराब हो गए थे, मुझे अवैध रूप से अस्पताल में रखा गया, लेकिन मैंने किसी का नाम नहीं लिया क्योंकि वे मुझे झूठ बोलने पर मजबूर कर रहे थे।”

उन्होंने यह भी दावा किया कि गुजरात की निवासी होने के कारण अधिकारियों ने खासतौर से मोदी का नाम लेने को कहा, ताकि केस को एक राजनीतिक मोड़ दिया जा सके।

 अन्य गवाहों और अफसरों के भी दावे

प्रज्ञा ठाकुर का बयान उस गवाह के बयान के बाद आया, जिसने दावा किया था कि उसे भी योगी आदित्यनाथ और आरएसएस से जुड़े चार अन्य लोगों को फंसाने का दबाव डाला गया था। इसमें वरिष्ठ आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार का नाम भी शामिल था।

एटीएस के पूर्व सदस्य महबूब मुजावर ने भी आरोप लगाया कि उन्हें आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को गिरफ्तार करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने इन दावों को खारिज कर दिया, लेकिन मुजावर ने फिर दोहराया कि पूरी जांच को भगवा आतंकवाद के एंगल से मोड़ने की कोशिश की गई थी।

 जांच एजेंसियों पर सवाल

प्रज्ञा ठाकुर का दावा केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि देश की जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। अगर वाकई किसी राजनीतिक साजिश के तहत जांच को प्रभावित करने की कोशिश हुई, तो यह न्याय प्रक्रिया और लोकतंत्र दोनों के लिए चिंता का विषय है।

 क्या कहते हैं कानूनी विशेषज्ञ?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जांच के दौरान सच में किसी पर झूठे नाम लेने का दबाव बनाया गया हो, तो यह गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन है। साथ ही, यह राजनीतिक प्रतिशोध की आशंका को भी जन्म देता है। अब जब सभी आरोपी बरी हो चुके हैं, तो जरूरी है कि इस मामले की स्वतंत्र जांच हो, ताकि जनता के सामने पूरा सच आ सके।

 राजनीतिक निहितार्थ

प्रज्ञा ठाकुर के आरोपों ने भाजपा समर्थकों के बीच एक भावनात्मक प्रतिक्रिया को जन्म दिया है। वहीं, विपक्ष का एक धड़ा अब भी यह कह रहा है कि सभी आरोपियों को राजनीतिक संरक्षण मिला। इस मामले ने देश की राजनीति को फिर से दो ध्रुवों में बांट दिया है— एक ओर कथित भगवा आतंक का नैरेटिव, और दूसरी ओर उसके खिलाफ राजनीतिक साजिश का दावा।

जनता क्या सोचती है?

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की भरमार है।
कुछ लोगों का कहना है कि यह भारत की जांच व्यवस्था की खामी को उजागर करता है, तो वहीं कुछ लोगों का मानना है कि प्रज्ञा ठाकुर और अन्य को पूरी तरह निर्दोष नहीं कहा जा सकता।

मालेगांव ब्लास्ट केस एक बार फिर देश के लिए आईना बनकर उभरा है। यह न सिर्फ आतंकवाद से जुड़ी जांच पर सवाल उठाता है, बल्कि राजनीतिक हस्तक्षेप, मानवाधिकार और न्याय प्रक्रिया जैसे मूलभूत विषयों को फिर से बहस के केंद्र में ले आता है।

अब जबकि सभी आरोपी कानूनी रूप से निर्दोष घोषित हो चुके हैं, यह आवश्यक हो गया है कि उस दौर की जांच प्रक्रिया की भी स्वतंत्र समीक्षा की जाए, जिससे न्याय का सच्चा अर्थ सामने आ सके।

Pragya Thakur, recently acquitted in the 2008 Malegaon blast case, has made a shocking claim that investigators tried to pressure her into falsely naming Prime Minister Narendra Modi, Uttar Pradesh CM Yogi Adityanath, RSS chief Mohan Bhagwat, and others. Her statement, coming right after the NIA special court verdict, has reignited political debates about the alleged misuse of investigative powers. As legal experts demand independent scrutiny of the original probe, the Malegaon blast case continues to expose complex intersections of law, politics, and justice in India.

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