AIN NEWS 1: त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले आम आदमी की रसोई का बजट एक बार फिर दबाव में आ गया है। देश के कई हिस्सों में चीनी की कीमतों में पिछले कुछ हफ्तों के दौरान तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है। थोक बाजार में कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं, जबकि खुदरा बाजार में भी उपभोक्ताओं को पहले के मुकाबले ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। आने वाले महीनों में गणेश चतुर्थी, दशहरा और दीपावली जैसे बड़े त्योहार हैं, ऐसे में मांग बढ़ने के साथ कीमतों पर दबाव बने रहने की आशंका जताई जा रही है।
हालांकि, चीनी की महंगाई को केवल एथेनॉल उत्पादन से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं बताता। उपलब्ध आंकड़ों और ताजा रिपोर्टों से पता चलता है कि घरेलू उपलब्धता, उत्पादन की स्थिति, मौसम, त्योहारी मांग और एथेनॉल के लिए गन्ने/चीनी के डायवर्जन समेत कई कारण मिलकर बाजार को प्रभावित कर रहे हैं।

रिकॉर्ड स्तर तक पहुंची चीनी की कीमत
अगस्त 2026 में चीनी की थोक कीमतों में काफी तेजी आई है। महाराष्ट्र के कोल्हापुर जैसे प्रमुख चीनी व्यापार केंद्र में कीमत करीब ₹5,350 प्रति क्विंटल, यानी लगभग ₹53.50 प्रति किलो तक पहुंच गई। Reuters की 18 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक वहां कीमत में हाल के दिनों में लगभग 20 फीसदी की तेजी आई और यह रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई।
इसका असर खुदरा बाजार में भी दिखाई दे रहा है। अलग-अलग शहरों और बाजारों में चीनी के भाव गुणवत्ता, ब्रांड और बिक्री के तरीके के हिसाब से अलग-अलग हैं। इसलिए पूरे देश में चीनी का एक ही खुदरा भाव बताना सही नहीं होगा। कुछ बाजारों में कीमत ₹60 प्रति किलो के आसपास या उससे ऊपर भी पहुंच गई है।
यानी यह कहना ज्यादा सही होगा कि चीनी की कीमतें इस समय असामान्य रूप से ऊंचे स्तर पर हैं और कई बाजारों में रिकॉर्ड के करीब या रिकॉर्ड स्तर पर कारोबार हो रहा है।
एथेनॉल की भूमिका कितनी बड़ी?
भारत सरकार पिछले कई वर्षों से पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को बढ़ावा दे रही है। इसका उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना, किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराना और घरेलू स्तर पर वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देना है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक Ethanol Blending Programme के तहत 2024-25 में पेट्रोल में औसतन 19.24 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग हासिल हुई थी, जबकि 2025-26 के लिए 20 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया है। सरकार चीनी मिलों को अतिरिक्त गन्ने को एथेनॉल में बदलने के लिए भी प्रोत्साहित करती है।
सरकार के अनुसार 2024-25 चीनी सीजन में करीब 34 लाख टन चीनी एथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट की गई थी।
इसी वजह से जब चीनी की घरेलू कीमतें बढ़ीं तो एथेनॉल के लिए गन्ने और चीनी के इस्तेमाल को लेकर भी बहस तेज हो गई है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक सरकार अगले सीजन में एथेनॉल के लिए होने वाले डायवर्जन को कम करने के विकल्प पर विचार कर रही है, ताकि घरेलू बाजार में ज्यादा चीनी उपलब्ध कराई जा सके।
लेकिन महंगाई की वजह सिर्फ एथेनॉल नहीं
चीनी की मौजूदा तेजी को केवल एथेनॉल के खाते में डालना सही नहीं होगा। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार उत्पादन और उपलब्धता से जुड़े कई दूसरे कारण भी महत्वपूर्ण हैं।
कुछ प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में मौसम और बारिश की स्थिति ने आगामी उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ाई है। जून में Reuters ने भी रिपोर्ट किया था कि कमजोर बारिश और El Niño से जुड़ी चिंताओं के कारण आने वाले वर्षों में भारत की गन्ना उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। साथ ही एथेनॉल की बढ़ती मांग भी चीनी की उपलब्धता पर दबाव डाल रही है।
इसके अलावा त्योहारों से पहले मिठाई, बेकरी, पेय पदार्थ और अन्य खाद्य उत्पादों में चीनी की मांग बढ़ती है। अगस्त से नवंबर के बीच बड़े त्योहार होने के कारण बाजार में मांग बढ़ने की संभावना को सरकार भी मौजूदा कीमतों के दबाव का एक कारण मान रही है।
मिठाई और हलवाई कारोबार पर पड़ेगा असर
चीनी की कीमत बढ़ने का असर केवल घर की रसोई तक सीमित नहीं रहेगा। त्योहारों के दौरान मिठाई और बेकरी उत्पादों की मांग बढ़ती है। ऐसे में चीनी महंगी होने पर उत्पादन लागत बढ़ना स्वाभाविक है।
मिठाई दुकानदारों के सामने दो विकल्प होते हैं—या तो बढ़ी हुई लागत खुद वहन करें या फिर उत्पादों की कीमत बढ़ाएं। बड़े त्योहारों के दौरान यदि चीनी के भाव इसी तरह ऊंचे बने रहते हैं तो मिठाई, बेकरी उत्पाद और कई अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
इसका सीधा मतलब है कि त्योहारों के मौसम में परिवारों को मिठाइयों और अन्य चीनी आधारित उत्पादों के लिए पहले से ज्यादा बजट रखना पड़ सकता है।
सरकार आयात का विकल्प भी देख रही
चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार अब कई विकल्पों पर विचार कर रही है। 18 अगस्त की Reuters रिपोर्ट के मुताबिक सरकार सीमित मात्रा में ड्यूटी-फ्री चीनी आयात की अनुमति देने पर विचार कर रही है। इसके अलावा चीनी मिलों के मासिक बिक्री कोटे में बदलाव और बंदरगाहों पर उपलब्ध रिफाइंड चीनी को घरेलू बाजार में लाने जैसे विकल्प भी सामने हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक अक्टूबर तक चीनी मिलों को करीब 10 लाख टन तक चीनी ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति देने के विकल्प पर चर्चा हुई है। इसके अलावा बंदरगाहों पर मौजूद रिफाइंड चीनी में से करीब 3 लाख टन घरेलू बाजार में उपलब्ध कराने का विकल्प भी देखा जा रहा है।
अगर सरकार इन उपायों को लागू करती है तो बाजार में उपलब्धता बढ़ सकती है और कीमतों पर कुछ दबाव कम होने की उम्मीद है।
उत्पादन के आंकड़ों को लेकर भी समझना जरूरी
चीनी उत्पादन से जुड़े आंकड़ों को लेकर सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में हजारों टन और लाखों टन की इकाइयों को लेकर भ्रम दिखाई दे रहा है। भारत का कुल चीनी उत्पादन लाखों टन में होता है, न कि केवल कुछ हजार टन में।
ISMA के अनुसार 2025-26 सीजन में 30 अप्रैल 2026 तक देश में चीनी उत्पादन करीब 275.28 लाख टन यानी 2.7528 करोड़ टन रहा था, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 7.32 प्रतिशत अधिक था।
इसलिए पुराने आंकड़ों में लिखे गए 28,015 टन, 9,000 टन या 9,920 टन जैसे आंकड़ों को बिना इकाई जांचे प्रकाशित करना सही नहीं होगा। कई जगह ये आंकड़े वास्तव में लाख टन या मिलियन टन के संदर्भ में हैं।
आगे क्या होगा?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि चीनी की कीमतों में आई तेजी कितने समय तक बनी रहती है। सरकार के सामने एक तरफ किसानों और चीनी मिलों के हितों का सवाल है, तो दूसरी तरफ घरेलू उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर चीनी उपलब्ध कराने की चुनौती है।
अगर त्योहारी मांग बढ़ती है और घरेलू उपलब्धता सीमित रहती है तो कीमतों पर दबाव जारी रह सकता है। दूसरी ओर, यदि सरकार सीमित आयात की अनुमति देती है, एथेनॉल के लिए चीनी डायवर्जन को कम करती है या घरेलू बाजार में अतिरिक्त स्टॉक उपलब्ध कराती है, तो आने वाले महीनों में कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
फिलहाल इतना साफ है कि चीनी की कीमतों में तेजी वास्तविक है, लेकिन इसके लिए केवल एथेनॉल नीति को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। उत्पादन, मौसम, उपलब्ध स्टॉक, त्योहारी मांग और सरकारी नीतियां—सभी मिलकर बाजार की दिशा तय कर रही हैं।
Sugar prices in India have surged to record levels in August 2026 amid tight domestic supplies, rising festival demand and concerns over sugarcane availability. Ethanol diversion from sugarcane is also an important factor affecting domestic sugar availability. The Indian government is considering measures including limited duty-free sugar imports, changes in mill sales quotas and reducing cane diversion for ethanol to stabilize the market. Consumers, sweet manufacturers and food businesses could face higher costs during the upcoming festive season.



















