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‘मेन्यू जरूरी है, नाम नहीं’ पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी – जो कांवड़ यात्रा में ही मांस बंद करते हैं, उनका क्या?

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AIN NEWS 1 | कांवड़ यात्रा रूट पर मांसाहारी भोजन की पहचान के लिए QR कोड लगाने के मामले पर मंगलवार (22 जुलाई 2025) को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। याचिका में कहा गया है कि दुकानों पर QR कोड या मालिक का नाम बताना असंवैधानिक है और इससे सामाजिक विभाजन को बढ़ावा मिलता है। लेकिन इस मामले में कोर्ट और पक्षकारों के बीच काफी तीखी बहस हुई।

सिंघवी की दलील – नाम से नहीं, मेन्यू से फर्क पड़ता है

याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट में कहा कि खाने के लिए मेन्यू देखना जरूरी है, न कि दुकानदार का नाम। उन्होंने कहा कि QR कोड लगाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश के खिलाफ है।

सिंघवी ने तर्क दिया,

“जब हम ढाबे या होटल में खाना खाते हैं, तो हम मालिक का नाम नहीं देखते, मेन्यू देखते हैं। यह जानना ज़रूरी है कि खाने में क्या परोसा जा रहा है, न कि यह किसका है।”

कोर्ट की टिप्पणी – धार्मिक भावना और संवैधानिक अधिकारों में संतुलन जरूरी

सुनवाई के दौरान जस्टिस एम. एम. सुंदरेश ने स्पष्ट किया कि कोर्ट का मकसद किसी को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि तीर्थयात्रियों की धार्मिक भावनाओं और अन्य नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना है।

उन्होंने कहा,

“कुछ ढाबे सिर्फ कांवड़ यात्रा के दौरान मांस बनाना बंद कर देते हैं। हमें इसका तरीका निकालना होगा ताकि श्रद्धालु यह जान सकें कि कहां क्या परोसा जा रहा है। कुछ लोग प्याज-लहसुन भी नहीं खाते – यह आस्था से जुड़ा विषय है।”

QR कोड का क्या है विवाद?

QR कोड के ज़रिए ढाबे या होटल की जानकारी, उसमें मिलने वाले खाने की प्रकृति आदि की पहचान की जा सकती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह गोपनीयता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है।

मुकुल रोहतगी की दलील – नियम केंद्र सरकार का है

यूपी सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि

“दुकानदार का नाम और लाइसेंस डिस्प्ले करना केंद्र सरकार का नियम है। हम कोई नया नियम नहीं बना रहे।”

उन्होंने तर्क दिया कि

“देश में ऐसे भी लोग हैं जो अशुद्धता के डर से अपने भाई के घर भी खाना नहीं खाते। धार्मिक आस्था के मामले बेहद निजी होते हैं।”

सिंघवी बोले – समाज को बांटा जा रहा है

सिंघवी ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा:

“यह पूरी प्रक्रिया समाज में विभाजन पैदा कर रही है। यह खतरनाक है।”

उन्होंने आगे कहा कि

“मैं खुद जैन हूं और कांवड़ यात्रा के समय अधिकांश ढाबे शाकाहारी भोजन ही परोसते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट की चिंता – सिर्फ कांवड़ यात्रा में क्यों रुकता है मांसाहार?

कोर्ट ने कहा कि अगर कोई ढाबा सालभर शाकाहार परोसता है, तो उसमें कोई दिक्कत नहीं।
लेकिन जो ढाबे सिर्फ कांवड़ यात्रा के दौरान मांसाहारी भोजन बनाना बंद करते हैं, उनके बारे में पिलग्रिम्स को जानना जरूरी है।

उत्तराखंड सरकार की सफाई – लाइसेंस डिस्प्ले अनिवार्य

उत्तराखंड सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि

“दुकानों के अंदर खाद्य लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन डिस्प्ले करना अनिवार्य है। उसी से पता चलता है कि दुकान को किस तरह का खाना परोसने की मंजूरी मिली है।”

धर्म, अधिकार और जानकारी – एक नाजुक संतुलन

सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई साफ करती है कि धार्मिक भावनाएं और नागरिक अधिकार दोनों ही जरूरी हैं। लेकिन जानकारी देना और किसी को निशाना न बनाना – इन दोनों में संतुलन बनाना ही इस पूरे मुद्दे का समाधान है।

The Supreme Court of India heard a petition regarding the mandatory QR code display for food stalls along the Kanwar Yatra route. Senior advocates Abhishek Manu Singhvi and Huzaifa Ahmadi argued that the food menu matters more than the shopkeeper’s name, calling the rule divisive. The court observed that pilgrims and vegetarians have a right to know if meat is prepared at a place, especially when some outlets stop serving non-veg only during the Yatra. The debate underscores the challenge of balancing religious sentiments with constitutional freedoms.

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