प्रयागराज माघ मेला प्रशासन और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच विवाद का नया मोड़
AIN NEWS 1: प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान शंकराचार्य पद को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। माघ मेला प्राधिकरण द्वारा भेजे गए नोटिस के जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन को आठ पन्नों का विस्तृत उत्तर भेजा है। यह जवाब न केवल ई-मेल के माध्यम से भेजा गया, बल्कि मेला क्षेत्र में स्थित प्रशासनिक कार्यालय तक स्वयं जाकर भी जमा कराने की कोशिश की गई।
यह पूरा घटनाक्रम धार्मिक, कानूनी और प्रशासनिक तीनों स्तरों पर अहम माना जा रहा है, क्योंकि मामला पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।
क्या था माघ मेला प्राधिकरण का नोटिस?
मंगलवार को प्रयागराज माघ मेला प्राधिकरण की ओर से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक औपचारिक नोटिस जारी किया गया था। नोटिस में उनसे यह स्पष्ट करने को कहा गया था कि वह स्वयं को ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य किस आधार पर बता रहे हैं।
प्राधिकरण का कहना था कि शंकराचार्य पद से जुड़ा मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, ऐसे में किसी भी प्रकार का दावा या सार्वजनिक प्रस्तुति भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है।
8 पन्नों में दिया गया जवाब
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से भेजा गया जवाब केवल एक औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि इसमें धार्मिक परंपराओं, शास्त्रीय प्रमाणों और कानूनी पहलुओं का विस्तार से उल्लेख किया गया है। बताया जा रहा है कि इस उत्तर में उन्होंने अपने पक्ष को ऐतिहासिक और संवैधानिक आधार पर रखने का प्रयास किया है।
जवाब में यह भी स्पष्ट किया गया है कि उनका दावा किसी प्रशासनिक आदेश के खिलाफ नहीं है, बल्कि परंपरागत प्रक्रिया और सनातन व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।
ई-मेल से लेकर दफ्तर तक भेजा गया जवाब
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की टीम ने जवाब को औपचारिक रूप से माघ मेला प्राधिकरण की आधिकारिक मेल आईडी पर भेजा। इसके साथ ही, सेक्टर-4 में स्थित मेला प्रशासन के कार्यालय में जाकर भी जवाब सौंपने की कोशिश की गई।
हालांकि, जब उनकी टीम कार्यालय पहुंची, तो वहां कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं मिला जो उस जवाब को औपचारिक रूप से स्वीकार कर सके।
गेट पर चिपकाया गया जवाब
कार्यालय में कोई अधिकारी न मिलने के कारण स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अनुयायियों ने जवाब की प्रतियां मेला प्राधिकरण कार्यालय के गेट पर ही चिपका दीं। यह दृश्य मौके पर मौजूद लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया।
अनुयायियों का कहना था कि जब प्रशासन स्वयं जवाब लेने के लिए उपलब्ध नहीं है, तो उन्होंने पारदर्शिता के साथ अपना पक्ष सार्वजनिक रूप से रखने का निर्णय लिया।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित है मामला
शंकराचार्य पद से जुड़ा यह विवाद कोई नया नहीं है। यह मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इसी आधार पर माघ मेला प्राधिकरण ने नोटिस जारी करते हुए आपत्ति जताई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब कोई मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हो, तब प्रशासनिक और धार्मिक संस्थाओं के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी हो जाता है।
धार्मिक परंपरा बनाम प्रशासनिक व्यवस्था
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धार्मिक परंपराओं और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बीच तालमेल कैसे बैठाया जाए। एक ओर सदियों पुरानी सनातन परंपराएं हैं, तो दूसरी ओर कानूनी और संवैधानिक ढांचा।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष यह है कि शंकराचार्य की परंपरा किसी एक संस्था या सरकार की मोहताज नहीं है, जबकि प्रशासन कानून और न्यायालय के निर्देशों का हवाला दे रहा है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल माघ मेला प्रशासन की ओर से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के जवाब पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। माना जा रहा है कि अब इस जवाब को कानूनी सलाह के बाद आगे की कार्रवाई के लिए भेजा जाएगा।
वहीं, इस पूरे घटनाक्रम पर देशभर के संत समाज और धार्मिक संगठनों की नजर बनी हुई है। आने वाले दिनों में यह मामला और गहराने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
The controversy involving Swami Avimukteshwaranand and the Prayagraj Magh Mela Administration has intensified after the administration questioned his claim as Jyotishpeeth Shankaracharya. In response, Swami Avimukteshwaranand submitted an eight-page detailed reply, citing religious traditions and legal perspectives. With the Shankaracharya matter already pending before the Supreme Court, this development has attracted nationwide attention and sparked debate over the balance between religious traditions and administrative authority during the Magh Mela in Prayagraj.


















