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UGC New Rules 2026 पर डॉ. विकास दिव्यकीर्ति का बड़ा बयान: छात्रों के हित में जरूरी सुधार

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AIN NEWS 1 | देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए नियम 2026 को लेकर जहां एक ओर छात्र संगठनों और कुछ शिक्षाविदों में नाराज़गी देखने को मिल रही है, वहीं दूसरी ओर कई शिक्षा विशेषज्ञ इन नियमों को समय की मांग बता रहे हैं।

इसी कड़ी में देश के प्रसिद्ध शिक्षाविद और दृष्टि IAS के संस्थापक डॉ. विकास दिव्यकीर्ति का बयान सामने आया है, जिसने इस बहस को एक नई दिशा दी है। हालिया विवादों के बीच उन्होंने UGC के नए नियमों का समर्थन करते हुए कहा कि अगर कुछ तकनीकी कमियों को अलग रख दिया जाए, तो ये नियम पुराने 2012 के रेगुलेशन की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली और व्यावहारिक हैं।

2012 के नियम क्यों साबित हुए कमजोर?

डॉ. विकास दिव्यकीर्ति के अनुसार, वर्ष 2012 में लागू किए गए UGC नियम उस समय की परिस्थितियों के अनुसार बनाए गए थे, लेकिन बदलते शैक्षणिक माहौल के साथ वे धीरे-धीरे अप्रासंगिक होते चले गए।

उन्होंने बताया कि उस दौर की सबसे बड़ी समस्या थी शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal System) की कमजोरी।

  • छात्रों की शिकायतें अक्सर कॉलेज या यूनिवर्सिटी प्रशासन के पास ही सीमित रह जाती थीं

  • निष्पक्ष सुनवाई की कोई स्वतंत्र व्यवस्था नहीं थी

  • कई मामलों में छात्र दबाव, डर या आंतरिक राजनीति के कारण अपनी बात आगे नहीं रख पाते थे

नतीजा यह होता था कि गंभीर मुद्दे भी फाइलों में दबकर रह जाते थे।

 नए नियमों में क्या है बड़ा बदलाव?

डॉ. दिव्यकीर्ति का मानना है कि UGC Regulations 2026 का सबसे मजबूत पक्ष है — स्वतंत्र लोकपाल (Ombudsman) की व्यवस्था।

नए नियमों के तहत:

  • हर विश्वविद्यालय में एक स्वतंत्र लोकपाल नियुक्त किया जाएगा

  • लोकपाल विश्वविद्यालय प्रशासन से पूरी तरह अलग होगा

  • छात्र सीधे अपनी शिकायत लोकपाल तक पहुंचा सकेंगे

  • 30 दिनों के भीतर शिकायत पर निर्णय देना अनिवार्य होगा

उनके अनुसार यह बदलाव शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही (accountability) लाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

 छात्रों को मिलेगा सीधा न्याय

डॉ. विकास दिव्यकीर्ति ने कहा कि अब छात्रों को बार-बार विभाग, डीन या प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

“जब शिकायत की सुनवाई करने वाला व्यक्ति उसी सिस्टम का हिस्सा हो, तो निष्पक्षता पर सवाल उठता है। लोकपाल की स्वतंत्र व्यवस्था इस समस्या को काफी हद तक खत्म कर सकती है।”

उन्होंने यह भी कहा कि इससे छोटे कॉलेजों और निजी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों को विशेष रूप से राहत मिलेगी, जहां अक्सर शिकायतों को दबा दिया जाता था।

 नियमों पर उठाए कुछ जरूरी सवाल

हालांकि डॉ. दिव्यकीर्ति ने नए नियमों का समर्थन किया, लेकिन उन्होंने इसे पूरी तरह निर्दोष भी नहीं बताया।

उनका कहना है कि यह नियम संभवतः सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई और दबाव के चलते कुछ हद तक जल्दबाज़ी में तैयार किए गए हैं।

उन्होंने कुछ अहम कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया:

  • ड्राफ्ट में प्रूफरीडिंग से जुड़ी कई गलतियां

  • भाषा की स्पष्टता की कमी

  • भारत जैसे बहुभाषी देश में linguistic diversity को पर्याप्त स्थान न मिलना

उनका मानना है कि कानून जितना मजबूत हो, उतना ही स्पष्ट और सुलभ भी होना चाहिए, ताकि छात्र और संस्थान दोनों उसे सही तरीके से समझ सकें।

 क्या ये नियम पूरी तरह छात्रों के पक्ष में हैं?

इस सवाल पर डॉ. दिव्यकीर्ति का जवाब संतुलित रहा। उन्होंने कहा कि कोई भी नियम परफेक्ट नहीं होता, लेकिन तुलना अगर 2012 के नियमों से की जाए तो 2026 के रेगुलेशन कहीं ज्यादा व्यवहारिक और समयानुकूल हैं।

उनके शब्दों में:

“अगर दो-तीन तकनीकी कमियों को नजरअंदाज कर दें, तो यह बदलाव शिक्षा व्यवस्था को ज्यादा पारदर्शी और जिम्मेदार बनाने की दिशा में जरूरी कदम है।”

 शिक्षा व्यवस्था में क्यों जरूरी थे ये बदलाव?

डॉ. दिव्यकीर्ति के अनुसार, बीते एक दशक में शिक्षा का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है:

  • निजी विश्वविद्यालयों की संख्या में तेज़ बढ़ोतरी

  • ऑनलाइन और हाइब्रिड एजुकेशन का विस्तार

  • छात्रों की बढ़ती जागरूकता

  • फीस, मूल्यांकन और आंतरिक अनुशासन से जुड़े विवाद

इन सभी कारणों से पुराने नियम नाकाफी साबित हो रहे थे।

उनका मानना है कि यदि UGC समय रहते नियमों में सुधार नहीं करता, तो भविष्य में शिक्षा व्यवस्था पर छात्रों का भरोसा कमजोर पड़ सकता था।

 क्या सुधार की अभी भी गुंजाइश है?

डॉ. दिव्यकीर्ति ने स्पष्ट कहा कि सरकार और UGC को चाहिए कि वे इन नियमों को “अंतिम सत्य” न मानें, बल्कि समय-समय पर फीडबैक के आधार पर इनमें सुधार करते रहें।

उन्होंने सुझाव दिया कि:

  • छात्रों से सीधा फीडबैक लिया जाए

  • भाषा को सरल और स्पष्ट बनाया जाए

  • डिजिटल शिकायत प्रणाली को और मजबूत किया जाए

इससे नियम केवल कागज़ों तक सीमित न रहकर ज़मीनी स्तर पर प्रभावी बन सकेंगे।

कुल मिलाकर क्या कहता है दिव्यकीर्ति का बयान?

डॉ. विकास दिव्यकीर्ति का रुख न तो पूरी तरह समर्थन वाला है और न ही विरोध वाला। उनका दृष्टिकोण व्यावहारिक और संतुलित दिखाई देता है।

वे मानते हैं कि:

  • नए UGC नियमों की आवश्यकता थी

  • छात्र हितों को केंद्र में लाया गया है

  • शिकायत निवारण प्रणाली पहले से बेहतर हुई है

लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि नियमों को जल्दबाज़ी में नहीं बल्कि सोच-समझकर लागू किया जाए।

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