AIN NEWS 1 | दुनिया इस समय ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां युद्ध, कूटनीतिक तनाव, आर्थिक दबाव और वैश्विक अस्थिरता लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे हालात में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने वैश्विक शक्तियों को एक साफ और मजबूत संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि आज की जटिल समस्याओं का समाधान किसी एक देश की ताकत या दो महाशक्तियों की आपसी सहमति से नहीं हो सकता।
अपने कार्यकाल के दसवें और अंतिम वर्ष की शुरुआत पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए गुटेरेस ने दुनिया की मौजूदा राजनीति पर खुलकर बात की। उनके बयान सीधे तौर पर अमेरिका और चीन जैसी बड़ी ताकतों की भूमिका की ओर इशारा करते हैं, हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम लेकर आरोप नहीं लगाया।
गुटेरेस ने कहा कि यह सोच बेहद खतरनाक है कि कोई एक देश पूरी दुनिया के लिए फैसले ले सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दो बड़ी शक्तियां मिलकर दुनिया को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में बांट दें, यह भी शांति का रास्ता नहीं है। उनके मुताबिक ऐसी मानसिकता दुनिया को और अस्थिर बनाती है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि आज की दुनिया को “बहुध्रुवीय व्यवस्था” यानी multipolar world की जरूरत है, जहां कई देश मिलकर वैश्विक फैसलों में भागीदारी करें। उनका मानना है कि केवल साझा प्रयासों से ही स्थायी शांति, विकास और स्थिरता संभव है।
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती दूरी पर चिंता जताते हुए गुटेरेस ने कहा कि वर्तमान समय में यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि भविष्य केवल दो ध्रुवों — अमेरिका और चीन — के इर्द-गिर्द घूमेगा। लेकिन यह सोच आने वाले समय में बड़े टकराव को जन्म दे सकती है।
उन्होंने कहा कि यदि दुनिया को सुरक्षित बनाना है तो संवाद, सहयोग और विश्वास को प्राथमिकता देनी होगी। किसी भी देश को अलग-थलग करके या दबाव की नीति अपनाकर लंबे समय तक शांति कायम नहीं की जा सकती।
इसी बातचीत के दौरान गुटेरेस ने कुछ सकारात्मक संकेतों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में कुछ अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते उम्मीद जगाते हैं। खासतौर पर भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए समझौते को उन्होंने सकारात्मक कदम बताया।
उनके अनुसार ऐसे समझौते केवल व्यापार तक सीमित नहीं होते, बल्कि देशों के बीच भरोसा, साझेदारी और आपसी समझ को भी मजबूत करते हैं। गुटेरेस ने कहा कि वैश्विक विकास के लिए ऐसे सहयोग मॉडल बेहद जरूरी हैं।
संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर बात करते हुए महासचिव ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की मुख्य जिम्मेदारी यूएन की है, विशेष रूप से उसकी सुरक्षा परिषद की। लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मौजूदा व्यवस्था अब समय के अनुरूप नहीं रह गई है।
गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत पर फिर से जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज की वैश्विक वास्तविकताएं 1945 की परिस्थितियों से पूरी तरह अलग हैं, लेकिन संस्थागत ढांचा अब भी पुराना बना हुआ है।
उन्होंने यह भी कहा कि कई बार वही देश जो संयुक्त राष्ट्र को कमजोर बताते हैं, वही इसके सुधारों का विरोध भी करते हैं। इसी वजह से संगठन कई बार उतना प्रभावी नहीं बन पाता, जितनी उससे उम्मीद की जाती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के संदर्भ में गुटेरेस के बयान काफी अहम माने जा रहे हैं। ट्रंप हाल के समय में फिर से “प्रभाव क्षेत्र” की नीति को आगे बढ़ाने की बात कर चुके हैं। उनका फोकस पश्चिमी देशों में अमेरिका की पकड़ मजबूत करने पर रहा है।
हाल ही में ट्रंप द्वारा शुरू किए गए एक नए “शांति बोर्ड” को लेकर भी कई देशों में चिंता देखी जा रही है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहल संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर कर सकती है।
गुटेरेस ने बिना नाम लिए संकेत दिया कि अगर हर देश अपनी अलग शांति व्यवस्था बनाने लगेगा तो वैश्विक संतुलन बिगड़ सकता है।
दुनिया में बढ़ते संघर्षों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज अंतरराष्ट्रीय कानून का खुलकर उल्लंघन हो रहा है। कई देशों द्वारा नियमों की अनदेखी की जा रही है और इसका कोई ठोस जवाब नहीं दिया जा रहा।
उन्होंने चेतावनी दी कि “दंड न मिलने की भावना” यानी impunity ने कई युद्धों और हिंसक संघर्षों को और भड़काया है। जब किसी को अपने कृत्यों की जवाबदेही नहीं होती, तब हालात और बिगड़ते चले जाते हैं।
गुटेरेस ने यह भी कहा कि बहुपक्षीय संस्थाएं आज भारी दबाव में हैं। देशों के बीच सहयोग घट रहा है और राष्ट्रवाद की राजनीति तेज होती जा रही है, जो वैश्विक शांति के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र इस समय गंभीर आर्थिक संकट से भी जूझ रहा है। अमेरिका द्वारा कई यूएन एजेंसियों की फंडिंग घटाए जाने से संगठन की कार्यप्रणाली प्रभावित हुई है। कई जरूरी भुगतान समय पर नहीं हो पा रहे हैं।
इसी वजह से महासचिव ने खर्च कम करने और व्यवस्था सुधारने के लिए एक विशेष सुधार समूह का गठन किया है। उनका कहना है कि संगठन को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और जवाबदेह बनाने की जरूरत है।
अपने दूसरे कार्यकाल की चर्चा करते हुए गुटेरेस ने कहा कि यह दौर संघर्षों से भरा रहा। यूक्रेन युद्ध, अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी, सूडान संकट, गाजा संघर्ष, सीरिया की जटिल स्थिति और वेनेजुएला से जुड़े घटनाक्रम ने वैश्विक राजनीति को झकझोर कर रख दिया।
इन तमाम संकटों के बीच संयुक्त राष्ट्र पर लगातार सवाल उठे, लेकिन गुटेरेस का कहना है कि कई बार संगठन की सीमाएं राजनीतिक मतभेदों के कारण सामने आती हैं।
अंत में उन्होंने दोहराया कि तमाम चुनौतियों के बावजूद संयुक्त राष्ट्र अपने मूल उद्देश्यों से पीछे नहीं हटेगा। उनका कहना है कि संगठन न्यायपूर्ण, टिकाऊ और दीर्घकालिक शांति के लिए प्रतिबद्ध है।
गुटेरेस ने कहा कि सच्ची शांति केवल युद्ध रोकने से नहीं आती, बल्कि उन कारणों को खत्म करने से आती है जो संघर्ष को जन्म देते हैं — जैसे असमानता, अन्याय और संवाद की कमी।
उन्होंने भरोसा जताया कि यदि देश आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर सहयोग की राह अपनाएं, तो दुनिया को एक बार फिर स्थिर और सुरक्षित बनाया जा सकता है।


















