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उन्नाव रेप केस: कुलदीप सिंह सेंगर की बेटियों का सवाल—सबूत हो तो फांसी दे दीजिए, लेकिन हमारी बात भी सुनी जाए!

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AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश के चर्चित उन्नाव दुष्कर्म मामले में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। इस बार विवाद का केंद्र पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर नहीं, बल्कि उनकी बेटियां हैं। कुलदीप सिंह सेंगर की दोनों बेटियों ने सार्वजनिक रूप से सामने आकर न्यायपालिका और पूरे मामले की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि उनके पिता को दोषी ठहराने से पहले सबूतों पर निष्पक्ष रूप से विचार होना चाहिए।

पूर्व विधायक की अधिवक्ता बेटी ऐश्वर्या सेंगर ने एक समाचार एजेंसी को दिए इंटरव्यू में कहा कि अगर यह साबित हो जाए कि उनके पिता ने पीड़िता की ओर गलत नजर से भी देखा हो, तो उन्हें फांसी की सजा देने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि इसके लिए ठोस और विश्वसनीय सबूत सामने लाए जाने चाहिए।

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“सिर्फ आरोप नहीं, सबूत भी जरूरी”

ऐश्वर्या सेंगर का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक और न्याय आधारित व्यवस्था में केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी ठहराना खतरनाक है। उन्होंने कहा कि विरोध प्रदर्शन करना और न्याय की मांग करना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि मामले से जुड़े सभी पहलुओं को सुना जाए।

उनका आरोप है कि इस केस में भीड़ के दबाव और भावनाओं के चलते उनके पिता के पक्ष में मौजूद तथ्यों और सबूतों को नजरअंदाज किया गया। ऐश्वर्या के अनुसार, पीड़िता के बयान के अलावा कोई प्रत्यक्ष भौतिक साक्ष्य अब तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।

पीड़िता के बयानों में बदलाव का दावा

पूर्व विधायक की बेटी ने यह भी कहा कि पीड़िता ने समय-समय पर अपने बयान बदले हैं। उनके अनुसार, मुकदमा दर्ज होने के करीब ढाई महीने बाद पीड़िता के बयान में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए, जो किसी भी कानूनी प्रक्रिया में गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।

ऐश्वर्या का कहना है कि ऐसे मामलों में संवेदनशीलता जरूरी है, लेकिन आंख बंद करके किसी एक पक्ष की बात मान लेना न्याय नहीं हो सकता। उन्होंने मांग की कि अदालत और समाज दोनों पक्षों की बात सुने।

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पुरानी रंजिश और पारिवारिक दुश्मनी का आरोप

ऐश्वर्या सेंगर ने यह भी आरोप लगाया कि इस पूरे मामले के पीछे उनके परिवार और पीड़िता के परिवार के बीच पुरानी दुश्मनी है। उन्होंने दावा किया कि पीड़िता के चाचा वर्ष 2000 से आपराधिक मामलों में शामिल रहे हैं और उनके खिलाफ करीब 17 मुकदमे दर्ज हैं, जिनमें हत्या का एक मामला भी शामिल है।

उनके अनुसार, ये सभी मामले उनके जन्म से पहले के हैं और वर्तमान में पीड़िता के चाचा तिहाड़ जेल में बंद हैं। ऐश्वर्या का कहना है कि इसी पुरानी रंजिश के चलते उनके पिता को साजिश के तहत इस केस में फंसाया गया।

“हम भी बेटियां हैं, हमारी भावनाएं भी हैं”

पूर्व विधायक की बेटी ने भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि यदि यह कहानी पूरी तरह सच होती, तो वह भी आम नागरिकों की तरह पीड़िता के समर्थन में खड़ी होतीं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर जिस तरह से गालियां और धमकियां दी जा रही हैं, उससे यह भूल जाया गया है कि दूसरी तरफ भी एक परिवार है, जिसकी भी बेटियां हैं।

उन्होंने कहा, “जिस इंसान को आप राक्षस समझ रहे हैं, वह वैसा नहीं है जैसा दिखाया जा रहा है। अगर एक भी पुख्ता सबूत मिल जाए, तो आप मेरे पिता को सरेआम फांसी पर लटका दीजिए। लेकिन अगर सबूत नहीं हैं, तो हमें भी अपनी बात रखने का अधिकार मिलना चाहिए।”

सोशल मीडिया पर भी उठी आवाज

इससे पहले कुलदीप सिंह सेंगर की दूसरी बेटी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि अदालत और समाज दोनों ही उनके पिता के पक्ष में मौजूद सबूतों को सुनने को तैयार नहीं हैं।

उनका कहना था कि भावनाओं और जनदबाव के चलते निष्पक्ष सुनवाई की संभावना खत्म होती जा रही है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।

न्याय बनाम भीड़ तंत्र की बहस

इस पूरे मामले ने एक बार फिर न्याय और भीड़ तंत्र के बीच की बहस को हवा दे दी है। सवाल यह है कि क्या किसी आरोपी को दोषी मान लेने से पहले उसके पक्ष को पूरी तरह सुना जा रहा है? क्या समाज भावनाओं में बहकर न्याय की मूल भावना से दूर तो नहीं जा रहा?

कुलदीप सिंह सेंगर की बेटियों की यह अपील केवल अपने पिता के लिए नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली की निष्पक्षता के लिए भी मानी जा रही है। उनका कहना है कि न्याय तभी सार्थक होगा, जब दोनों पक्षों को बराबरी से सुना जाए और फैसला ठोस सबूतों के आधार पर हो।

The Unnao rape case involving former MLA Kuldeep Singh Sengar continues to spark national debate as his daughters publicly question the judicial process and demand evidence-based judgment. The case highlights concerns around fair trial, changing victim statements, ignored defense evidence, and the growing influence of public pressure in high-profile rape cases in India.

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