AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश में FIR दर्ज कराने की प्रक्रिया को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है। इसमें दावा किया जा रहा है कि प्रदेश में दहेज उत्पीड़न, घरेलू विवाद, चेक बाउंस, जमीन विवाद, पशु अत्याचार, धोखाधड़ी, धमकी, मानहानि समेत 31 तरह के मामलों में अब सीधे थाने में FIR दर्ज नहीं होगी। पोस्ट में कहा गया है कि ऐसे मामलों में पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट में शिकायत करनी होगी और अदालत के आदेश के बाद ही पुलिस जांच या कार्रवाई करेगी।
इस दावे की पड़ताल करने पर तस्वीर कुछ अलग सामने आती है। उत्तर प्रदेश पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट पर वर्ष 2026 का परिपत्र संख्या 18/18A मौजूद है। इसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा 25 फरवरी 2026 को प्रार्थना पत्र संख्या 596/2026, अनुरुद्ध प्रसाद उर्फ अनुरुद्ध तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य में दिए गए आदेश के अनुपालन में निर्देश जारी किए गए हैं। आधिकारिक रिकॉर्ड में इस परिपत्र का विषय BNSS-2023 अथवा अन्य कानूनों के तहत उन मामलों में FIR दर्ज नहीं किए जाने से संबंधित है, जिनमें परिवाद के जरिए न्यायालय के समक्ष कार्यवाही की व्यवस्था है।
क्या सचमुच 31 मामलों में FIR बंद हो गई?
यहां सबसे जरूरी बात यह है कि सोशल मीडिया पर चल रही “31 मामलों में अब सीधे FIR नहीं होगी” वाली सूची को उत्तर प्रदेश पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट पर उसी रूप में 31 अलग-अलग अपराधों की सूची के तौर पर नहीं पाया गया है।
यानी यह कहना सही नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश सरकार या पुलिस ने सभी 31 मामलों में एक समान नियम बनाकर FIR पर पूरी तरह रोक लगा दी है।
असल निर्देश उन मामलों की कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा है, जहां संबंधित कानून में मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत/परिवाद के माध्यम से न्यायालय द्वारा संज्ञान लेने की व्यवस्था है। यूपी पुलिस ने हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में इस संबंध में पुलिस अधिकारियों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
BNSS में FIR और कोर्ट की प्रक्रिया कैसे काम करती है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS 2023 1 जुलाई 2024 से लागू है। इसके तहत संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को दी जा सकती है। BNSS की धारा 173 संज्ञेय अपराधों से संबंधित सूचना दर्ज करने की प्रक्रिया बताती है। सूचना थाने में मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी दी जा सकती है।
BNSS की धारा 173(3) में कुछ ऐसे अपराधों के लिए प्रारंभिक जांच की व्यवस्था भी है जिनमें सजा तीन वर्ष या उससे अधिक लेकिन सात वर्ष से कम है। ऐसी स्थिति में निर्धारित शर्तों के तहत पुलिस अधिकारी प्रारंभिक जांच कर सकता है।
दूसरी ओर, BNSS की धारा 210 मजिस्ट्रेट द्वारा अपराध का संज्ञान लेने की व्यवस्था बताती है। मजिस्ट्रेट किसी शिकायत, पुलिस रिपोर्ट या अन्य वैधानिक तरीके से प्राप्त सूचना के आधार पर संज्ञान ले सकते हैं।
इसलिए हर शिकायत का रास्ता एक जैसा नहीं होता। किसी मामले में पुलिस FIR और जांच की प्रक्रिया लागू हो सकती है, जबकि किसी विशेष कानून या अपराध के लिए शिकायत/परिवाद के जरिए न्यायालय की प्रक्रिया निर्धारित हो सकती है।
वायरल पोस्ट में दहेज उत्पीड़न को लेकर भी भ्रम
सोशल मीडिया पोस्ट में पुराने IPC की धारा 498A को “दहेज उत्पीड़न” के रूप में लिखा गया है। लेकिन 1 जुलाई 2024 से आपराधिक कानूनों में बदलाव हो चुका है और IPC की जगह भारतीय न्याय संहिता यानी BNS लागू है।
इसलिए 2026 की खबर में पुराने IPC नंबर को वर्तमान कानून की धारा के रूप में लिखना सही नहीं है। किसी मामले में लागू धारा उसकी घटना, आरोप और वर्तमान कानून के अनुसार निर्धारित होगी।
इसी तरह चेक बाउंस से संबंधित मामलों को भी सामान्य FIR वाले संज्ञेय अपराधों के साथ एक ही सूची में रखना कानूनी प्रक्रिया को जरूरत से ज्यादा सरल बना देता है।
जमीन और संपत्ति विवाद में क्या होगा?
जमीन, मकान, कब्जे, किरायेदारी या पैसे के लेन-देन से जुड़े मामलों में यह देखना जरूरी है कि शिकायत में केवल दीवानी विवाद है या उसके साथ कोई आपराधिक अपराध भी बनता है।
उदाहरण के लिए, केवल जमीन के मालिकाना हक का विवाद अलग प्रकृति का हो सकता है। लेकिन यदि उसी विवाद में मारपीट, धमकी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेज या अन्य संज्ञेय अपराध के स्पष्ट आरोप सामने आते हैं तो मामले की कानूनी प्रकृति अलग हो सकती है।
इसलिए “जमीन विवाद है तो FIR नहीं होगी” कहना भी सही नियम नहीं है। प्रत्येक शिकायत में लगाए गए आरोप और संबंधित कानून को देखकर प्रक्रिया तय होगी।
क्या पुलिस कोर्ट के आदेश के बिना कोई कार्रवाई नहीं कर सकती?
वायरल पोस्ट का यह हिस्सा भी बहुत व्यापक है।
सिर्फ यह कह देना कि “इन मामलों में कोर्ट के आदेश के बिना पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर सकती” कानूनी स्थिति की पूरी तस्वीर नहीं बताता।
BNSS में संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को देने और उसके आधार पर जांच की व्यवस्था मौजूद है। यदि किसी शिकायत में संज्ञेय अपराध बनता है तो लागू वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार पुलिस की भूमिका निर्धारित होती है। दूसरी तरफ, गैर-संज्ञेय मामलों में अलग प्रक्रिया है और BNSS की धारा 174 में ऐसे मामलों की जानकारी तथा जांच से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।
यानी अपराध संज्ञेय है या गैर-संज्ञेय, कौन सा विशेष कानून लागू है और उस कानून में शिकायत की क्या प्रक्रिया निर्धारित है—इन सभी बातों का महत्व है।
अगर पुलिस FIR दर्ज नहीं करे तो क्या रास्ता है?
BNSS में ऐसी स्थिति के लिए भी प्रक्रिया दी गई है। संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने से पुलिस अधिकारी के इनकार की स्थिति में पीड़ित/शिकायतकर्ता संबंधित पुलिस अधीक्षक को लिखित रूप में सूचना भेज सकता है। इसके बाद भी उचित कार्रवाई न होने पर कानून में मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने का रास्ता उपलब्ध है।
इसलिए किसी थाने में शिकायत स्वीकार न होने पर मामला वहीं खत्म नहीं हो जाता।
सोशल मीडिया पर वायरल 31 मामलों की सूची कितनी सही?
वायरल सूची में दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, चेक बाउंस, संपत्ति विवाद, किरायेदारी, व्यवसायिक विवाद, मानहानि, आपराधिक धमकी, विश्वासभंग, धोखाधड़ी, कूटरचना, उपभोक्ता विवाद, चिकित्सा लापरवाही, बीमा विवाद, ऑनलाइन लेन-देन और अन्य कई विषयों को एक साथ रखा गया है।
लेकिन इन सभी मामलों को एक ही कानूनी श्रेणी में रखना उचित नहीं है। अलग-अलग कानूनों में इनके लिए अलग प्रक्रिया हो सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यूपी पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट पर Circular 18/18A जरूर दर्ज है, लेकिन वायरल पोस्ट में दी गई 31 मामलों की सूची को उसी रूप में आधिकारिक सूची मानने का आधार नहीं मिलता।
आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?
अगर किसी व्यक्ति के साथ अपराध हुआ है तो उसे केवल सोशल मीडिया की वायरल सूची देखकर यह मानकर नहीं बैठना चाहिए कि पुलिस FIR नहीं लिखेगी।
सबसे पहले घटना के तथ्यों के आधार पर यह देखना जरूरी है कि कौन-सा कानून और कौन-सी धाराएं लागू होती हैं। यदि मामला संज्ञेय अपराध से संबंधित है तो BNSS की धारा 173 के तहत पुलिस को सूचना देने की व्यवस्था है। वहीं कुछ मामलों में संबंधित विशेष कानून के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत की प्रक्रिया लागू हो सकती है।
उत्तर प्रदेश में FIR व्यवस्था को लेकर नया पुलिस परिपत्र जरूर जारी हुआ है, लेकिन इसे “31 गंभीर अपराधों में FIR पर रोक” के रूप में प्रचारित करना सही तस्वीर नहीं देता।
असल बदलाव का संबंध उन मामलों से है जहां BNSS या किसी विशेष कानून के तहत परिवाद/शिकायत के माध्यम से न्यायालय की प्रक्रिया अपनाई जानी है। यूपी पुलिस का Circular 18/18A इसी संदर्भ में 25 फरवरी 2026 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में जारी किया गया है।
इसलिए किसी भी व्यक्ति को यह तय करने से पहले कि उसे थाने जाना है या मजिस्ट्रेट कोर्ट में शिकायत करनी है, अपने मामले में लागू अपराध और संबंधित कानून की प्रक्रिया देखनी चाहिए। केवल वायरल 31 मामलों की सूची के आधार पर कानूनी निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
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Uttar Pradesh FIR Rules 2026 have become a major topic after UP Police issued Circular 18/18A in compliance with an Allahabad High Court order. The circular concerns cases under the BNSS 2023 and other laws where proceedings may have to begin through a complaint before a Magistrate rather than direct police registration of an FIR. The viral claim about 31 cases where FIRs cannot be registered directly needs careful legal interpretation because the official UP Police circular does not establish the same blanket 31-case list circulating on social media. The article explains UP Police FIR rules, BNSS Section 173, Magistrate complaint procedure, and the actual scope of the 2026 circular.



















