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आखिर ट्रंप क्यों भारत से हताश दिख रहे हैं? टैरिफ विवाद, ट्रेड डील और रूसी तेल पर टकराव

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AIN NEWS 1 | भारत और अमेरिका के रिश्तों में पिछले कुछ समय से खटास देखने को मिल रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि वह रूस से तेल खरीदना बंद करे और अमेरिका के साथ नई ट्रेड डील को स्वीकार करे। लेकिन भारत ने अब तक साफ कर दिया है कि वह किसी भी बाहरी दबाव में अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन बार-बार नाराजगी जता रहा है और लगातार टैरिफ के हथियार से भारत को डराने की कोशिश कर रहा है।

भारत ने ट्रंप की शर्तें ठुकराईं

ट्रंप सरकार का कहना था कि अगर भारत रूस से तेल आयात बंद कर दे तो अमेरिका टैरिफ कम कर सकता है और ट्रेड डील पर बातचीत आगे बढ़ सकती है। लेकिन भारत ने अपने रुख को स्पष्ट कर दिया – “हम अपने लोगों की जरूरत और देश के हित को देखते हुए ही निर्णय लेंगे।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हालिया मुलाकात ने भी यही संदेश दिया कि भारत अब किसी के दबाव में आकर फैसला नहीं करेगा।

भारत की यह सख्त नीति ट्रंप को नागवार गुजरी। उन्होंने भारत-अमेरिका ट्रेड डील को एकतरफा और अनुचित करार देते हुए यहां तक कहा कि अब भारत द्वारा टैरिफ कम करने की पेशकश भी बहुत देर से आई है।

जापान और दक्षिण कोरिया का हवाला देकर दबाव

ट्रंप ने भारत पर दबाव बनाने के लिए जापान और दक्षिण कोरिया का उदाहरण दिया। उनका तर्क था कि भारत की तरह ये देश भी अमेरिका पर ऊंचे टैरिफ लगाते हैं, लेकिन अंततः उन्हें अमेरिकी शर्तें माननी पड़ीं। ट्रंप का आरोप है कि भारत 100% तक टैरिफ लगाता है, जो अमेरिकी कंपनियों और उत्पादों के लिए बड़ी बाधा है।

इसके बावजूद भारत ने यह साफ किया कि उसके किसानों और घरेलू उद्योगों के खिलाफ जाकर कोई समझौता संभव नहीं है। खासकर कृषि और डेयरी सेक्टर को लेकर भारत किसी भी तरह का जोखिम लेने को तैयार नहीं है।

टैरिफ युद्ध में उलझे रिश्ते

अमेरिका ने पहले जापान और दक्षिण कोरिया पर 25% टैरिफ लगाया और उसके बाद भारत पर भी यही दर लागू की। इतना ही नहीं, जब भारत ने रूसी तेल खरीदना जारी रखा तो ट्रंप प्रशासन ने अतिरिक्त 25% टैरिफ और जोड़ दिया। यह कदम सीधे तौर पर भारत पर दबाव बनाने के लिए उठाया गया।

लेकिन भारत ने एक बार फिर साफ कर दिया कि तेल जैसी बुनियादी जरूरत पर वह किसी दूसरे देश की शर्तें नहीं मानेगा। भारत का तर्क है कि ऊर्जा सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसके लिए वह हर वह विकल्प चुनने के लिए स्वतंत्र है जो उसके नागरिकों के हित में हो।

नई वैश्विक धुरी का संकेत

शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में भारत, रूस और चीन की एकजुटता ने यह संदेश और मजबूत कर दिया कि अब दुनिया अमेरिका की धमकियों से आगे बढ़कर नए गठजोड़ बना रही है। इस मंच पर प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति पुतिन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की साझेदारी ने दिखा दिया कि भारत के पास व्यापार और कूटनीति के कई विकल्प मौजूद हैं।

यह भी स्पष्ट है कि भारत केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं है। एशिया, यूरोप और अन्य साझेदार देशों के साथ व्यापार बढ़ाकर भारत अपनी अर्थव्यवस्था के लिए वैकल्पिक रास्ते तैयार कर रहा है।

किसानों और आम जनता का हित सर्वोपरि

भारत सरकार का रुख यह है कि किसी भी ट्रेड डील में सबसे पहले किसानों और आम नागरिकों के हित देखे जाएंगे। अमेरिका चाहता है कि उसका डेयरी और कृषि क्षेत्र भारत में एंट्री पाए, लेकिन भारत का मानना है कि इससे घरेलू किसानों को नुकसान होगा। यही कारण है कि भारत ने अमेरिका के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

सरकार ने दो टूक कहा कि आर्थिक नीतियां और व्यापारिक समझौते केवल देश के विकास और जनता की सुरक्षा के आधार पर ही होंगे।

ट्रंप की बढ़ती हताशा

अमेरिकी राष्ट्रपति लगातार कठोर बयान दे रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर भारत ने उनकी शर्तें नहीं मानीं तो और कड़े आर्थिक कदम उठाए जाएंगे। लेकिन भारत का जवाब साफ है – “हम अपनी जरूरतों और हितों के हिसाब से फैसले लेंगे, किसी बाहरी दबाव में नहीं।”

यही सख्त रुख ट्रंप की हताशा का कारण है। भारत आज ऊर्जा, व्यापार और वैश्विक कूटनीति में अपनी स्वतंत्र नीति पर चल रहा है, और यही बात अमेरिका को खटक रही है।

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