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जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने WIFE के फुलफॉर्म वाले बयान पर दी सफाई, कहा—भारतीय संस्कृति में महिला ‘देवी’ है!

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AIN NEWS 1: जगद्गुरु रामभद्राचार्य एक बार फिर चर्चा में हैं। हाल ही में दिए गए एक बयान में उन्होंने ‘WIFE’ शब्द का फुलफॉर्म समझाते हुए जो टिप्पणी की थी, वह सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई। आलोचनाओं और प्रतिक्रियाओं के बीच अब उन्होंने खुद आगे आकर इस मुद्दे पर सफाई दी है। उनका यह स्पष्टीकरण उत्तर प्रदेश के संभल में शुरू हुई साप्ताहिक श्री कल्कि कथा से पहले सामने आया, जहां वे मुख्य वक्ता हैं।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

बीते दिनों एक कार्यक्रम के दौरान रामभद्राचार्य ने ‘WIFE’ शब्द को अंग्रेजी संस्कृति का बताया और उसका अपना एक व्याख्या रूप प्रस्तुत किया। इस दौरान कही गई उनकी बातें कई लोगों को गलत लगीं और सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आने लगीं। कुछ लोगों ने उनके बयान को महिलाओं के सम्मान से जोड़ दिया, तो कुछ ने इसे भारतीय संस्कृति पर उनका व्यक्तिगत दृष्टिकोण बताया।

बढ़ते विवाद को देखते हुए जगद्गुरु ने साफ किया कि उनका उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं था। उन्होंने कहा कि वह सिर्फ भारतीय और पाश्चात्य सोच में अंतर को समझाने की कोशिश कर रहे थे।

“हमारे यहां पत्नी नहीं, धर्मपत्नी कहा जाता है”

रामभद्राचार्य ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में विवाह सिर्फ दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का, दो संस्कृतियों का और दो जीवन मूल्यों का मिलन है।

उन्होंने आगे कहा,

“हमारी संस्कृति में किसी महिला को सिर्फ ‘पत्नी’ कहने की परंपरा नहीं रही। हम उसे ‘धर्मपत्नी’ कहते हैं। उसका सम्मान कहीं अधिक है। अंग्रेजों के समय में ऐसे कई शब्द हमारे जीवन में आए जिनका भाव हमारी परंपरा से मेल नहीं खाता।”

उनका कहना है कि भारतीय समाज में महिला को हमेशा देवी स्वरूप माना गया है। इसलिए वे बार-बार इस बात को दोहराते हैं कि महिला न तो किसी की ‘बीवी’ है और न ही पाश्चात्य सोच के अनुसार केवल ‘बेबी’। बल्कि भारतीय दृष्टि में वह पूजनीय है—देवी समान।

“तलाक का कॉन्सेप्ट भारत की मूल परंपरा में नहीं था”

जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने यह भी कहा कि भारत में प्राचीन काल से ही वैवाहिक संबंध को अत्यंत पवित्र माना जाता है। उनका दावा है कि तलाक की अवधारणा भारत में स्वाभाविक रूप से न होकर बाहरी प्रभावों से आई।

उन्होंने कहा,

“हमारे समाज में विवाह एक संस्कार है, अनुबंध नहीं। पश्चिमी दुनिया में विवाह तोड़ना आसान है, इसलिए वह संस्कृति तलाक को सामान्य मानती है। लेकिन भारत में विवाह को जन्म-जन्मांतर का बंधन माना गया है।”

उनके अनुसार, समय के साथ आधुनिकता के कारण भारतीय जीवन में भी कई बाहरी अवधारणाएँ प्रवेश कर गईं, लेकिन मूल भारतीय सोच आज भी परिवार और रिश्तों को सर्वोपरि मानती है।

सोशल मीडिया पर मिली मिश्रित प्रतिक्रियाएँ

रामभद्राचार्य के बयान पर सोशल मीडिया पर दो तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने उनकी बात का समर्थन किया और कहा कि भारतीय संस्कृति में महिला को उच्च स्थान दिया जाता है और वह सम्मान आज भी बरकरार रहना चाहिए।

दूसरी ओर, कुछ लोगों ने उनके सोशल मीडिया पर वायरल फुलफॉर्म को लेकर आलोचना की। कई उपयोगकर्ताओं ने लिखा कि धार्मिक नेताओं को ऐसे शब्दों के अर्थ बताने से बचना चाहिए जिनसे विवाद पैदा हो। हालांकि समर्थकों का कहना है कि रामभद्राचार्य ने केवल सांस्कृतिक अंतर को उजागर किया था।

सफाई देकर किया माहौल शांत

जब विवाद बढ़ता नजर आया, तो उन्होंने खुद सामने आकर सफाई दी। उनका कहना है कि उन्होंने किसी भी महिला का अनादर नहीं किया है। बल्कि उनकी मंशा हमेशा महिलाओं के सम्मान को लेकर सकारात्मक ही रही है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘धर्मपत्नी’ शब्द का प्रयोग भारतीय परिवार की श्रद्धा और मर्यादा से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने कहा कि भारत में महिलाओं को हमेशा से माता, शक्ति और देवी के रूप में संबोधित किया गया है। इसलिए किसी भी आधुनिक शब्द को भारतीय संस्कृति की कसौटी पर परखने से पहले यह समझना जरूरी है कि हमारे यहां महिलाओं को किस दृष्टि से देखा जाता है।

संभल में शुरू हुई श्री कल्कि कथा में उमड़ी भीड़

उनका यह बयान उस समय आया जब संभल में साप्ताहिक श्री कल्कि कथा की शुरुआत हो रही है। धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। आयोजकों का कहना है कि कथा के दौरान जगद्गुरु रामभद्राचार्य धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विषयों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

कथा शुरू होने से पहले दिए गए उनके बयान ने एक तरह से माहौल स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी प्रकार की गलतफहमी को बढ़ने नहीं देना चाहते।

महिलाओं के सम्मान पर दिया जोर

अपनी सफाई में उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारतीय समाज में महिलाओं को माता, शक्ति और जीवनदायिनी के रूप में माना जाता है। उन्होंने कहा कि “भारतीय संस्कृति का वास्तविक स्वरूप यही है कि महिला सिर्फ एक भूमिका नहीं निभाती, वह परिवार की आधारशिला होती है।”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि आधुनिक समय में कई शब्दों का इस्तेमाल बिना सोचे-समझे किया जाता है, जबकि भारतीय जीवनदर्शन हमेशा महिलाओं को उच्चतम सम्मान देने की बात करता है।

रामभद्राचार्य के इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि वे किसी भी तरह की गलत व्याख्या को दूर करना चाहते थे। उनका उद्देश्य भारतीय और पाश्चात्य सोच के अंतर को समझाना था, न कि किसी का अपमान करना। संभल में शुरू हुई उनकी कथा के साथ अब माहौल शांत होता दिखाई दे रहा है और लोग उनके आध्यात्मिक संदेशों को सुनने के लिए उत्सुक हैं।

Jagadguru Rambhadracharya’s clarification on his viral WIFE full form remark comes ahead of the Sambhal Kalki Katha event in Uttar Pradesh. Emphasizing Indian culture, he explained that concepts like divorce, Western interpretations of “wife,” and modern terminology do not reflect traditional Hindu values. Instead, the idea of Dharmpatni, respect for women, and Indian marriage traditions remain central themes in his message, making his clarification an important part of the ongoing discussion.

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