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घुटने के ऑपरेशन के बाद भी नहीं मिला दर्द से आराम, लोक अदालत ने मैक्स अस्पताल के डॉक्टर को 20 लाख रुपये मुआवजा देने का दिया आदेश!

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AIN NEWS 1: गाजियाबाद से सामने आए एक अहम फैसले ने निजी अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता और डॉक्टरों की जिम्मेदारी पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। घुटने के दर्द से परेशान एक महिला को ऑपरेशन के बाद भी राहत न मिलना, उल्टा तकलीफ बढ़ जाना, मैक्स अस्पताल के एक डॉक्टर को भारी पड़ गया। स्थायी लोक अदालत ने इस मामले में डॉक्टर को दोषी मानते हुए पीड़िता को 20 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया है।

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यह मामला लोनी क्षेत्र के रहने वाले वीर सिंह और उनकी पत्नी से जुड़ा है। वीर सिंह की पत्नी लंबे समय से घुटने के तेज दर्द से जूझ रही थीं। चलने-फिरने, उठने-बैठने और रोजमर्रा के कामों में उन्हें काफी दिक्कत होती थी। परिवार ने पहले स्थानीय स्तर पर और फिर अन्य अस्पतालों में इलाज कराया, लेकिन कहीं से भी उन्हें स्थायी राहत नहीं मिली।
आखिरकार, बेहतर इलाज की उम्मीद में वीर सिंह अपनी पत्नी को गाजियाबाद के वैशाली स्थित मैक्स अस्पताल लेकर पहुंचे। यहां जांच के बाद डॉक्टर ने बताया कि घुटने की समस्या काफी गंभीर है और अब सर्जरी ही एकमात्र विकल्प बचा है। डॉक्टर ने भरोसा दिलाया कि ऑपरेशन के बाद दर्द से राहत मिलेगी और महिला सामान्य जीवन जी सकेगी।

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डॉक्टर की सलाह पर भरोसा करते हुए परिवार ने घुटने का ऑपरेशन कराने का फैसला किया। इलाज पर मोटी रकम खर्च की गई और उम्मीद थी कि अब वर्षों पुरानी समस्या से निजात मिल जाएगी। लेकिन ऑपरेशन के बाद जो हुआ, उसने मरीज और उसके परिवार को पूरी तरह तोड़कर रख दिया।
ऑपरेशन के बाद महिला की हालत में सुधार होने के बजाय परेशानी और बढ़ गई। न सिर्फ दर्द कम नहीं हुआ, बल्कि पहले के मुकाबले अधिक तेज दर्द रहने लगा। चलने-फिरने में दिक्कत बढ़ गई और जीवन की गुणवत्ता और खराब हो गई। लगातार दर्द और मानसिक तनाव से गुजर रही महिला को बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाने पड़े, लेकिन कोई संतोषजनक समाधान नहीं मिला।
जब लंबे समय तक इलाज के बाद भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तब पीड़िता और उसके परिवार ने न्याय का रास्ता अपनाने का फैसला किया। उन्होंने मैक्स अस्पताल के प्रबंध निदेशक और ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर के खिलाफ स्थायी लोक अदालत में याचिका दाखिल की। याचिका में इलाज में लापरवाही, गलत सलाह और मरीज को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया गया।
लोक अदालत में सुनवाई के दौरान पीड़िता की ओर से इलाज से जुड़े सभी दस्तावेज, मेडिकल रिपोर्ट और ऑपरेशन से पहले और बाद की स्थिति का विवरण पेश किया गया। यह बताया गया कि डॉक्टर ने ऑपरेशन से पहले जिस तरह के लाभ का दावा किया था, वैसा कुछ भी देखने को नहीं मिला।
वहीं, डॉक्टर और अस्पताल प्रबंधन की ओर से भी अपना पक्ष रखा गया। उन्होंने ऑपरेशन को मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार बताया और किसी भी तरह की लापरवाही से इनकार किया। हालांकि, अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों का बारीकी से अध्ययन किया।
स्थायी लोक अदालत की अध्यक्ष रीता सिंह ने मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी ऑपरेशन के बाद मरीज को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता और उसकी हालत लगातार बिगड़ती जाती है, तो इसे सामान्य चिकित्सा जोखिम नहीं कहा जा सकता। अदालत के अनुसार, इस मामले में मरीज को न तो दर्द से राहत मिली और न ही जीवन की गुणवत्ता में कोई सुधार हुआ, जो चिकित्सकीय लापरवाही की ओर इशारा करता है।
अदालत ने यह भी माना कि मरीज ने डॉक्टर की सलाह पर भरोसा करके ऑपरेशन कराया और इसके बदले उसे मानसिक, शारीरिक और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। ऐसे में ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर की जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है।
सभी तथ्यों और साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए लोक अदालत ने ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर को 20 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति पीड़िता को देने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राशि चार महीने के भीतर अदा की जानी होगी।
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि मैक्स अस्पताल की व्यवस्थाओं में लापरवाही को लेकर अस्पताल के प्रबंध निदेशक और अधीक्षक के खिलाफ दायर मामला अभी विचाराधीन है। इस पर आगे की सुनवाई के बाद अलग से निर्णय लिया जाएगा।
यह फैसला उन हजारों मरीजों के लिए एक मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है, जो महंगे निजी अस्पतालों में बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय डॉक्टरों और अस्पतालों को यह संदेश देता है कि इलाज में लापरवाही की कीमत चुकानी पड़ सकती है।
स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े मामलों में बढ़ती शिकायतों के बीच यह फैसला मरीजों के अधिकारों को मजबूत करता है और यह स्पष्ट करता है कि डॉक्टरों की जिम्मेदारी सिर्फ इलाज करना नहीं, बल्कि मरीज को सही जानकारी और

A medical negligence case in Ghaziabad has brought Max Hospital under scrutiny after a knee surgery failed to relieve a patient’s pain. The Lok Adalat ruled that the doctor responsible for the operation must pay ₹20 lakh as compensation, highlighting growing concerns over medical malpractice, patient rights, and accountability of private hospitals in India.

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