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मथुरा कोर्ट का बड़ा फैसला: फर्जी मुठभेड़ मामले में 15 पुलिसकर्मियों पर FIR के आदेश!

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AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसने पुलिस प्रशासन में हड़कंप मचा दिया है। फरह क्षेत्र के कोह गांव के ग्राम प्रधान हरेंद्र सिंह के कथित फर्जी एनकाउंटर मामले में अदालत ने हाथरस जिले के SOG प्रभारी, कोतवाली प्रभारी सहित कुल 15 पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं। यह फैसला 27 नवंबर को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) उत्सव गौरव राज ने सुनाया, जिसके बाद पूरे इलाके में इस प्रकरण की चर्चा तेज हो गई।

घर में घुसकर ग्राम प्रधान को पकड़ा ले गई पुलिस टीम

कोह गांव के गजेंद्र सिंह ने अदालत में प्रार्थना पत्र देकर बताया कि 25 फरवरी की सुबह करीब चार बजे हाथरस SOG प्रभारी धीरज गौतम और कोतवाली प्रभारी सत्येंद्र सिंह भारी पुलिस बल के साथ उनके घर में घुस आए। गजेंद्र के अनुसार, पुलिस ने दीवार फांदकर घर में जबरन प्रवेश किया और उनके बेटे तथा ग्राम प्रधान हरेंद्र को मारपीट करते हुए जबरन गाड़ी में बैठा लिया।

गजेंद्र का आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने न सिर्फ हरेंद्र को जबरन उठाया बल्कि उसकी पत्नी के मोबाइल फोन, हरेंद्र का मोबाइल और घर में रखे 50 हजार रुपये भी अपने साथ ले गए। उन्होंने दावा किया कि पूरे ऑपरेशन के दौरान किसी प्रकार की कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।

वादी ने अदालत को बताया कि इस कार्रवाई में SI सत्यवीर सिंह, रणजीत सिंह, राधाकृष्ण, मुख्य आरक्षी मनोज कुमार, राजेश कुमार, आरक्षी अरविंद कुमार, योगेश, नीलेश, धीरज और चालक विकास बाबू सहित 4–5 अज्ञात पुलिसकर्मी भी शामिल थे।

फर्जी मुठभेड़ का आरोप, गोली मारकर जेल भेजा गया

गजेंद्र के अनुसार, पुलिस ने हरेंद्र को उठाने के बाद उसे फरह से सादाबाद कोतवाली क्षेत्र में ले जाकर रात करीब 10 बजे एक फर्जी मुठभेड़ दिखाया। आरोप है कि मुठभेड़ का नाटक रचते हुए हरेंद्र की टांगों में गोली मारी गई और उसे ‘वांछित अपराधी’ दिखाते हुए गिरफ्तार दिखाया गया। इसके बाद उसे जेल भेज दिया गया।

वादी का दावा है कि हरेंद्र को न केवल फर्जी एनकाउंटर में फंसाया गया, बल्कि दो अन्य झूठे मामलों में भी आरोपित किया गया, जिसके चलते उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। वर्तमान में हरेंद्र जमानत पर बाहर हैं।

अदालत में पेश किए मजबूत सबूत

गजेंद्र सिंह ने अपनी याचिका में कई महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत किए, जिससे उनकी शिकायत को बल मिला। उन्होंने अदालत को –

घर में पुलिसकर्मियों के घुसने की CCTV फुटेज,

टोल प्लाजा से गुजरती पुलिस की गाड़ी के प्रमाण,

पुलिस टीम के मोबाइल फोन की लोकेशन,

और आसपास के अन्य प्रत्यक्ष सबूत

पेश किए, जिनसे उन्होंने सिद्ध किया कि हरेंद्र को घर से जबरन ले जाया गया था और बाद में फर्जी मुठभेड़ में उसे फंसाया गया।

इन प्रमाणों ने अदालत को यह मानने पर मजबूर किया कि मामला गंभीर है और इसकी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

अदालत का आदेश: पुलिसकर्मियों पर दर्ज हो मुकदमा

सभी तथ्यों पर गौर करने के बाद मथुरा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट उत्सव गौरव राज ने फरह थाना प्रभारी को आदेश दिया कि मामले में शामिल सभी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध उचित धाराओं में FIR दर्ज की जाए और पूरी जांच नियमानुसार की जाए।

यह आदेश मंगलवार की रात थाना प्रभारी त्रिलोकी सिंह को प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि कोर्ट के निर्देश के अनुसार आगे की आवश्यक कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

मामले ने उठाए कई सवाल

यह पूरा मामला राज्य में कानून-व्यवस्था और पुलिस कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। ग्राम प्रधान के परिजनों का कहना है कि हरेंद्र के खिलाफ पहले से कोई ठोस आरोप नहीं थे और पुलिस ने जानबूझकर एक फर्जी कथा तैयार की। वहीं अदालत में प्रस्तुत सबूत इस केस को और गंभीर बनाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह पुलिसिया अत्याचार का गंभीर उदाहरण भी है।

जांच के बाद ही सामने आएगी सच्चाई

अदालत के आदेश के बाद अब पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज किए जाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। आगे की जांच यह साफ करेगी कि वास्तव में 25 फरवरी की सुबह क्या हुआ था और क्या ग्राम प्रधान पर की गई कार्रवाई सही थी या एक सुनियोजित साजिश।

फिलहाल, इस मामले ने न सिर्फ स्थानीय प्रशासन बल्कि पूरे प्रदेश में पुलिस की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

The case of a fake encounter in Uttar Pradesh has gained national attention after a Mathura court ordered an FIR against 15 policemen, including SOG officials and the Hathras Kotwali in-charge. The allegations claim that the village head Harendra Singh was abducted from his home, shot in the leg during a staged encounter, and falsely implicated in multiple criminal cases. With strong evidence like CCTV footage and mobile location data presented in court, the matter highlights growing concerns about police misconduct, illegal detention, and fake encounter cases in UP.

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