AIN NEWS 1: दिल्ली के एक मासूम बच्चे की दर्दनाक हत्या और उसके बाद आरोपी की सालों लंबी फरारी—यह कहानी सिर्फ एक अपराध की नहीं, बल्कि सिस्टम की चुनौतियों और इंसाफ की देर से आई जीत की भी है। आइए, पूरे मामले को क्रमवार और आसान भाषा में समझते हैं।
एक सामान्य सुबह, जो कभी खत्म नहीं हुई
20 जनवरी 1995 की सुबह, दिल्ली के दरियागंज इलाके में रहने वाले सीमेंट व्यापारी सीताराम बंसल का 13 वर्षीय बेटा संदीप बंसल रोज की तरह स्कूल के लिए निकला। समय करीब 11:30 बजे का था। परिवार के लिए यह एक सामान्य दिन था, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह दिन उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा दुःस्वप्न बन जाएगा।
शाम के 7:30 बज गए, लेकिन संदीप घर नहीं लौटा। पहले तो परिवार ने सोचा कि शायद कहीं रुक गया होगा, लेकिन समय बीतने के साथ चिंता बढ़ने लगी। रात होते-होते पूरा परिवार बेचैन हो चुका था।
फिर आया वो कॉल जिसने सब कुछ बदल दिया
अगले दिन, यानी 21 जनवरी को, संदीप के पिता के पास एक कॉल आया। फोन करने वाले ने ठंडे स्वर में कहा—“तुम्हारा बेटा हमारे कब्जे में है। अगर उसे जिंदा चाहते हो, तो 30 हजार रुपए लोनी फ्लाईओवर पर बागपत जाने वाली एसी बस में रख देना।”
यह साफ हो चुका था कि मामला अपहरण का है। परिवार के साथ-साथ पुलिस भी तुरंत हरकत में आ गई।
जांच में सामने आया चौंकाने वाला सच
पुलिस ने जांच शुरू की और संदीप के स्कूल और आसपास के लोगों से पूछताछ की। इसी दौरान एक अहम जानकारी सामने आई—संदीप को आखिरी बार उसके स्कूल के मार्शल आर्ट ट्रेनर सलीम खान के साथ रिक्शे में जाते देखा गया था।
पुलिस ने तुरंत सलीम खान को हिरासत में लिया। शुरू में उसने बचने की कोशिश की, लेकिन सख्त पूछताछ के बाद वह टूट गया।
नाले से बरामद हुई मासूम की लाश
पूछताछ के दौरान सलीम खान ने कबूल किया कि उसने संदीप की हत्या कर दी है। उसकी निशानदेही पर पुलिस ने एक नाले से संदीप का शव बरामद किया।
यह खबर सुनकर परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। जिस बेटे को वे जिंदा वापस लाने की उम्मीद कर रहे थे, वह अब इस दुनिया में नहीं था।
अदालत का फैसला: उम्रकैद
मामले की सुनवाई कड़कड़डूमा कोर्ट में चली। करीब ढाई साल बाद, 5 अगस्त 1997 को अदालत ने आरोपी सलीम खान और उसके साथी अनिल को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।
यह फैसला परिवार के लिए एक तरह से न्याय था, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
बेल मिली और फिर फरार हो गया आरोपी
24 नवंबर 2000 को सलीम खान को अंतरिम जमानत (बेल) मिल गई। लेकिन इसके बाद उसने कोर्ट में दोबारा पेशी नहीं दी और फरार हो गया।
इसके बाद शुरू हुई उसकी पहचान छुपाकर जीने की कहानी।
नया नाम, नई पहचान और नया जीवन
फरारी के दौरान सलीम खान ने सबसे पहले हरियाणा के करनाल और अंबाला में छिपकर काम किया। वहां उसने अलमारी बनाने का काम सीखा और मजदूरी की।
समय के साथ उसने अपनी पहचान बदल ली। अब वह सलीम खान नहीं, बल्कि “सलीम वास्तिक” बन चुका था।
करीब 2010 में वह गाजियाबाद आकर बस गया। यहां उसने रेडीमेड कपड़ों की दुकान खोली और एक आम नागरिक की तरह जिंदगी जीने लगा। इतना ही नहीं, समय के साथ उसने सोशल मीडिया और यूट्यूब पर भी एक्टिव होना शुरू कर दिया।
26 साल बाद गिरफ्तारी
सालों तक फरार रहने के बाद आखिरकार कानून के हाथ उससे दूर नहीं रह सके। दिल्ली पुलिस ने एक बार फिर इस केस को खंगाला और तकनीकी व मानव खुफिया जानकारी के आधार पर सलीम वास्तिक तक पहुंच गई।
उसे गाजियाबाद से गिरफ्तार कर लिया गया और फिर उसे तिहाड़ जेल भेज दिया गया।
एक अधूरी कहानी का अंत
संदीप बंसल की हत्या ने एक परिवार की खुशियां हमेशा के लिए छीन लीं। 26 साल बाद आरोपी की गिरफ्तारी जरूर हुई, लेकिन यह सवाल आज भी कायम है कि अगर वह पहले ही पकड़ा जाता, तो क्या न्याय और जल्दी मिल सकता था?
यह मामला हमें याद दिलाता है कि अपराध चाहे कितना भी पुराना क्यों न हो, कानून की पकड़ से बच पाना आसान नहीं है।
The Sandeep Bansal murder case is one of the most shocking crime stories from Delhi in 1995, where a 13-year-old boy was kidnapped and killed by his martial arts trainer Salim Khan. After being sentenced to life imprisonment, the accused absconded and lived under a new identity as Salim Vastic for over 26 years. Recently, Delhi Police successfully arrested him from Ghaziabad, bringing a long-awaited breakthrough in this high-profile kidnapping and murder case. This case highlights how criminals can evade law for years, but justice eventually catches up.


















