AIN NEWS 1: भारत में करेंसी व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत 10 रुपये और 20 रुपये के पॉलिमर (प्लास्टिक) नोटों का फील्ड ट्रायल किया जाएगा। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में जानकारी दी कि शुरुआती चरण में 10 रुपये के 100 करोड़ और 20 रुपये के 100 करोड़ नोट जारी किए जाएंगे। यानी कुल 200 करोड़ नोट, जिनकी कुल कीमत लगभग 3,000 करोड़ रुपये होगी।
हालांकि सरकार और RBI ने साफ कर दिया है कि फिलहाल कागज के नोट बंद नहीं किए जा रहे हैं। यह केवल एक परीक्षण है, ताकि अलग-अलग मौसम और परिस्थितियों में पॉलिमर नोटों की मजबूती, उपयोगिता और सुरक्षा का आकलन किया जा सके।

भारत में दोबारा क्यों लौटा प्लास्टिक नोट का विचार?
भारत में पहली बार पॉलिमर नोटों का विचार 2009 में सामने आया था। RBI ने सुझाव दिया था कि कम मूल्य वाले नोटों की उम्र बढ़ाने और नकली नोटों पर रोक लगाने के लिए प्लास्टिक नोटों का प्रयोग किया जाए।
इसके बाद 2012 में तत्कालीन सरकार ने 10 रुपये के पॉलिमर नोटों के पायलट प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी। योजना थी कि कोच्चि, जयपुर, मैसूर, भुवनेश्वर और शिमला जैसे अलग-अलग जलवायु वाले शहरों में इनका परीक्षण किया जाएगा। लेकिन विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी और कुछ वर्षों बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
करीब 17 साल बाद अब एक बार फिर यह योजना बड़े स्तर पर शुरू होने जा रही है।
ऑस्ट्रेलिया से मिली थी प्रेरणा
दुनिया में सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में पॉलिमर बैंक नोट जारी किए थे। उस समय नकली नोटों की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए नई तकनीक विकसित की गई थी। कई वर्षों के शोध के बाद ऐसा पॉलिमर नोट तैयार किया गया, जिसकी सुरक्षा पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कहीं अधिक मजबूत थी।
आज ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों ने पॉलिमर बैंक नोटों को अपनाया है और समय के साथ इनकी लोकप्रियता बढ़ी है। हालांकि इंटरनेट पर प्रचलित कुछ कहानियां, जैसे मेलबर्न के गैराज में नकली नोट छापने वाले गिरोह की घटना, आधिकारिक रूप से पूरी तरह प्रमाणित नहीं हैं। इसलिए इन्हें ऐतिहासिक तथ्य के बजाय एक चर्चित कथा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
आखिर पॉलिमर नोट होते क्या हैं?
प्लास्टिक नोट सामान्य प्लास्टिक से नहीं बनाए जाते। इन्हें एक विशेष प्रकार के पॉलिमर ‘बाय-एक्सिअली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन (BOPP)’ से तैयार किया जाता है। यह सामग्री मजबूत, लचीली और लंबे समय तक टिकाऊ होती है।
इन नोटों में पारदर्शी सुरक्षा विंडो, विशेष होलोग्राम, माइक्रो प्रिंटिंग और आधुनिक सुरक्षा फीचर शामिल किए जाते हैं, जिन्हें कॉपी करना सामान्य कागजी नोटों की तुलना में कहीं अधिक कठिन होता है।
पॉलिमर नोट कैसे तैयार किए जाते हैं?
सबसे पहले BOPP सामग्री को उच्च तापमान पर प्रोसेस करके पतली पारदर्शी शीट बनाई जाती है। इसके बाद उस पर विशेष कोटिंग की जाती है, जिससे रंगों की छपाई संभव हो सके। सुरक्षा फीचर जोड़ने के बाद अत्याधुनिक मशीनों से प्रत्येक नोट की गुणवत्ता की जांच की जाती है और फिर उन्हें प्रचलन में भेजा जाता है।
भारत को क्या होगा फायदा?
1. लंबे समय तक चलेंगे नोट
कम मूल्य वाले नोट सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं और जल्दी खराब हो जाते हैं। पॉलिमर नोट पानी, नमी, धूल और तेल का असर कम झेलते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इनकी उम्र कागज के नोटों की तुलना में कई गुना अधिक हो सकती है।
2. लंबे समय में खर्च कम होगा
हालांकि पॉलिमर नोट छापने की शुरुआती लागत अधिक होती है, लेकिन उनकी लंबी उम्र के कारण बार-बार नए नोट छापने की जरूरत कम पड़ती है। इससे लंबे समय में सरकार और RBI का खर्च कम हो सकता है।
3. नकली नोटों पर लगेगी रोक
पॉलिमर नोटों में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक सुरक्षा फीचर नकली नोट तैयार करना कठिन बना देते हैं। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि इन्हें कभी नकली नहीं बनाया जा सकता, लेकिन इनकी नकल करना कागजी नोटों की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल और महंगा होता है।
क्या इसके कुछ नुकसान भी हैं?
पॉलिमर नोटों के कई फायदे हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।
सबसे बड़ी चुनौती शुरुआती निवेश है। नई तकनीक, विशेष मशीनें और उत्पादन प्रणाली विकसित करने में काफी खर्च आएगा।
दूसरी चुनौती देशभर के एटीएम, कैश काउंटिंग मशीनों और बैंकिंग उपकरणों को नए नोटों के अनुरूप तैयार करना है। इसमें समय और अतिरिक्त निवेश दोनों की जरूरत होगी।
इसके अलावा पॉलिमर नोट भी पूरी तरह नकली नोटों से मुक्त नहीं हैं। दुनिया के कुछ देशों में आधुनिक प्रिंटिंग तकनीकों की मदद से इनके नकली संस्करण पकड़े जा चुके हैं। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था को लगातार अपडेट रखना जरूरी होगा।
क्या भविष्य में सभी भारतीय नोट प्लास्टिक के होंगे?
फिलहाल इसका जवाब ‘नहीं’ है।
सरकार ने केवल 10 और 20 रुपये के नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दी है। यदि यह परीक्षण सफल रहता है और अपेक्षित परिणाम मिलते हैं, तभी भविष्य में 50, 100, 200 या 500 रुपये के नोटों पर विचार किया जा सकता है। अभी इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
RBI किन बातों पर करेगा परीक्षण?
फील्ड ट्रायल के दौरान यह देखा जाएगा कि अलग-अलग मौसम, गर्मी, नमी, बारिश और लगातार उपयोग के दौरान पॉलिमर नोट कितने टिकाऊ रहते हैं। साथ ही यह भी जांचा जाएगा कि आम जनता, बैंकिंग प्रणाली और एटीएम मशीनों के साथ इनका प्रदर्शन कैसा रहता है।
भारत के लिए इसका क्या महत्व है?
भारत में हर साल बड़ी संख्या में कम मूल्य वाले नोट खराब हो जाते हैं, जिन्हें बदलने में भारी खर्च आता है। यदि पॉलिमर नोट सफल साबित होते हैं तो लंबे समय में नोट छापने का खर्च घट सकता है, नकली नोटों की समस्या पर बेहतर नियंत्रण मिल सकता है और आम लोगों को अधिक टिकाऊ मुद्रा उपलब्ध हो सकती है।
हालांकि यह बदलाव एक दिन में नहीं होगा। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को भी पूरी तरह पॉलिमर करेंसी अपनाने में कई वर्ष लगे थे। इसलिए भारत भी चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ेगा।
भारत में पॉलिमर नोटों की वापसी केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि मुद्रा व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। फिलहाल यह केवल एक परीक्षण है, लेकिन यदि इसके परिणाम सकारात्मक रहे तो आने वाले वर्षों में भारतीय करेंसी का स्वरूप बदल सकता है। अभी आम लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कागज के नोट पहले की तरह चलते रहेंगे और पॉलिमर नोट केवल परीक्षण के तौर पर बाजार में दिखाई देंगे।
India is preparing to introduce polymer banknotes through a field trial of ₹10 and ₹20 denominations approved by the government. Polymer currency is more durable, secure, water-resistant, and difficult to counterfeit compared to traditional paper notes. The Reserve Bank of India (RBI) aims to evaluate the performance of plastic currency before making any large-scale decision. This latest update explains the benefits, challenges, security features, Australia’s successful experience, and the future of polymer banknotes in India.



















