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MIT की ‘बैटरी ईंट’ तकनीक: 2,400°C तक गर्म ग्रेफाइट ब्लॉक करेंगे बिजली स्टोर, TPV सेल्स से बनेगी दोबारा बिजली

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AIN NEWS 1: सोशल मीडिया पर इन दिनों MIT की एक ऐसी तकनीक की चर्चा हो रही है, जिसे देखकर पहली नजर में लगता है कि अब ईंटें भी बैटरी का काम करेंगी। वायरल दावे में कहा जा रहा है कि MIT के वैज्ञानिकों ने ग्रेफाइट की ईंटों को करीब 2,400 डिग्री सेल्सियस तक गर्म करके उनमें बिजली स्टोर करने और बाद में उसी ऊर्जा से बिजली बनाने का तरीका विकसित किया है।

यह दावा पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन इसे समझने के लिए कुछ जरूरी बातें साफ करना बेहद जरूरी है। दरअसल, यह सामान्य मकान बनाने वाली ईंटों की बैटरी नहीं है। तकनीक का वास्तविक नाम Thermal Energy Storage यानी थर्मल एनर्जी स्टोरेज है, जिसमें बिजली को सीधे रासायनिक रूप में स्टोर करने के बजाय अत्यधिक गर्मी के रूप में सुरक्षित रखा जाता है। MIT के अनुसार, इसी दिशा में उसके प्रोफेसर Asegun Henry से जुड़ी तकनीक पर आधारित कंपनी Fourth Power काम कर रही है।

क्या सच में ग्रेफाइट की ईंटों में बिजली स्टोर होगी?

सरल भाषा में समझें तो बिजली सीधे ईंट के अंदर स्टोर नहीं होती। अतिरिक्त बिजली का इस्तेमाल ग्रेफाइट ब्लॉक्स को बेहद ज्यादा गर्म करने के लिए किया जाता है। MIT के मुताबिक Fourth Power की प्रणाली में करीब 6 फीट लंबे और 20 इंच मोटे ग्रेफाइट ब्लॉक्स को लगभग 2,400°C तक गर्म किया जाता है। इस अवस्था में सिस्टम को चार्ज माना जाता है।

यानी यहां ग्रेफाइट ब्लॉक एक तरह के हीट स्टोरेज माध्यम का काम करते हैं। यह पारंपरिक लिथियम-आयन बैटरी से बिल्कुल अलग तरीका है।

लिथियम-आयन बैटरी में ऊर्जा रासायनिक प्रक्रिया के जरिए जमा होती है, जबकि इस तकनीक में ऊर्जा को गर्मी के रूप में जमा किया जाता है।

आखिर 2,400°C तक गर्म क्यों किया जाता है?

इतना ज्यादा तापमान सुनकर सवाल उठता है कि आखिर तापमान इतना ज्यादा रखने की जरूरत क्यों है?

इसका जवाब तकनीक के दूसरे महत्वपूर्ण हिस्से यानी Thermophotovoltaic (TPV) cells में छिपा है।

बहुत ज्यादा तापमान पर गर्म पदार्थ तेज रोशनी और विकिरण छोड़ने लगता है। 2,400°C के आसपास गर्म ग्रेफाइट और गर्म धातु से निकलने वाले इस विकिरण में काफी ऊर्जा होती है। TPV सेल्स इसी प्रकाश को बिजली में बदलने का काम करती हैं।

MIT के शोधकर्ताओं ने 2022 में ऐसी TPV तकनीक का प्रदर्शन किया था, जिसने लगभग 1,900°C से 2,400°C के तापमान वाले स्रोत से करीब 40 प्रतिशत दक्षता के साथ बिजली में रूपांतरण दिखाया था।

यही उपलब्धि इस तरह की थर्मल बैटरी को व्यावहारिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जाती है।

सिस्टम काम कैसे करता है?

इस पूरी प्रक्रिया को चार चरणों में समझा जा सकता है।

पहला चरण—अतिरिक्त बिजली का इस्तेमाल:

जब ग्रिड पर बिजली की उपलब्धता ज्यादा होती है, तो उस ऊर्जा का इस्तेमाल सिस्टम में मौजूद हीटिंग व्यवस्था को चलाने के लिए किया जाता है।

दूसरा चरण—ग्रेफाइट ब्लॉक्स गर्म होते हैं:

हीटिंग सिस्टम ग्रेफाइट स्टोरेज ब्लॉक्स को लगभग 2,400°C तक गर्म करता है। यही इस थर्मल बैटरी का चार्ज होना है।

तीसरा चरण—गर्मी से प्रकाश पैदा होता है:

जब दोबारा बिजली की जरूरत होती है, तो गर्म ग्रेफाइट ब्लॉक्स की ऊर्जा का इस्तेमाल लिक्विड टिन को अत्यधिक गर्म करने में किया जाता है। यह पिघला हुआ टिन ग्रेफाइट पाइपों के बंद नेटवर्क के जरिए सिस्टम में घूमता है।

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चौथा चरण—TPV से बिजली:

अत्यधिक गर्म व्यवस्था से निकलने वाले प्रकाश को TPV सेल्स ग्रहण करती हैं और उसे दोबारा बिजली में बदल देती हैं। Fourth Power के अनुसार, इसके लिए TPV तकनीक को विशेष रूप से इस तरह इस्तेमाल किया गया है कि जरूरत पड़ने पर बिजली उत्पादन किया जा सके।

इसमें लिक्विड टिन की क्या भूमिका है?

यह इस तकनीक का एक खास हिस्सा है।

कई पारंपरिक थर्मल स्टोरेज प्रणालियों में गर्म गैस या molten salt को धातु के पाइपों से गुजारा जाता है। लेकिन जब तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो पाइपों की सामग्री के सामने बड़ी चुनौती पैदा होती है।

Fourth Power का तरीका अलग है। कंपनी के मुताबिक इसमें liquid tin को heat-transfer fluid के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और उसे ग्रेफाइट पाइपों के जरिए चलाया जाता है। गर्मी को फिर carbon storage blocks में जमा किया जाता है।

MIT की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, Fourth Power ने 2023 से अपने सिस्टम के अलग-अलग हिस्सों की durability और reliability का परीक्षण किया है।

क्या यह सामान्य बैटरी से बेहतर है?

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह तकनीक हर मामले में लिथियम-आयन बैटरी को पीछे छोड़ देगी। इसका लक्ष्य भी मुख्य रूप से मोबाइल फोन या इलेक्ट्रिक कार जैसी छोटी बैटरी को बदलना नहीं है।

इसका असली लक्ष्य बड़े पैमाने पर बिजली का भंडारण है।

विशेष रूप से सौर और पवन ऊर्जा में एक बड़ी समस्या यह है कि बिजली उत्पादन हमेशा मांग के समय नहीं होता। दिन में सौर ऊर्जा ज्यादा मिल सकती है, जबकि बिजली की मांग शाम और रात में बढ़ सकती है।

ऐसे में अतिरिक्त बिजली को गर्मी के रूप में लंबे समय तक स्टोर करके बाद में जरूरत के समय वापस बिजली में बदलना उपयोगी हो सकता है।

MIT Climate Portal के अनुसार Fourth Power का सिस्टम लगभग 10 से 100 घंटे या उससे ज्यादा अवधि के ऊर्जा भंडारण के लिए लक्षित है।

डेटा सेंटर और AI के दौर में क्यों महत्वपूर्ण?

आज AI और क्लाउड कंप्यूटिंग की वजह से बड़े डेटा सेंटरों की बिजली जरूरत तेजी से बढ़ रही है। इन केंद्रों को लगातार और भरोसेमंद बिजली की आवश्यकता होती है।

ऐसे में केवल सौर या पवन ऊर्जा पर्याप्त नहीं हो सकती, क्योंकि उनका उत्पादन मौसम और समय पर निर्भर करता है। थर्मल बैटरी जैसी तकनीक अतिरिक्त renewable energy को बाद के लिए सुरक्षित रखने में मदद कर सकती है।

MIT के अनुसार Fourth Power अपने सिस्टम को power grids, power producers और energy-intensive infrastructure जैसे data centers के लिए विकसित कर रही है।

अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?

यह तकनीक अभी केवल प्रयोगशाला की अवधारणा नहीं रह गई है। MIT News के मार्च 2026 के अपडेट के मुताबिक Fourth Power ने 1 मेगावाट-घंटे (MWh) क्षमता वाले एक सिस्टम को अपने Massachusetts स्थित नए मुख्यालय में चालू करने की योजना बनाई है।

कंपनी भविष्य में इससे कहीं बड़े सिस्टम की कल्पना कर रही है। MIT के अनुसार एक पूर्ण आकार की प्रणाली करीब 25 MW बिजली और 250 MWh ऊर्जा भंडारण क्षमता तक जा सकती है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसी विशाल प्रणाली अभी व्यावसायिक स्तर पर बड़े पैमाने पर चल रही है। तकनीक को आगे बढ़ाने के लिए अभी प्रदर्शन, लागत, विश्वसनीयता और बड़े पैमाने पर संचालन जैसे सवालों का जवाब देना जरूरी है।

फैक्ट चेक: वायरल दावा कितना सही?

वायरल पोस्ट में यह कहना कि “MIT ने ऐसी ईंट बना दी जो खुद बैटरी की तरह बिजली देती है”, तकनीकी रूप से सही तस्वीर नहीं है।

सही बात यह है कि MIT से जुड़ी शोध तकनीक और Fourth Power का सिस्टम ग्रेफाइट ब्लॉक्स में ऊर्जा को गर्मी के रूप में स्टोर करता है। बाद में अत्यधिक गर्मी और उससे निकलने वाले प्रकाश का इस्तेमाल TPV सेल्स के जरिए बिजली बनाने में किया जाता है।

इसलिए इसे “ग्रेफाइट ब्लॉक्स वाली थर्मल बैटरी” कहना ज्यादा सही होगा, न कि घर की सामान्य ईंट को बैटरी बना देना।

MIT से जुड़ी यह तकनीक वास्तव में मौजूद है और इसके पीछे गंभीर वैज्ञानिक शोध हुआ है। 2,400°C तापमान, ग्रेफाइट स्टोरेज ब्लॉक्स, लिक्विड टिन और TPV सेल्स इस सिस्टम के प्रमुख हिस्से हैं। इसका उद्देश्य अतिरिक्त बिजली को गर्मी के रूप में लंबे समय तक स्टोर करके जरूरत पड़ने पर फिर बिजली में बदलना है।

फिलहाल इसे भविष्य की long-duration energy storage तकनीक के रूप में देखना ज्यादा उचित है। यह कहना कि अब सामान्य घरों की ईंटें बिजली की बैटरी बन जाएंगी, गलत या भ्रामक होगा।

फैक्ट चेक निष्कर्ष: दावा मूल रूप से सही, लेकिन सोशल मीडिया में बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है।

MIT thermal battery technology developed with Fourth Power uses graphite bricks heated to around 2,400°C to store energy as heat. When electricity is needed, liquid tin transfers heat through graphite pipes and Thermophotovoltaic (TPV) cells convert the intense thermal radiation into electricity. The technology is designed for long-duration energy storage, renewable energy integration, power grids and high-demand facilities such as data centers.

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