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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: यूपी में सरकारी जमीन से 90 दिन में हटाना होगा अवैध कब्जा, प्रधान-लेखपाल पर भी कार्रवाई

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AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश में सरकारी जमीन, ग्राम सभा की भूमि और सार्वजनिक उपयोग के स्थलों पर अवैध कब्जे को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्यभर में सार्वजनिक भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए हैं। आदेश के मुताबिक, ग्राम प्रधान और लेखपाल को अतिक्रमण की जानकारी निर्धारित समय के भीतर संबंधित तहसीलदार तक पहुंचानी होगी। वहीं, तहसीलदार को नोटिस जारी होने के बाद अतिक्रमण से संबंधित कार्यवाही 90 दिनों के भीतर पूरी करने का प्रयास करना होगा। पर्याप्त कारण के बिना देरी होने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल कागजों पर आदेश पारित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। सार्वजनिक जमीन को वास्तव में कब्जे से मुक्त कराकर उसके मूल उपयोग के लिए बहाल करना जरूरी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस प्रशासन को भी राजस्व अधिकारियों की सहायता करने के निर्देश दिए गए हैं।

6 अक्टूबर 2025 को आया था हाईकोर्ट का फैसला

यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका मनोज कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य से संबंधित है। अदालत ने 6 अक्टूबर 2025 को इस मामले में आदेश पारित किया था। न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की पीठ के सामने मिर्जापुर जिले की चुनार तहसील के चौका गांव में तालाब पर कथित अवैध कब्जे और स्थानीय अधिकारियों की निष्क्रियता का मामला उठाया गया था।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर कब्जे की जानकारी संबंधित अधिकारियों को दिए जाने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। इसके बाद अदालत ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 और उससे संबंधित नियमों का परीक्षण करते हुए सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा के लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी स्पष्ट की।

यह फैसला केवल एक गांव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अदालत ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलों और तहसीलों के प्रशासनिक अधिकारियों को सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण के मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

तालाब, चारागाह और सार्वजनिक रास्तों पर कब्जे के खिलाफ सख्ती

सरकारी और ग्राम सभा की जमीन का उपयोग गांव तथा आम जनता की जरूरतों के लिए किया जाता है। तालाब जल संरक्षण में मदद करते हैं, चारागाह पशुओं के लिए उपयोगी होते हैं और सार्वजनिक रास्ते लोगों की आवाजाही के लिए जरूरी हैं। ऐसी जमीनों पर अवैध कब्जा होने से पूरे समुदाय को नुकसान पहुंचता है।

हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत ग्राम सभा, ग्राम पंचायत और सार्वजनिक उपयोग के लिए दर्ज भूमि पर अतिक्रमण के मामलों में नियमानुसार कार्रवाई की जानी है। इसमें तालाब, चारागाह, सार्वजनिक रास्ते, चकरोड तथा अन्य सार्वजनिक उपयोग की भूमि शामिल हो सकती है। राज्य सरकार या स्थानीय निकायों की जमीन पर कब्जे के मामलों में भी संबंधित अधिकारियों को अपने कानूनी दायित्वों के अनुसार कदम उठाने होंगे।

हालांकि, किसी जमीन पर अवैध कब्जा होने का अंतिम निर्धारण संबंधित राजस्व रिकॉर्ड, उपलब्ध साक्ष्यों और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर किया जाएगा।

ग्राम प्रधान और लेखपाल को 60 दिनों के भीतर देनी होगी सूचना

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता नियमावली, 2016 के नियम 66 के तहत भूमि प्रबंधक समिति के अध्यक्ष, सचिव या संबंधित जिम्मेदार पदाधिकारियों को ग्राम पंचायत की संपत्ति पर अवैध कब्जे की जानकारी सक्षम राजस्व अधिकारी तक पहुंचानी होती है।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि संबंधित ग्राम प्रधान और लेखपाल अतिक्रमण की जानकारी राजस्व प्रपत्र संख्या 19 के माध्यम से संबंधित तहसीलदार या तहसीलदार (न्यायिक) तक निर्धारित 60 दिनों के भीतर पहुंचाएं।

ग्राम प्रधान भूमि प्रबंधक समिति के अध्यक्ष और लेखपाल उसके सचिव की भूमिका निभाते हैं। इसलिए सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा और अतिक्रमण की सूचना देने में उनकी जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है।

यदि संबंधित पदाधिकारी निर्धारित समय में सूचना नहीं देते या जानबूझकर अतिक्रमण की जानकारी छिपाते हैं, तो उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की जा सकती है। अदालत ने परिस्थितियों के अनुसार ग्राम प्रधान को पद से हटाने की कार्यवाही और आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के निर्देश भी दिए हैं।

तहसीलदार को 90 दिनों में पूरी करनी होगी कार्यवाही

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 67 ग्राम पंचायत या संबंधित स्थानीय प्राधिकरण की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, उसका दुरुपयोग करने और उस पर अवैध कब्जे से संबंधित कार्रवाई का प्रावधान करती है।

इस प्रावधान के तहत संबंधित अधिकारी अतिक्रमण के मामले की जांच कर सकते हैं और नियमों के अनुसार नोटिस जारी कर प्रभावित पक्ष से जवाब मांग सकते हैं। इसके बाद उपलब्ध रिकॉर्ड और जवाब के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाती है।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि धारा 67 के तहत शुरू की गई कार्यवाही को कारण बताओ नोटिस जारी होने के 90 दिनों के भीतर पूरा करने का प्रयास किया जाए। यदि इस अवधि में कार्यवाही पूरी नहीं होती, तो देरी के पर्याप्त कारण दर्ज करना जरूरी होगा।

अदालत ने यह भी साफ किया कि कार्यवाही पूरी होने का अर्थ सिर्फ आदेश लिख देना नहीं है। जहां बेदखली का आदेश लागू होता है, वहां कानून के अनुसार वास्तविक कब्जा हटाना और सार्वजनिक जमीन को संबंधित ग्राम सभा या प्राधिकरण के कब्जे में वापस देना भी जरूरी है।

लापरवाही पर BNS की धारा 316 के तहत आपराधिक कार्रवाई

फैसले का महत्वपूर्ण पहलू अधिकारियों की जवाबदेही से जुड़ा है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार पदाधिकारी यदि अपने कानूनी दायित्वों की अनदेखी करते हैं, तो परिस्थितियों के अनुसार उनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 316 के तहत आपराधिक विश्वासघात से संबंधित कार्यवाही शुरू की जा सकती है। मामले के तथ्यों के आधार पर दुष्प्रेरण और आपराधिक साजिश से जुड़े प्रावधानों पर भी विचार किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त, राजस्व नियमों के तहत कर्तव्य में लापरवाही को कदाचार मानते हुए विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। ग्राम प्रधान के मामले में लागू पंचायत कानून के तहत पद से हटाने की कार्यवाही भी शुरू की जा सकती है।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि हर प्रशासनिक देरी अपने आप आपराधिक विश्वासघात साबित नहीं करती। धारा 316 लागू करने के लिए अपराध के आवश्यक कानूनी तत्वों और संबंधित तथ्यों का परीक्षण जरूरी होगा। अदालत के निर्देशों के अनुसार, कार्रवाई की प्रक्रिया कानून के अनुरूप ही पूरी की जानी चाहिए।

कब्जाधारियों को भी मिलेगा सुनवाई का अवसर

हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया में संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर देने पर भी जोर दिया है। इसका अर्थ है कि प्रशासन केवल शिकायत के आधार पर बिना निर्धारित प्रक्रिया अपनाए किसी व्यक्ति को बेदखल नहीं कर सकता।

राजस्व रिकॉर्ड, जमीन की स्थिति, कब्जे से संबंधित साक्ष्य और संबंधित व्यक्ति के जवाब पर नियमानुसार विचार किया जाएगा। इसके बाद सक्षम अधिकारी कानून के अनुसार निर्णय लेंगे।

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता के तहत संबंधित आदेश से असंतुष्ट व्यक्ति को निर्धारित समय में अपील करने का अधिकार भी मिल सकता है। केवल अपील दायर कर देने से आदेश पर अपने आप रोक नहीं लगती। इसके लिए सक्षम अपीलीय प्राधिकारी या अदालत का स्थगन आदेश महत्वपूर्ण होता है।

अतिक्रमण हटाने में पुलिस करेगी मदद

अदालत ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे सार्वजनिक भूमि से कब्जा हटाने की कार्रवाई में राजस्व अधिकारियों को आवश्यक सहयोग दें। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कार्रवाई शांतिपूर्ण ढंग से हो और कानून-व्यवस्था प्रभावित न हो।

अदालत ने जिला मजिस्ट्रेटों, उपजिलाधिकारियों और संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को भी निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने को कहा। अधिकारियों को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की भूमिका पर ध्यान देना होगा और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे।

यदि सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण की सूचना देने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई नहीं करते, तो मामले के तथ्यों के आधार पर उनके खिलाफ विभागीय, आपराधिक या अवमानना संबंधी कार्यवाही का प्रश्न उठ सकता है।

आम नागरिक क्या कर सकते हैं?

यदि किसी गांव या क्षेत्र में तालाब, चारागाह, चकरोड अथवा अन्य सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे की शिकायत है, तो नागरिक संबंधित तहसीलदार, उपजिलाधिकारी या जिला प्रशासन को लिखित शिकायत दे सकते हैं। शिकायत में गांव का नाम, खसरा संख्या, भूमि का रकबा, कब्जे की स्थिति और उपलब्ध साक्ष्य देना उपयोगी होगा।

शिकायत की प्राप्ति रसीद या अन्य प्रमाण सुरक्षित रखना चाहिए। यदि निर्धारित प्रक्रिया के बावजूद कार्रवाई नहीं होती, तो शिकायतकर्ता उच्च अधिकारियों के समक्ष मामला उठा सकता है और उपयुक्त कानूनी सलाह लेकर न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा सकता है।

क्या पूरे उत्तर प्रदेश में 90 दिन में सभी कब्जे हट चुके हैं?

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य ध्यान देने योग्य है। हाईकोर्ट का आदेश 6 अक्टूबर 2025 का है और इसकी रिपोर्टें अक्टूबर 2025 में प्रकाशित हुई थीं। इसलिए इसे अक्टूबर 2026 में आया नया फैसला बताना सही नहीं होगा।

अदालत ने सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण हटाने और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए समयबद्ध निर्देश दिए थे। लेकिन केवल इस आदेश के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि प्रदेश की सभी सरकारी जमीनों से कब्जे हट चुके हैं या हर मामले में कार्रवाई पूरी हो गई है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा, ग्राम प्रधान और लेखपाल की जवाबदेही तथा राजस्व अधिकारियों की कार्यवाही में देरी रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण है। सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे की शिकायतों में अब संबंधित अधिकारियों को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार समयबद्ध कार्रवाई करनी होगी। लापरवाही पाए जाने पर परिस्थितियों के अनुसार विभागीय और आपराधिक कार्रवाई भी की जा सकती है।

The Allahabad High Court directed Uttar Pradesh authorities to take effective action against encroachments on government land, Gram Sabha property and public utility land. The October 6, 2025 order in Manoj Kumar Singh vs State of Uttar Pradesh emphasizes accountability for village Pradhans, Lekhpals and Tehsildars. Under Section 67 of the Uttar Pradesh Revenue Code, 2006, encroachment proceedings should be completed within 90 days of issuing a show-cause notice, with reasons recorded for delays. The court also directed authorities to consider departmental and criminal proceedings, including under Section 316 of the Bharatiya Nyaya Sanhita, where legally justified. The ruling highlights public land protection, due process, eviction procedures and restoration of land for its intended public use.

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Pawan Chaudhary
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पवन चौधरी एक सक्रिय पत्रकार एवं समाचार लेखक हैं, जो जनहित से जुड़े मुद्दों, स्थानीय घटनाक्रम और सामाजिक सरोकारों को प्रमुखता से अपनी पत्रकारिता में स्थान देते हैं। वे जमीनी स्तर की खबरों को तथ्यपरक और सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। पत्रकारिता के माध्यम से पवन चौधरी आम लोगों की समस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों, सामाजिक मुद्दों और क्षेत्रीय घटनाओं को सामने लाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य निष्पक्ष एवं जिम्मेदार पत्रकारिता के जरिए समाज में जागरूकता बढ़ाना और महत्वपूर्ण मुद्दों को लोगों की आवाज बनाना है।

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