प्रयागराज | 08 नवंबर 2026 | AIN NEWS 1
उत्तर प्रदेश में पुलिस हिरासत और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। बिजनौर जिले में एक व्यक्ति को कथित रूप से दो दिनों तक अवैध हिरासत में रखने और बाद में उसकी गिरफ्तारी दिखाने के मामले में अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पुलिस द्वारा थाने की CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं करा पाने और इसके पीछे तकनीकी खराबी का तर्क देने पर न्यायालय ने कड़ी नाराजगी जाहिर की।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि उत्तर प्रदेश में नागरिक स्वतंत्रता की स्थिति शर्मनाक है। पुलिस को नागरिकों के मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बहुत कम परवाह दिखाई देती है तथा इन अधिकारों का उल्लंघन पुलिस के लिए सामान्य बात बनता जा रहा है।
न्यायालय ने संबंधित व्यक्ति को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो। इसके साथ ही राज्य सरकार को याचिकाकर्ताओं को सात दिनों के भीतर 20 हजार रुपये मुकदमे का खर्च देने का निर्देश दिया। अदालत ने थाना नांगल की तत्कालीन SHO अन्नू कुमारी के खिलाफ अपनी नाराजगी उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने और वर्तमान पद पर उनकी निरंतरता पर विचार करने को भी कहा है।
यह आदेश 3 नवंबर 2026 को न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका संख्या 1538/2026 में पारित किया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला बिजनौर जिले के थाना नांगल से जुड़ा है। न्यायालय के समक्ष दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया था कि अफजल अहमद को 5 सितंबर 2026 को पुलिस ने थाना नांगल के बाहर से जबरन हिरासत में ले लिया था, जबकि उनकी औपचारिक गिरफ्तारी 7 सितंबर 2026 को दिखाई गई।
याचिका उनकी बेटी मिस्बा नाज की ओर से दाखिल की गई थी। उन्होंने अदालत को बताया कि 5 सितंबर को वह अपने पिता के साथ थाना नांगल पहुंची थीं। दोनों को एक मामले के सिलसिले में थाने बुलाया गया था।
याचिका में लगाए गए आरोपों के अनुसार, दोपहर करीब 2:30 बजे जब वे अपनी गाड़ी में बैठे थे, तभी सफेद रंग की बोलेरो गाड़ी (UP 20 AG 0290) वहां पहुंची। उसमें से चार लोग उतरे और उन्होंने उनकी गाड़ी को घेर लिया। आरोप है कि इन लोगों ने अफजल अहमद को जबरन गाड़ी से बाहर निकाला और अपने साथ ले गए।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस कार्रवाई में पुलिसकर्मी और SOG के लोग सादे कपड़ों में शामिल थे। उनके साथ मौजूद फरमान ने मोबाइल फोन से घटना रिकॉर्ड करने का प्रयास किया, लेकिन उसे रोक दिया गया। इसके बाद फरमान ने UP-112 पर फोन करके घटना की जानकारी पुलिस को दी।
परिवार का आरोप था कि अफजल अहमद को 5 सितंबर से ही हिरासत में रखा गया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी की आधिकारिक कार्रवाई दो दिन बाद 7 सितंबर को दिखाई गई।
परिवार के विवाद से कैसे जुड़ा था मामला?
न्यायालय के आदेश में परिवार की ओर से पहले दर्ज कराई गई शिकायतों और उसके बाद सामने आए मुकदमों का भी उल्लेख है।
याचिका के अनुसार, अफजल अहमद की बेटी ने शाहबाज नाम के व्यक्ति पर नशीला पदार्थ देकर यौन उत्पीड़न करने और अश्लील तस्वीरें एवं वीडियो बनाने के आरोप लगाए थे। परिवार का कहना था कि विरोध करने के बावजूद संबंधित व्यक्ति ने कथित तौर पर तस्वीरें और वीडियो हटाने से इनकार किया।
इसके बाद 26 जून 2026 को कुछ लोगों द्वारा परिवार को धमकाने का आरोप लगाया गया। परिवार ने पुलिस अधिकारियों से शिकायत की थी।
न्यायिक आदेश के अनुसार, 29 जून को शाहबाज की ओर से अफजल अहमद और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ FIR संख्या 71/2026 दर्ज कराई गई। इसके बाद 8 जुलाई को बेटी की ओर से FIR संख्या 77/2026 दर्ज कराई गई, जिसे बाद में थाना नांगल स्थानांतरित किया गया।
वहीं, मोहम्मद अहसान की शिकायत पर 6 अक्टूबर 2026 को FIR संख्या 706/2026 दर्ज होने का भी आदेश में उल्लेख है। इसी FIR को लेकर अफजल अहमद की गिरफ्तारी और कथित अवैध हिरासत का विवाद हाईकोर्ट पहुंचा।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन सभी आरोपों पर इस बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में अंतिम आपराधिक फैसला नहीं दिया गया है।
CCTV फुटेज नहीं मिलने पर हाईकोर्ट नाराज
मामले की सच्चाई जानने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 13 अक्टूबर 2026 को राज्य सरकार को थाना नांगल की CCTV रिकॉर्डिंग प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।
अदालत ने 5 सितंबर 2026 को दोपहर 1 बजे से लेकर 7 सितंबर 2026 को सुबह 10 बजे तक की रिकॉर्डिंग मांगी थी। इसका उद्देश्य यह पता लगाना था कि अफजल अहमद वास्तव में कब थाने पहुंचे और उनके साथ पुलिस ने क्या कार्रवाई की।
लेकिन सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित अवधि की CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं है।
पुलिस की ओर से स्पष्टीकरण दिया गया कि 5 सितंबर को आंधी-तूफान और बारिश के दौरान LAN केबल के माध्यम से पानी CCTV सिस्टम में चला गया था। इसके कारण थाने का पूरा CCTV सिस्टम खराब हो गया और रिकॉर्डिंग सुरक्षित नहीं रह सकी।
CCTV खराब होने का बहाना पुलिस को नहीं बचा सकता: हाईकोर्ट
पुलिस के इस जवाब पर न्यायालय ने गंभीर नाराजगी जाहिर की। अदालत ने कहा कि जब भी CCTV फुटेज मांगी जाती है, तब अधिकांश मामलों में किसी न किसी कारण से रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आती है।
न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गैरकानूनी हिरासत के मामले में CCTV सिस्टम खराब होने का बहाना पुलिस के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि इस प्रकार का स्पष्टीकरण मिलने पर वह याचिकाकर्ताओं के इस आरोप को सही मान सकती है कि संबंधित व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया और सच्चाई सामने आने से रोकने के लिए CCTV फुटेज जानबूझकर उपलब्ध नहीं कराई गई।
यह टिप्पणी पुलिस थानों में CCTV व्यवस्था और हिरासत के दौरान पारदर्शिता की आवश्यकता को लेकर बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
SHO अन्नू कुमारी के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज होगी नाराजगी
हाईकोर्ट ने थाना नांगल की तत्कालीन SHO अन्नू कुमारी की भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि संबंधित मामले की सच्चाई जानने के लिए CCTV फुटेज बेहद महत्वपूर्ण थी, लेकिन उसे उपलब्ध नहीं कराया गया। इस आधार पर न्यायालय ने माना कि फुटेज को जानबूझकर रोका गया और उसके उपलब्ध होने से संबंधित पुलिस पक्ष के प्रतिकूल तथ्य सामने आ सकते थे।
इसके बाद अदालत ने निर्देश दिया कि SHO अन्नू कुमारी के प्रति न्यायालय की नाराजगी उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज की जाए।
इसके अलावा राज्य सरकार को यह भी विचार करने के लिए कहा गया कि वर्तमान पद पर उनकी निरंतरता उचित है या नहीं।
हालांकि, इस आदेश में अदालत ने SHO को तत्काल बर्खास्त या निलंबित करने का निर्देश नहीं दिया है। आदेश का वास्तविक अर्थ सर्विस रिकॉर्ड में न्यायालय की नाराजगी दर्ज करना और पद पर बने रहने के संबंध में सरकार से विचार करने को कहना है।
अफजल अहमद की तत्काल रिहाई का आदेश
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर ली।
न्यायालय ने निर्देश दिया कि अफजल अहमद को तत्काल रिहा किया जाए, यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं।
बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी Habeas Corpus एक संवैधानिक न्यायिक उपाय है, जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखे जाने की स्थिति में हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से राहत मांगी जा सकती है।
इस मामले में अदालत ने पाया कि 5 सितंबर से 7 सितंबर के बीच कथित हिरासत को लेकर पुलिस की ओर से संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया और महत्वपूर्ण CCTV रिकॉर्डिंग भी प्रस्तुत नहीं की गई।
इसी आधार पर याचिका स्वीकार करते हुए रिहाई का आदेश पारित किया गया।
राज्य सरकार को सात दिनों में देने होंगे ₹20 हजार
इस फैसले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू याचिकाकर्ताओं को दी गई आर्थिक राहत है।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से मांगे गए मुकदमे के खर्च को 20 हजार रुपये निर्धारित किया। राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि यह राशि सात दिनों के भीतर याचिकाकर्ताओं को दी जाए।
यदि निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होता है तो याचिकाकर्ता अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए याचिका को दोबारा सुनवाई के लिए पुनर्जीवित करा सकते हैं।
यहां एक कानूनी अंतर समझना जरूरी है। अदालत ने 20 हजार रुपये को अवैध हिरासत का मुआवजा घोषित नहीं किया है। यह मुकदमे का खर्च यानी Cost of Petition है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं ने इस मामले में मुआवजे की मांग नहीं की थी। हालांकि, उन्हें कानून के तहत उपलब्ध अन्य माध्यमों से अलग से मुआवजे की मांग करने की स्वतंत्रता रहेगी।
उत्तर प्रदेश में CCTV व्यवस्था पर भी उठे सवाल
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका संख्या 1117/2026 का भी उल्लेख किया।
अदालत ने बताया कि उत्तर प्रदेश में पुलिस थानों के CCTV सिस्टम की विफलता और फुटेज उपलब्ध नहीं होने के व्यापक मुद्दे पर एक अन्य मामले में विस्तार से विचार किया जा रहा है। उस मामले में निर्णय सुरक्षित रखा गया था।
इससे स्पष्ट है कि न्यायालय की चिंता केवल एक थाने या एक घटना तक सीमित नहीं है। पुलिस थानों में CCTV रिकॉर्डिंग का सुरक्षित रहना, समय पर उपलब्ध कराया जाना और हिरासत से संबंधित साक्ष्यों का संरक्षण भी न्यायिक चिंता का विषय है।
आम नागरिकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह फैसला प्रत्येक नागरिक को अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहने का संदेश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता केवल कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही छीनी जा सकती है।
अनुच्छेद 22 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण जानने और अपनी पसंद के वकील से परामर्श करने का अधिकार प्राप्त है। निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना भी आवश्यक है।
यदि किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया है तो उसके परिजन संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का D.K. Basu बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) का फैसला भी गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान पुलिस के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय निर्धारित करता है। वहीं, Joginder Kumar बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1994) में गिरफ्तारी की शक्ति के मनमाने इस्तेमाल पर महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए गए थे।
लोकतंत्र में पुलिस भी कानून के प्रति जवाबदेह है
इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी पुलिस प्रशासन के लिए गंभीर संदेश है। पुलिस का काम नागरिकों की सुरक्षा करना और कानून का पालन कराना है। उसे स्वयं भी संविधान और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
CCTV फुटेज का सुरक्षित रहना, गिरफ्तारी की सही समय पर रिकॉर्डिंग, हिरासत के दस्तावेजों का संरक्षण और अधिकारियों की जवाबदेही किसी भी निष्पक्ष पुलिस व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं।
बिजनौर के इस मामले में अदालत ने जिस तरह पुलिस के स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया और संबंधित अधिकारी के सर्विस रिकॉर्ड में नाराजगी दर्ज करने का निर्देश दिया, उससे यह संदेश मिलता है कि पुलिस की कार्रवाई भी न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं है।
नागरिक स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद है। कानून का शासन तभी मजबूत होगा, जब कानून लागू कराने वाली संस्थाएं भी संविधान के प्रति पूरी तरह जवाबदेह रहेंगी।
न्यायिक आदेश का विवरण
– न्यायालय: इलाहाबाद हाईकोर्ट
– मामला: Petitioner ‘X’ and another vs. State of U.P. and 4 others
– याचिका संख्या: Habeas Corpus Writ Petition No. 1538 of 2026
– निर्णय की तारीख: 3 नवंबर 2026
– पीठ: न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति अचल सचदेव
– रिपोर्टेड साइटेशन: 2026 LiveLaw (AB) 930
– मुख्य आदेश: कथित अवैध हिरासत के मामले में याचिका स्वीकार, रिहाई का निर्देश, SHO के सर्विस रिकॉर्ड में नाराजगी दर्ज करने और राज्य सरकार को ₹20,000 मुकदमे का खर्च देने का आदेश।
AIN NEWS 1 | जनहित में प्रकाशित।
The Allahabad High Court has strongly criticised the Uttar Pradesh Police over an alleged illegal detention case in Bijnor, rejecting the police explanation of CCTV system malfunction. In its November 3, 2026 judgment, the court ordered the immediate release of Afzal Ahmad, subject to him not being wanted in another case. The bench also directed that its displeasure against Nangal SHO Annu Kumari be recorded in her service records and ordered the Uttar Pradesh government to pay Rs 20,000 as litigation costs to the petitioners within seven days. The ruling highlights civil liberties, fundamental rights, illegal police detention, CCTV surveillance, habeas corpus petitions and police accountability in India.



















