AIN NEWS 1: उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बयानबाजी तेज होती दिखाई दे रही है। भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच पहले से जारी राजनीतिक मुकाबले में अब ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की सक्रियता भी चर्चा का विषय बन गई है। ओवैसी लगातार मुस्लिम समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी और स्वतंत्र नेतृत्व का मुद्दा उठा रहे हैं। उनके ‘अब अब्दुल दरी नहीं बिछाएगा’ वाले बयान ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। इसी मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी ओवैसी को निशाने पर लेते हुए तीखा हमला बोला है।
अयोध्या में दीपावली के अवसर पर आजतक के विशेष कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ओवैसी की राजनीति और उनके बयानों को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि ओवैसी जिस एजेंडे के साथ चलते हैं, वह भारत की एकता और सुरक्षा के अनुकूल नहीं है। मुख्यमंत्री ने उनके एजेंडे को भारत विरोधी और हिंदू विरोधी बताते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में ओवैसी जैसे नेताओं के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और असदुद्दीन ओवैसी को एक ही थाली का चट्टा-बट्टा भी करार दिया। मुख्यमंत्री के इस बयान को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष की राजनीति पर भाजपा के हमले के तौर पर देखा जा रहा है।
ओवैसी के किस बयान पर मचा राजनीतिक घमासान?
दरअसल, असदुद्दीन ओवैसी ने 4 नवंबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं को राजनीतिक पहचान मजबूत करने का संदेश दिया था। उन्होंने अमेरिका के मिशिगन राज्य में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद की जीत का उदाहरण देते हुए कहा कि जब मिशिगन में एक अब्दुल जीत सकता है तो उत्तर प्रदेश के अब्दुल को भी अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करनी चाहिए।
ओवैसी का संदेश केवल एक चुनावी जीत की चर्चा तक सीमित नहीं था। वह इसके माध्यम से मुस्लिम समाज को राजनीतिक नेतृत्व में अपनी भागीदारी बढ़ाने की अपील कर रहे थे।
उन्होंने अपने बयान में कहा कि अब मुस्लिम समाज केवल दूसरे राजनीतिक दलों के लिए चुनाव प्रचार करने, दरी बिछाने और वोट देने तक सीमित नहीं रहेगा। अब समाज के लोग खुद विधायक, सांसद और राजनीतिक नेता बनने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।
ओवैसी ने यह भी आरोप लगाया कि राजनीतिक दल मुस्लिम मतदाताओं का चुनाव के समय इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उन्हें नेतृत्व और सत्ता में पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं देते।
उनके इस बयान को सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की पारंपरिक राजनीति पर निशाने के रूप में देखा गया। हालांकि, ओवैसी की इस राजनीतिक सोच से सभी विपक्षी दल सहमत नहीं हैं और उनके बयान पर दूसरी पार्टियों की ओर से भी सवाल उठाए गए हैं।
अमेरिका के मिशिगन चुनाव से क्यों जोड़ रहे हैं ओवैसी यूपी की राजनीति?
ओवैसी ने अपने राजनीतिक संदेश को मजबूत करने के लिए अमेरिका के मिशिगन में अब्दुल अल-सैयद की जीत का उदाहरण दिया। नवंबर 2026 के अमेरिकी चुनाव में अल-सैयद की जीत को मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया गया।
ओवैसी का तर्क है कि यदि लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक मुस्लिम उम्मीदवार अपनी पहचान के साथ चुनाव जीतकर उच्च राजनीतिक पद तक पहुंच सकता है तो भारत में भी मुस्लिम समाज को राजनीतिक नेतृत्व के लिए आगे आना चाहिए।
उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद समुदाय के नेताओं को राजनीतिक फैसलों और सत्ता में कितनी भागीदारी मिलती है, इस पर सवाल उठना चाहिए।
यही वजह है कि ओवैसी लगातार अपने भाषणों में मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक बनकर नहीं रहने और खुद का नेतृत्व तैयार करने का संदेश दे रहे हैं।
सपा और कांग्रेस पर भी ओवैसी के निशाने
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी लंबे समय से मुस्लिम मतदाताओं के एक बड़े वर्ग का समर्थन हासिल करती रही है। कांग्रेस भी प्रदेश में अपना राजनीतिक आधार दोबारा मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
ऐसे में ओवैसी की रणनीति इन दोनों दलों के लिए चुनौती बन सकती है।
ओवैसी ने कई जनसभाओं में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस की राजनीति पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि मुस्लिम मतदाताओं को चुनाव के समय महत्व दिया जाता है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व में उन्हें अपेक्षित अवसर नहीं मिलता।
रामपुर सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में ओवैसी ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है। उन्होंने मुस्लिम समाज के युवाओं से खुद राजनीतिक नेतृत्व संभालने की अपील भी की है।
हालांकि, कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने भी ओवैसी के दावों पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि ओवैसी को पहले अपने गृह राज्य तेलंगाना में मुस्लिम नेतृत्व के विस्तार को लेकर अपने राजनीतिक रिकॉर्ड पर जवाब देना चाहिए।
इससे साफ है कि ‘अब्दुल’ को लेकर शुरू हुई बहस अब केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रही, बल्कि विपक्षी राजनीति के भीतर भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल बन गई है।
योगी आदित्यनाथ ने ओवैसी को क्यों घेरा?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आजतक के कार्यक्रम में ओवैसी के बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनकी राजनीति का एजेंडा भारत की एकता, सुरक्षा और भारतीयता के अनुकूल नहीं है।
योगी ने कहा कि ओवैसी ऐसे एजेंडे के साथ आगे बढ़ते हैं, जो देश के महान सांस्कृतिक और राष्ट्रीय मूल्यों की पुनर्स्थापना में बाधा पैदा करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी राजनीति देश की एकता को कमजोर करने वाली है।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि उत्तर प्रदेश की जनता अब राजनीतिक परिस्थितियों को समझ चुकी है। ऐसे में ओवैसी जैसे नेताओं के लिए प्रदेश में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को भी ओवैसी के साथ जोड़ते हुए विपक्षी दलों पर निशाना साधा।
मुख्यमंत्री के इस बयान को भाजपा की आगामी चुनावी रणनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, ओवैसी के एजेंडे को लेकर लगाए गए आरोप मुख्यमंत्री की राजनीतिक राय और टिप्पणी हैं। इनका उल्लेख उसी संदर्भ में किया जाना जरूरी है।
2027 के चुनाव में क्या बिगाड़ सकते हैं ओवैसी के समीकरण?
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में प्रस्तावित हैं। चुनाव से पहले राजनीतिक दल अपने-अपने सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं।
ऐसे समय में AIMIM की सक्रियता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पार्टी की कोशिश है कि मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाई जाए और उन क्षेत्रों में संगठन मजबूत किया जाए जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है।
लेकिन ओवैसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस राजनीतिक संदेश को वास्तविक चुनावी सफलता में बदलने की होगी।
वर्ष 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में AIMIM ने कई सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही थी। उसे प्रदेश स्तर पर लगभग 0.49 प्रतिशत वोट मिले थे। यह आंकड़ा बताता है कि राजनीतिक बयानबाजी और चुनावी जनाधार के बीच अभी काफी अंतर है।
इसके बावजूद 2027 के चुनाव में पार्टी की भूमिका पर नजर रखना जरूरी होगा। खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रामपुर और मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी संख्या वाले क्षेत्रों में AIMIM अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर सकती है।
क्या सपा-कांग्रेस गठबंधन को होगा नुकसान?
यह सवाल भी राजनीतिक चर्चाओं में प्रमुखता से उठ रहा है। यदि AIMIM मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करती है तो कुछ विधानसभा क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि AIMIM की मौजूदगी से हर सीट पर विपक्षी वोटों का बंटवारा होगा। चुनाव में उम्मीदवार की लोकप्रियता, स्थानीय मुद्दे, जातीय समीकरण, गठबंधन और मतदाताओं का रुझान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ओवैसी ने दूसरी विपक्षी पार्टियों के साथ गठबंधन की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया है। उनका कहना है कि AIMIM को केवल सहयोगी की तरह नहीं, बल्कि राजनीतिक हिस्सेदारी के साथ शामिल किया जाना चाहिए।
दूसरी तरफ अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का मौजूदा राजनीतिक तालमेल भी इस पूरे घटनाक्रम को महत्वपूर्ण बनाता है।
योगी ने 2027 के लिए 350 से ज्यादा सीटों का लक्ष्य दोहराया
आजतक के साथ बातचीत में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने केवल ओवैसी पर हमला नहीं किया, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा की तैयारी और लक्ष्य पर भी अपनी बात रखी।
उन्होंने 2027 के विधानसभा चुनाव में 350 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य दोहराया। इसके साथ ही अखिलेश यादव के PDA नारे पर तंज कसते हुए उसे ‘परिवार डेवलपमेंट अथॉरिटी’ बताया।
मुख्यमंत्री ने प्रदेश में रोजगार, निवेश, कानून-व्यवस्था और विकास कार्यों को भी अपनी सरकार की उपलब्धियों के रूप में गिनाया।
इससे स्पष्ट है कि भाजपा आगामी चुनाव में विकास और कानून-व्यवस्था के साथ-साथ विपक्षी दलों के राजनीतिक एजेंडे को भी चुनावी बहस का प्रमुख मुद्दा बनाना चाहती है।
अब आगे क्या होगा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी आदित्यनाथ और असदुद्दीन ओवैसी के बीच शुरू हुई यह बयानबाजी आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। एक तरफ ओवैसी मुस्लिम समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी और स्वतंत्र नेतृत्व का सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी तरफ भाजपा उनके बयानों को राष्ट्रीय एकता और विचारधारा के मुद्दे से जोड़कर जवाब दे रही है।
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के सामने भी चुनौती है कि वे मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपने राजनीतिक आधार और प्रतिनिधित्व को लेकर उठ रहे सवालों का किस तरह जवाब देती हैं।
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ओवैसी 2027 के चुनाव में उत्तर प्रदेश की राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित कर पाएंगे। वर्ष 2022 में AIMIM का चुनावी प्रदर्शन कमजोर रहा था और पार्टी को अपनी जमीनी ताकत साबित करनी होगी।
फिलहाल इतना तय है कि उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व, विपक्षी एकता और AIMIM की भूमिका बड़े चुनावी मुद्दे बनते जा रहे हैं। अब देखना होगा कि ओवैसी का ‘अब्दुल दरी नहीं बिछाएगा’ वाला नारा चुनावी मैदान में कितना असर दिखाता है और योगी आदित्यनाथ का यह हमला भाजपा के चुनावी समीकरणों को कितनी मजबूती देता है।
Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath has launched a sharp attack on AIMIM chief Asaduddin Owaisi over his recent statement urging Muslims in Uttar Pradesh to strengthen their political identity. The controversy surrounding Owaisi’s Abdul Dari remark has intensified political discussions ahead of the UP Assembly Election 2027. The latest developments highlight the growing political competition between BJP, Samajwadi Party, Congress and AIMIM over Muslim voters, political representation and electoral strategies in Uttar Pradesh.



















