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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 49 साल पहले ₹300 की रिश्वत लेने वाले लेखपाल की सजा बरकरार, 41 साल पुरानी अपील खारिज!

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 49 साल बाद भी नहीं मिली राहत, ₹300 की रिश्वत लेने वाले लेखपाल की सजा बरकरार

AIN NEWS 1 प्रयागराज: भ्रष्टाचार के मामलों में समय बीत जाने को राहत का आधार नहीं माना जा सकता। इसी सिद्धांत को दोहराते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगभग 49 वर्ष पुराने रिश्वतखोरी के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने 41 साल से लंबित आपराधिक अपील को खारिज करते हुए चकबंदी विभाग के एक लेखपाल की दोषसिद्धि और एक वर्ष के कारावास की सजा को बरकरार रखा है।

यह फैसला इस बात का स्पष्ट संदेश देता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में न्याय मिलने में भले ही वर्षों लग जाएं, लेकिन दोषी को कानून के दायरे से बाहर नहीं माना जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 1977 का है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसकी भूमि से जुड़े चकबंदी कार्य को पूरा करने के बदले संबंधित लेखपाल ने ₹300 की रिश्वत मांगी थी। शिकायत मिलने के बाद विजिलेंस विभाग ने योजना बनाकर ट्रैप कार्रवाई की।

शिकायतकर्ता को पहले से चिन्हित नोट दिए गए और जैसे ही उसने आरोपी लेखपाल को रिश्वत की रकम सौंपी, विजिलेंस टीम ने मौके पर छापा मारकर उसे रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया। जांच में रिश्वत लेने के पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।

निचली अदालत ने सुनाई थी सजा

साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने लेखपाल को दोषी करार देते हुए एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष रिश्वत लेने के आरोप को संदेह से परे साबित करने में सफल रहा।

सजा के खिलाफ आरोपी ने वर्ष 1985 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की थी। इसके बाद यह मामला चार दशकों से अधिक समय तक न्यायालय में लंबित रहा।

41 साल बाद हाईकोर्ट का फैसला

लंबी सुनवाई के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर दी। न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि उपलब्ध साक्ष्य और रिकॉर्ड यह साबित करते हैं कि आरोपी ने रिश्वत ली थी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए किसी दोषी को राहत नहीं दी जा सकती क्योंकि मुकदमे के निस्तारण में कई दशक बीत चुके हैं। यदि दोषसिद्धि साक्ष्यों पर आधारित है, तो न्यायिक प्रक्रिया अपना परिणाम अवश्य देगी।

अदालत का सख्त संदेश

इस फैसले को भ्रष्टाचार के विरुद्ध न्यायपालिका के सख्त रुख के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया कि सरकारी पद पर बैठे किसी भी कर्मचारी द्वारा रिश्वत लेना गंभीर अपराध है और ऐसे मामलों में समय बीत जाना सजा से बचने का आधार नहीं बन सकता।

कानूनी जानकारों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में लंबित भ्रष्टाचार मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।

क्यों है यह फैसला खास?

लगभग 49 वर्ष पुराने मामले में अंतिम फैसला आया।

41 वर्ष से लंबित आपराधिक अपील खारिज हुई।

₹300 जैसी छोटी राशि का मामला होने के बावजूद अदालत ने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

भ्रष्टाचार के खिलाफ न्यायपालिका के सख्त रुख को मजबूती मिली।

सरकारी कर्मचारियों के लिए स्पष्ट संदेश कि रिश्वतखोरी का अपराध समय के साथ समाप्त नहीं होता।

न्याय व्यवस्था पर बढ़ेगा भरोसा

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण संदेश है जो मानते हैं कि लंबे समय तक मुकदमा चलने से सजा से बचा जा सकता है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन यदि अपराध सिद्ध है तो दोषी को कानून के अनुसार दंड भुगतना ही होगा।

यह निर्णय न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।

The Allahabad High Court has upheld the conviction of a consolidation lekhpal who was caught accepting a Rs 300 bribe nearly five decades ago, dismissing his 41-year-old criminal appeal. The judgment reinforces the judiciary’s commitment to fighting corruption irrespective of the passage of time. The case, originating in 1977, highlights that public servants found guilty of bribery can still be held accountable even after decades of legal proceedings, making it a landmark corruption verdict in Uttar Pradesh.

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