AIN NEWS 1: अजरबैजान में स्कूलों के ड्रेस कोड में किए गए बदलाव के बाद हिजाब पहनने को लेकर विवाद गहरा गया है। मुस्लिम बहुल इस देश में नए नियमों के विरोध में छात्राओं ने कक्षाओं का बहिष्कार किया है। कुछ स्कूलों में हिजाब पहनकर पहुंचीं छात्राओं और शिक्षकों को प्रवेश नहीं दिए जाने की खबरें सामने आई हैं। इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर भी विरोध हो रहा है, जबकि पड़ोसी देश तुर्किये के इस्तांबुल में भी प्रदर्शन किए गए हैं।
इस विवाद ने एक बार फिर धार्मिक स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था और स्कूलों में ड्रेस कोड की सीमाओं पर बहस छेड़ दी है। अजरबैजान की आबादी में लगभग 96 प्रतिशत लोग मुस्लिम हैं, लेकिन देश का संविधान उसे धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित करता है। सरकार की ओर से ड्रेस कोड में बदलाव को इसी व्यवस्था से जोड़कर देखा जा रहा है।
अल जजीरा की 12 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार के नए नियमों के बाद कुछ स्कूलों में हिजाब पहनने वाली छात्राओं और शिक्षकों को कक्षाओं में जाने से रोका गया। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि नियमों में हिजाब पर सीधे नाम लेकर प्रतिबंध लगाने के बजाय ऐसे कपड़ों पर रोक की बात कही गई है, जिन्हें अधिकारियों ने धर्मनिरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था के अनुरूप नहीं माना है।
क्या है अजरबैजान में हिजाब विवाद?
अजरबैजान में स्कूलों की वर्दी और पहनावे से संबंधित नियमों में बदलाव को लेकर सितंबर 2026 से विवाद शुरू हुआ। रिपोर्टों के मुताबिक, 21 सितंबर को मंत्रिपरिषद ने स्कूल ड्रेस कोड से जुड़े संशोधनों को मंजूरी दी थी। सरकार का तर्क है कि सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था में धर्मनिरपेक्षता बनाए रखना और विद्यार्थियों के लिए निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है।
नए नियमों को लागू किए जाने के बाद कुछ स्कूलों में हिजाब पहनकर पहुंचने वाली छात्राओं और शिक्षकों को परेशानी का सामना करना पड़ा। स्थानीय मीडिया की खबरों के मुताबिक, कुछ छात्राओं को स्कूल में प्रवेश नहीं दिया गया। इसके बाद छात्राओं और उनके समर्थन में खड़े लोगों ने फैसले का विरोध शुरू कर दिया।
विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि सरकार ड्रेस कोड को धार्मिक पहचान से अलग एक समान व्यवस्था के रूप में देख रही है, जबकि विरोध करने वालों का कहना है कि हिजाब पहनना उनकी धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है।
फिलहाल, उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर इसे स्कूलों में हिजाब को लेकर लागू किए जा रहे प्रतिबंध के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, नियमों की वास्तविक भाषा और अलग-अलग स्कूलों में उनके क्रियान्वयन के बीच अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है।
96 प्रतिशत मुस्लिम आबादी, फिर भी धर्मनिरपेक्ष देश क्यों?
अजरबैजान दक्षिण काकेशस क्षेत्र में स्थित एक देश है। यहां की अधिकांश आबादी मुस्लिम है। देश में शिया मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, जबकि सुन्नी मुस्लिम समुदाय भी मौजूद है।
इसके बावजूद अजरबैजान की शासन व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर आधारित है। देश के संविधान के अनुच्छेद 7 में अजरबैजान को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बताया गया है। वहीं, अनुच्छेद 18 में धर्म और राज्य को अलग रखने तथा सरकारी शिक्षा व्यवस्था के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का उल्लेख है।
संविधान का अनुच्छेद 48 नागरिकों को अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार भी देता है। इसके तहत लोग अपने धर्म को मान सकते हैं, उसका पालन कर सकते हैं या किसी धर्म को न मानने का फैसला कर सकते हैं।
यही वजह है कि मौजूदा विवाद में दो अलग-अलग पक्ष सामने आए हैं। सरकार स्कूलों में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा और निर्धारित वर्दी के नियमों को प्राथमिकता दे रही है। वहीं, विरोध करने वाले लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि किसी छात्रा का हिजाब उसकी धार्मिक आस्था का हिस्सा है, तो उसे इसके कारण शिक्षा से दूर क्यों रखा जाए?
इस तरह विवाद केवल कपड़ों तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में धार्मिक स्वतंत्रता, शिक्षा तक पहुंच और सरकारी संस्थानों में धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या जैसे सवाल भी हैं।
छात्राओं ने कक्षाओं का बहिष्कार किया, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल
नए नियमों के विरोध में अजरबैजान के कुछ स्कूलों में छात्राओं ने कक्षाओं का बहिष्कार किया। अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय मीडिया ने कम से कम दो स्कूलों में विद्यार्थियों के क्लास का बहिष्कार करने की जानकारी दी है।
सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ वीडियो में स्कूल के बाहर छात्राओं और शिक्षकों के भावुक होने के दृश्य दिखाई देने की बात कही गई है। कुछ वीडियो में छात्राएं अपनी शिक्षिकाओं से गले मिलती और रोती नजर आती हैं। इन दृश्यों को लेकर भी ऑनलाइन बहस तेज हुई है।
हालांकि, सोशल मीडिया पर प्रसारित हर वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि होना जरूरी है। इसलिए इन वीडियो के आधार पर पूरे देश के सभी स्कूलों की स्थिति का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
विरोध करने वालों की मांग है कि हिजाब पहनने वाली छात्राओं को शिक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि स्कूल के नियमों और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच ऐसा रास्ता निकाला जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो।
शिक्षिका जहरा हसानोवा ने भी उठाए सवाल
इस विवाद में शिक्षिका जहरा हसानोवा का बयान भी चर्चा में है। अल जजीरा को दिए गए बयान में उन्होंने बताया कि उन्हें स्कूल में हिजाब पहनकर आने की अनुमति नहीं होने की जानकारी दी गई।
हसानोवा का कहना था कि हिजाब पहनना व्यक्तिगत फैसला है और किसी व्यक्ति को इसे पहनने या उतारने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
उनका मामला इस बहस को और व्यापक बनाता है। जहां छात्राओं के लिए शिक्षा का अधिकार महत्वपूर्ण है, वहीं शिक्षकों के मामले में धार्मिक स्वतंत्रता और कार्यस्थल के नियमों के बीच संतुलन का सवाल भी उठता है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित अधिकारी नए ड्रेस कोड को किस तरह लागू करते हैं और क्या इस विवाद को सुलझाने के लिए कोई स्पष्टीकरण या संशोधन सामने आता है।
जेल में बंद पत्रकार पोलाद असलानोव ने शुरू की भूख हड़ताल
हिजाब विवाद का विरोध केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रहा। जेल में बंद पत्रकार पोलाद असलानोव ने भी नए नियमों के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू करने की घोषणा की है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, असलानोव को 2020 में देशद्रोह के मामले में दोषी ठहराया गया था। उन्हें लंबी अवधि की जेल की सजा सुनाई गई है। रिपोर्ट में उनकी सजा 113 वर्ष बताई गई है।
उनकी पत्नी गुलमिरा असलानोवा के फेसबुक अकाउंट पर साझा किए गए संदेश में असलानोव ने कहा कि जेल में रहते हुए भी वह संवैधानिक अधिकारों के कथित उल्लंघन के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने भूख हड़ताल को विरोध का माध्यम बताया।
यह घटनाक्रम दिखाता है कि स्कूल ड्रेस कोड से शुरू हुआ विवाद अब धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों से जुड़े व्यापक मुद्दे के रूप में भी उठाया जा रहा है।
हालांकि, असलानोव के पुराने मामले और मौजूदा हिजाब विवाद को अलग-अलग संदर्भों में समझना चाहिए। उनके खिलाफ पुराने मामले के आरोप और सजा अपने आप में स्कूलों के नए नियमों की वैधता का प्रमाण नहीं हैं।
इंटरनेट बंद होने की खबरों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं
अजरबैजान में इस विवाद के बीच इंटरनेट सेवाएं बंद किए जाने की खबरें भी सामने आईं। हालांकि, इंटरनेट पर निगरानी रखने वाले संगठनों की ओर से इन खबरों की पुष्टि नहीं होने की बात अल जजीरा की रिपोर्ट में कही गई है।
इसलिए यह दावा करना कि सरकार ने हिजाब विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए देशभर में इंटरनेट बंद कर दिया है, उपलब्ध जानकारी के आधार पर उचित नहीं होगा।
डिजिटल दौर में सोशल मीडिया विरोध प्रदर्शनों की तस्वीरें और वीडियो लोगों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है। ऐसे में इंटरनेट बंद होने से संबंधित दावों की पुष्टि स्वतंत्र तकनीकी निगरानी और विश्वसनीय रिपोर्टों से होना जरूरी है।
तुर्किये के इस्तांबुल में भी हुआ विरोध प्रदर्शन
अजरबैजान के स्कूलों में हिजाब को लेकर शुरू हुआ विवाद पड़ोसी देश तुर्किये तक पहुंच गया है। रिपोर्टों के मुताबिक, इस्तांबुल में अजरबैजान के वाणिज्य दूतावास के बाहर लोगों ने प्रदर्शन किया और सरकार से नए नियमों पर दोबारा विचार करने की मांग की।
तुर्किये में हिजाब का मुद्दा ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील रहा है। वहां 1990 के दशक और उसके बाद के वर्षों में सार्वजनिक संस्थानों तथा विश्वविद्यालयों में हिजाब पहनने को लेकर विवाद हुए थे। उस दौर में धार्मिक पहनावे पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक और सामाजिक बहस चली।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण तुर्किये में कुछ प्रदर्शनकारियों ने अजरबैजान के नए नियमों की तुलना पुराने प्रतिबंधों से की है।
हालांकि, दोनों देशों की कानूनी व्यवस्था, राजनीतिक परिस्थितियों और स्कूलों के नियमों में अंतर है। इसलिए दोनों घटनाओं को पूरी तरह समान मानने के बजाय उनके अलग-अलग संदर्भों को समझना जरूरी है।
राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव का बयान भी चर्चा में
अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने अपनी पार्टी की बैठक में कहा कि किसी को भी उनके देश की जीवनशैली में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उन्होंने सीधे तौर पर तुर्किये का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान को मौजूदा विवाद और विदेश में हो रहे प्रदर्शनों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
यह बयान ऐसे समय आया है, जब ड्रेस कोड को लेकर देश के भीतर विरोध और बाहर आलोचना की खबरें सामने आ रही हैं।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार नए नियमों में किसी तरह की ढील देने, स्पष्टीकरण जारी करने या स्कूलों को अलग निर्देश देने पर विचार कर रही है या नहीं।
ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान में भी धार्मिक पहनावे पर नियम
मध्य एशिया के कुछ अन्य मुस्लिम बहुल देशों में भी धार्मिक पहनावे को लेकर नियम लागू हैं। हालांकि, इन देशों के कानून और प्रतिबंधों का दायरा एक जैसा नहीं है।
ताजिकिस्तान: वर्ष 2024 में राष्ट्रीय संस्कृति के अनुरूप पहनावे को लेकर प्रतिबंधों से जुड़ा कानून चर्चा में आया। धार्मिक परिधान और हिजाब को लेकर वहां पहले से बहस होती रही है।
कजाकिस्तान: सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की वर्दी के नियमों के तहत धार्मिक पहचान दर्शाने वाले कपड़ों पर पाबंदियां लागू हैं। स्कूलों में हिजाब पहनने को लेकर भी विवाद सामने आते रहे हैं।
उज्बेकिस्तान: सरकारी स्कूलों में निर्धारित वर्दी और धार्मिक पहनावे से जुड़े नियम हैं। इसे पूरे देश में हर सार्वजनिक स्थान पर हिजाब के पूर्ण प्रतिबंध के समान नहीं माना जाना चाहिए।
इन उदाहरणों से पता चलता है कि कुछ धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्थाएं स्कूलों में धार्मिक प्रतीकों को लेकर सख्त नियम लागू करती हैं। लेकिन हर देश के कानून, उनके क्रियान्वयन और नागरिकों के अधिकारों की स्थिति अलग-अलग है।
आगे क्या हो सकता है?
अजरबैजान में हिजाब विवाद का अगला चरण इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और शिक्षा अधिकारी नए ड्रेस कोड को लेकर क्या रुख अपनाते हैं। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि स्कूलों में प्रवेश से रोकी गई छात्राओं की पढ़ाई कैसे जारी रहती है और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवालों पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण दिया जाता है या नहीं।
एक ओर सरकार धर्मनिरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था और समान ड्रेस कोड की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर विरोध करने वाले लोग धार्मिक आस्था और शिक्षा के अधिकार को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं।
इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि स्कूलों में अनुशासन और एक समान वर्दी बनाए रखने के साथ विद्यार्थियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए।
अजरबैजान में फिलहाल विवाद जारी है। नए नियमों को लेकर सरकार की आगे की कार्रवाई, स्कूलों में उनके क्रियान्वयन और विरोध प्रदर्शनों की स्थिति पर नजर बनी हुई है।
Azerbaijan’s new school dress code has sparked controversy over hijab restrictions, with reports of hijab-wearing students and teachers being denied entry to some schools. The Azerbaijan hijab ban controversy has led to student class boycotts, public protests and demonstrations outside the Azerbaijani consulate in Istanbul, Turkey. The debate highlights the tension between secular education policies, religious freedom and students’ right to education in a Muslim-majority country. Follow the latest Azerbaijan hijab protests 2026, school uniform regulations, constitutional rights and regional reactions.



















