AIN NEWS 1 कोलकाता/पूर्व मेदिनीपुर: पश्चिम बंगाल में सरकारी जमीन से कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान निजी संपत्ति गिराए जाने के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने प्रशासन को कड़ा संदेश दिया है। कोर्ट ने माना कि संबंधित अधिकारियों ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की तय सीमा से आगे जाकर याचिकाकर्ताओं की संपत्ति को भी ध्वस्त कर दिया। अदालत ने इसे बिना वैध कानूनी अधिकार के की गई कार्रवाई माना है।
न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की एकल पीठ ने कबिता मन्ना और एक अन्य याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए 8 सितंबर 2026 को महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। अदालत ने संबंधित प्राधिकरण को ध्वस्त की गई दो मंजिला व्यावसायिक इमारत को दोबारा बनाने, निर्माण पूरा होने तक याचिकाकर्ताओं को मुफ्त वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने और 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

क्या है पूरा मामला?
यह विवाद पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के नाइकुरी जगन्नाथचक इलाके से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, उनकी जमीन LR Plot No. 650 पर स्थित थी और वहां ग्राम पंचायत से स्वीकृत नक्शे के आधार पर दो मंजिला व्यावसायिक भवन बनाया गया था।
इस भवन में दूसरे याचिकाकर्ता का व्यावसायिक काम भी संचालित होता था। बाद में आसपास की सरकारी/PWD जमीन और सड़क की जमीन पर कथित अतिक्रमण को हटाने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई शुरू हुई।
मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और अधिकारियों को सरकारी जमीन पर यदि अवैध अतिक्रमण पाया जाए तो नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए। इसके बाद जमीन की सीमा तय करने के लिए दोबारा पैमाइश और निरीक्षण कराया गया।
सरकारी जमीन के अतिक्रमण से शुरू हुआ विवाद
मामले की पृष्ठभूमि 2024 तक जाती है। अगस्त 2024 में हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ ने अधिकारियों से कहा था कि यदि PWD सड़क की जमीन पर अवैध अतिक्रमण पाया जाता है तो कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की जाए।
इसके बाद संबंधित कार्यपालक अभियंता ने सरकारी जमीन की दोबारा सीमा-निर्धारण प्रक्रिया शुरू कराई। राजस्व निरीक्षक ने 10 सितंबर 2024 को निरीक्षण कर रिपोर्ट और नक्शा तैयार किया।
इसके बाद 17 मार्च 2025 को एक और फील्ड जांच रिपोर्ट और स्केच मैप तैयार किया गया। रिकॉर्ड में संबंधित भूखंडों की स्थिति और सरकारी जमीन पर बताए गए अतिक्रमण को दर्शाया गया था।
प्रशासन ने इसके आधार पर West Bengal Highways Act, 1964 की धारा 10 के तहत अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
याचिकाकर्ताओं ने क्या आरोप लगाया?
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने के नाम पर शुरू हुई कार्रवाई उनकी निजी जमीन तक पहुंच गई।
उनका दावा था कि उनका भवन LR Plot No. 650 पर बना था और उसके निर्माण के लिए स्थानीय ग्राम पंचायत से स्वीकृत नक्शा मौजूद था। इसके बावजूद प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान उनके दो मंजिला व्यावसायिक भवन को भी गिरा दिया।
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में मांग की कि इस कार्रवाई को गैरकानूनी घोषित किया जाए, ध्वस्त इमारत का पुनर्निर्माण कराया जाए और उन्हें उचित मुआवजा दिया जाए।
पहले भी हाईकोर्ट पहुंचा था मामला
इस विवाद को लेकर याचिकाकर्ताओं ने पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मार्च 2025 में उन्हें अंतरिम राहत मिली थी और संबंधित कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाई गई थी।
इसके बाद मामला डिवीजन बेंच तक भी पहुंचा। 19 मई 2025 को डिवीजन बेंच के सामने राज्य की ओर से यह बताया गया कि सरकारी भूखंड पर मौजूद अनधिकृत निर्माण को ध्वस्त किया गया था।
हालांकि याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कार्रवाई केवल सरकारी जमीन तक सीमित नहीं रही और उनकी निजी संपत्ति भी इसकी चपेट में आ गई। डिवीजन बेंच ने उन्हें कथित अतिरिक्त/सीमा से अधिक की गई तोड़फोड़ के संबंध में उचित कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी। इसके बाद वर्तमान याचिका सामने आई।
कोर्ट ने रिकॉर्ड और नक्शों की जांच की
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने राजस्व विभाग की रिपोर्ट, स्केच मैप और तोड़फोड़ की कार्रवाई से संबंधित रिकॉर्ड की जांच की।
कोर्ट के सामने यह सवाल था कि क्या प्रशासन ने सिर्फ सरकारी जमीन पर मौजूद कथित अतिक्रमण को हटाया या कार्रवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं की निजी जमीन पर बने भवन को भी गिरा दिया।
अदालत ने माना कि उपलब्ध दस्तावेज और रिकॉर्ड इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्त हैं कि अधिकारियों ने अपनी निर्धारित सीमा से आगे जाकर याचिकाकर्ताओं के निर्माण को भी ध्वस्त किया।
कोर्ट ने कहा कि सामान्य तौर पर रिट अदालत विवादित तथ्यों की जांच ट्रायल कोर्ट की तरह नहीं करती। लेकिन अगर दस्तावेज और उपलब्ध सामग्री किसी तथ्य को पर्याप्त रूप से स्पष्ट करती है, तो हाईकोर्ट उस आधार पर फैसला कर सकता है। इस मामले में अदालत ने इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला दिया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन ने अपने 8 सितंबर के आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद पर्याप्त सामग्री से यह निष्कर्ष निकलता है कि संबंधित अधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं की संपत्ति को गिराकर अपनी सीमा पार की।
अदालत के अनुसार, याचिकाकर्ताओं की संपत्ति को बिना किसी वैध कानूनी अधिकार के ध्वस्त किया गया।
इसी निष्कर्ष के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए प्रभावित परिवार को कई स्तरों पर राहत देने के निर्देश दिए।
सरकार को अपने खर्च पर बनानी होगी नई इमारत
कोर्ट ने संबंधित प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ताओं के लिए नई दो मंजिला इमारत का निर्माण कराया जाए।
नई इमारत याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट में पेश किए गए स्वीकृत नक्शे (sanctioned plan) के अनुसार बनाई जानी है।
अदालत ने निर्माण के लिए दो साल की समय-सीमा तय की है। यह समय सीमा फैसले की सर्वर कॉपी संबंधित प्राधिकरण को उपलब्ध/प्रेषित होने की तारीख से लागू होगी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भवन का निर्माण पूरा करने और उसका कब्जा याचिकाकर्ताओं को देने की समय-सीमा अनिवार्य है।
नई इमारत बनने तक मुफ्त वैकल्पिक आवास
हाईकोर्ट ने केवल नया भवन बनाने का आदेश देकर मामला खत्म नहीं किया। अदालत ने कहा कि जब तक नई इमारत तैयार नहीं हो जाती और उसका कब्जा याचिकाकर्ताओं को नहीं सौंप दिया जाता, तब तक संबंधित प्राधिकरण को उन्हें बिना किसी शुल्क के वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराना होगा।
अदालत ने कहा कि यदि संभव हो तो वैकल्पिक आवास उसी इलाके में उपलब्ध कराया जाए, ताकि प्रभावित लोगों को अपने मौजूदा क्षेत्र और कामकाज से पूरी तरह अलग न होना पड़े।
₹10 लाख मुआवजा भी देना होगा
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के लिए 10 लाख रुपये का मुआवजा भी मंजूर किया है।
यह राशि दो बराबर किस्तों में दी जाएगी।
पहली 5 लाख रुपये की किस्त 31 अक्टूबर 2026 तक और दूसरी 5 लाख रुपये की किस्त 28 फरवरी 2027 तक देने का निर्देश दिया गया है।
इस तरह अदालत के आदेश में तीन प्रमुख राहतें शामिल हैं—ध्वस्त भवन का पुनर्निर्माण, निर्माण पूरा होने तक मुफ्त वैकल्पिक आवास और 10 लाख रुपये का मुआवजा।
प्रशासनिक कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण संदेश
कलकत्ता हाईकोर्ट का यह आदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई और निजी संपत्ति की सुरक्षा के बीच सीमा को स्पष्ट किया गया है।
सरकारी जमीन से अवैध कब्जा हटाने का अधिकार प्रशासन को कानून के तहत प्राप्त हो सकता है, लेकिन अदालत ने इस मामले में यह स्पष्ट किया कि कार्रवाई उसी सीमा तक होनी चाहिए, जिसकी कानूनी अनुमति है।
यदि कार्रवाई के दौरान किसी ऐसी संपत्ति को नुकसान पहुंचता है जो कार्रवाई के दायरे में नहीं थी, तो प्रशासन को उसके परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।
इस मामले में कोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर माना कि कार्रवाई सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण हटाने से आगे बढ़कर याचिकाकर्ताओं के LR Plot No. 650 पर बने निर्माण तक पहुंच गई थी।
आगे क्या होगा?
अब संबंधित प्राधिकरण को अदालत के आदेश के अनुसार नया भवन तैयार करना होगा। निर्माण के लिए दो वर्ष की अनिवार्य समय-सीमा निर्धारित की गई है।
इस दौरान याचिकाकर्ताओं को मुफ्त वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराया जाना है। इसके साथ ही निर्धारित समयसीमा के भीतर 10 लाख रुपये का मुआवजा भी देना होगा।
यह फैसला Kabita Manna & Anr. vs State of West Bengal & Ors., WPA/22289/2025 मामले में आया है और इसकी तारीख 8 सितंबर 2026 है।
कुल मिलाकर, सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान निजी व्यावसायिक भवन गिराए जाने के इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने प्रशासन को न केवल भवन दोबारा बनाने का आदेश दिया है, बल्कि प्रभावित याचिकाकर्ताओं को तब तक मुफ्त वैकल्पिक आवास और 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। यह आदेश प्रशासनिक कार्रवाई में कानूनी सीमा और नागरिकों की संपत्ति के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देता है।
The Calcutta High Court has ordered West Bengal authorities to rebuild a two-storey commercial building allegedly demolished beyond the permitted limits of an anti-encroachment drive in Purba Medinipur. In the Kabita Manna case, Justice Partha Sarathi Sen directed the concerned authority to reconstruct the property according to the sanctioned plan, provide free alternative accommodation until possession is handed over, and pay Rs 10 lakh compensation in two instalments. The judgment highlights the legal limits of government demolition drives and protection of private property rights.



















