AIN NEWS 1 नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। 10 और 11 अक्टूबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के दौरान कई पत्रकारों को पुलिस ने हिरासत में लिया। कुछ पत्रकारों ने आरोप लगाया कि उनके पास प्रेस पहचान पत्र होने के बावजूद उन्हें रिपोर्टिंग करने से रोका गया और पुलिस वाहनों में बैठाकर दूसरी जगह ले जाया गया।
इस घटना के बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया समेत कई पत्रकार संगठनों ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर चिंता जताई है। पत्रकार संगठनों ने मामले की निष्पक्ष जांच कराने, हिरासत में लिए गए पत्रकारों के साथ हुए व्यवहार की समीक्षा करने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।
विरोध प्रदर्शन की कवरेज के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लेने का आरोप
दिल्ली में 10 अक्टूबर को कॉकroach जनता पार्टी (CJP) आंदोलन और अन्य संगठनों से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के पीछे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर उठाए गए सवाल भी शामिल थे।
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। हालांकि, चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में हेरफेर के आरोपों को खारिज किया है। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर बहस जारी है।
प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने कई स्थानों पर लोगों को हिरासत में लिया। घटनास्थल पर मौजूद पत्रकार भी पुलिस कार्रवाई की रिपोर्टिंग कर रहे थे। इसी दौरान कई पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई।
रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ पत्रकारों ने पुलिस को अपना प्रेस कार्ड दिखाया और बताया कि वे समाचार संकलन के लिए मौके पर मौजूद हैं। इसके बावजूद उन्हें पुलिस बसों में बैठाया गया। पत्रकारों का कहना है कि इससे उनकी रिपोर्टिंग प्रभावित हुई और घटनास्थल पर हो रही कार्रवाई को स्वतंत्र रूप से दर्ज करने में परेशानी आई।
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया समेत चार संगठनों ने जताई चिंता
पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने के बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI), इंडियन विमेन्स प्रेस कॉर्प्स (IWPC), दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (DUJ) और केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की दिल्ली इकाई ने संयुक्त रूप से चिंता जताई।
पत्रकार संगठनों ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि सार्वजनिक घटनाओं की रिपोर्टिंग करना पत्रकारों का पेशेवर दायित्व है। यदि पत्रकारों को केवल इसलिए हिरासत में लिया जाता है कि वे पुलिस की कार्रवाई या प्रदर्शन को रिकॉर्ड कर रहे हैं, तो यह मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
संगठनों के अनुसार, कुछ पत्रकारों के मोबाइल फोन और रिपोर्टिंग उपकरण भी लिए जाने की शिकायत सामने आई। पत्रकारों ने यह भी आरोप लगाया कि उनके साथ अनुचित व्यवहार किया गया और उन्हें बिना स्पष्ट कारण बताए हिरासत में रखा गया।
पत्रकार संगठनों ने संबंधित अधिकारियों से घटना की जांच करने, कथित दुर्व्यवहार के लिए जिम्मेदारी तय करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उचित कदम उठाने की मांग की है।
दूसरे दिन भी सामने आई पत्रकारों की हिरासत की घटनाएं
11 अक्टूबर को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन से जुड़ी रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की शिकायतें फिर सामने आईं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उसके हिंदी संस्करण से जुड़े तीन पत्रकारों को दिल्ली के चेल्म्सफोर्ड रोड इलाके में पुलिस ने हिरासत में लिया था। पत्रकारों ने बताया कि उन्होंने अपनी पहचान बताई और प्रेस कार्ड भी दिखाए, लेकिन उन्हें पुलिस बस में बैठने के लिए कहा गया। लगभग 45 मिनट बाद उन्हें छोड़ दिया गया।
अन्य समाचार संस्थानों और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े पत्रकारों को भी अलग-अलग स्थानों पर हिरासत में लिए जाने की खबरें आईं। कुछ पत्रकारों ने आरोप लगाया कि उन्हें घटनास्थल से दूर ले जाया गया, जिससे उनके लिए रिपोर्टिंग जारी रखना मुश्किल हो गया।
कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) ने 12 अक्टूबर को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में बताया कि 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में कम से कम 35 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया। संगठन के अनुसार, अहमदाबाद और पुणे में विरोध प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान दो अन्य पत्रकार भी हिरासत में लिए गए।
यह संख्या अलग-अलग घटनाओं और रिपोर्टों पर आधारित है। हिरासत में लिए गए सभी पत्रकारों की संख्या और प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को लेकर संबंधित अधिकारियों का विस्तृत आधिकारिक विवरण सामने आना अभी महत्वपूर्ण है।
पत्रकारों ने लगाए धक्का-मुक्की और उपकरण लेने के आरोप
कुछ पत्रकारों ने पुलिस कार्रवाई के दौरान धक्का-मुक्की किए जाने और उनके मोबाइल फोन या अन्य रिपोर्टिंग उपकरण लिए जाने की शिकायत की है। कुछ मामलों में पत्रकारों ने आरोप लगाया कि उन्हें रिकॉर्ड किए गए वीडियो हटाने के लिए भी दबाव का सामना करना पड़ा।
डिजिटल समाचार संस्थान न्यूजलॉन्ड्री के पत्रकार अनमोल प्रीतम ने रॉयटर्स को बताया कि वह हिरासत में लिए गए लोगों से बातचीत कर रहे थे, तभी पुलिसकर्मी ने कथित तौर पर उनका माइक्रोफोन पकड़ लिया। उनके मुताबिक, उन्हें खींचकर ले जाया गया और उनका फोन भी ले लिया गया। उन्होंने बताया कि 10 अक्टूबर को उन्हें लगभग तीन घंटे तक हिरासत में रखा गया।
ये आरोप संबंधित पत्रकारों और समाचार संगठनों के बयानों पर आधारित हैं। दिल्ली पुलिस की ओर से इन सभी व्यक्तिगत शिकायतों पर विस्तृत जवाब सामने आना जरूरी है, ताकि घटनाओं की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सके।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी उठे सवाल
पत्रकारों और वकीलों के काम में बाधा डालने तथा प्रदर्शनकारियों की हिरासत को लेकर कानूनी स्तर पर भी मामला उठा। 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में सुनवाई हुई। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने पत्रकारों और वकीलों को अपना काम करने से नहीं रोकने के संबंध में निर्देश दिए।
हालांकि, कुछ पत्रकारों ने दावा किया कि अदालत के आदेश के बाद भी हिरासत की घटनाएं हुईं। इस कारण पुलिस की कार्रवाई और अदालत के निर्देशों के अनुपालन को लेकर सवाल उठे।
इस मामले में आदेश के सटीक दायरे, संबंधित अधिकारियों को उसकी जानकारी मिलने और उसके बाद हुई घटनाओं का अलग-अलग सत्यापन जरूरी है। किसी आदेश के उल्लंघन का अंतिम निष्कर्ष तथ्यों और कानूनी जांच के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
क्या केवल PIB मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही रिपोर्टिंग की अनुमति है?
इस विवाद में पत्रकारों की पहचान और रिपोर्टिंग की अनुमति का सवाल भी चर्चा में है। कुछ पत्रकार संगठनों ने इस कथित आग्रह पर आपत्ति जताई कि प्रदर्शन की कवरेज के लिए केवल प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) से मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही अनुमति दी जानी चाहिए।
देश में अनेक पत्रकार डिजिटल मीडिया संस्थानों, स्वतंत्र समाचार पोर्टलों, स्थानीय समाचार पत्रों और क्षेत्रीय चैनलों के लिए काम करते हैं। इन सभी के पास PIB मान्यता होना जरूरी नहीं है। हालांकि, किसी विशेष क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था या प्रवेश संबंधी वैध प्रतिबंध लागू हो सकते हैं।
इसलिए किसी पत्रकार की पहचान, उसकी रिपोर्टिंग का उद्देश्य और मौके पर लागू नियमों को ध्यान में रखकर कार्रवाई की जानी चाहिए। केवल प्रेस कार्ड होने या न होने के आधार पर किसी घटना के सभी पहलुओं का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
प्रेस की स्वतंत्रता और पुलिस की जवाबदेही पर बहस
पत्रकारों की हिरासत की इन घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने और मीडिया को स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने देने के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए।
पुलिस की जिम्मेदारी सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और कानून के अनुसार कार्रवाई करना है। वहीं, पत्रकारों की भूमिका घटनाओं की जानकारी जुटाकर उसे जनता तक पहुंचाना है। दोनों जिम्मेदारियों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होने पर पारदर्शिता, संयम और जवाबदेही बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
पत्रकार संगठनों ने मांग की है कि हिरासत की घटनाओं की निष्पक्ष जांच हो और जिन पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार या उपकरण छीने जाने की शिकायतें हैं, उनकी शिकायतों पर कार्रवाई की जाए। दूसरी ओर, पुलिस की ओर से घटनाओं के संबंध में विस्तृत स्पष्टीकरण आने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन परिस्थितियों में पत्रकारों को हिरासत में लिया गया था।
क्या है अब तक का निष्कर्ष?
10 और 11 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं की पुष्टि कई समाचार रिपोर्टों से होती है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया समेत चार पत्रकार संगठनों ने इस कार्रवाई की आलोचना करते हुए जांच और जवाबदेही की मांग की है। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स ने भी पत्रकारों की हिरासत और उनके साथ कथित दुर्व्यवहार पर चिंता जताई है।
हालांकि, प्रत्येक मामले में पुलिस की कार्रवाई का कारण, हिरासत की अवधि और शिकायतों पर अधिकारियों का पक्ष सामने आना आवश्यक है। पूरे मामले में निष्पक्ष जांच और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई से ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
पत्रकारों की सुरक्षा, मीडिया की स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था से जुड़े इस विवाद पर अब सभी की नजर संबंधित अधिकारियों की प्रतिक्रिया और आगे होने वाली जांच पर निर्भर है.
Delhi journalists were detained while covering protests on October 10 and 11, 2026, raising concerns about press freedom and journalist safety in India. The Press Club of India, Indian Women’s Press Corps, Delhi Union of Journalists, and Kerala Union of Working Journalists’ Delhi unit criticized the reported police action and called for an impartial inquiry. The incidents involved allegations of journalists being detained despite showing press cards, along with claims of mobile phones and reporting equipment being seized. The controversy has renewed debate over media freedom, police accountability, journalists’ rights, and the importance of protecting independent reporting during public protests.



















