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गाजियाबाद पुलिस मुख्यालय पर पत्रकारों का बड़ा आंदोलन: 5 दिन में निष्पक्ष जांच का आश्वासन, अपूर्वा चौधरी ने स्थगित किया आमरण अनशन!

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गाजियाबाद पुलिस मुख्यालय पर पत्रकारों का बड़ा प्रदर्शन, 5 दिन में निष्पक्ष जांच का भरोसा मिलने पर स्थगित हुआ अनशन

AIN NEWS 1 विशेष संवाददाता, गाजियाबाद:  गाजियाबाद में पत्रकारों और पुलिस प्रशासन के बीच चल रहा विवाद सोमवार को उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया जब बड़ी संख्या में पत्रकारों ने पुलिस मुख्यालय के बाहर धरना-प्रदर्शन और आमरण अनशन शुरू कर दिया। पत्रकारों का आरोप था कि उनके खिलाफ बिना निष्पक्ष जांच के मुकदमे दर्ज किए गए हैं और उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। हालांकि कई घंटों तक चले विरोध प्रदर्शन के बाद वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के हस्तक्षेप से मामला फिलहाल शांत हो गया है।

आंदोलन का नेतृत्व कर रहीं वरिष्ठ पत्रकार अपूर्वा चौधरी ने गाजियाबाद के एडिशनल पुलिस कमिश्नर केशव कुमार चौधरी द्वारा निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिए जाने के बाद अपना आमरण अनशन स्थगित कर दिया। प्रशासन ने पूरे मामले की जांच पूरी करने के लिए पांच दिन का समय मांगा है और भरोसा दिलाया है कि जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

सुबह से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन

सोमवार सुबह गाजियाबाद पुलिस मुख्यालय के बाहर पत्रकारों का जमावड़ा शुरू हो गया था। विभिन्न पत्रकार संगठनों से जुड़े लोगों ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए निष्पक्ष जांच और न्याय की मांग की। धरना स्थल पर मौजूद पत्रकारों का कहना था कि वे किसी विशेष व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि न्याय और पारदर्शिता की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।

धरने के दौरान अपूर्वा चौधरी ने कहा कि पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ हैं और कानून का सम्मान करते हैं। यदि किसी पत्रकार ने कोई अपराध किया है तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए, लेकिन बिना निष्पक्ष जांच के किसी को आरोपी बनाना और झूठे मुकदमों में फंसाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

उन्होंने कहा कि पत्रकारों को डराने या उनकी आवाज दबाने के लिए दर्ज किए गए कथित फर्जी मुकदमों को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पत्रकार समुदाय न्याय मिलने तक अपनी लड़ाई जारी रखेगा।

क्या है पूरा विवाद?

प्रदर्शनकारी पत्रकारों के अनुसार विवाद की शुरुआत एक महिला पत्रकार द्वारा की गई शिकायत से हुई थी। आरोप है कि महिला पत्रकार ने एक मामले में संबंधित पुलिस अधिकारियों को शिकायत दी थी, लेकिन उस पर समय रहते कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।

पत्रकारों का कहना है कि जब शिकायत के संबंध में जानकारी लेने और कार्रवाई की मांग करने के लिए पत्रकार प्रतिनिधिमंडल थाने और चौकी पहुंचा, तो वहां उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया। आरोप यह भी है कि बाद में पुलिस ने शिकायतकर्ताओं और उनके समर्थन में खड़े पत्रकारों के खिलाफ ही गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दिया।

इसी कार्रवाई के विरोध में पत्रकार संगठनों ने आंदोलन शुरू किया और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई।

वरिष्ठ अधिकारियों की चुप्पी पर उठे सवाल

धरने के दौरान पत्रकारों ने पुलिस प्रशासन के उच्च अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि मामले से जुड़े दस्तावेज, शिकायतें और अन्य साक्ष्य पहले ही वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाए जा चुके थे, लेकिन लंबे समय तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।

अपूर्वा चौधरी ने कहा कि न्याय पाने के लिए सभी संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया। अधिकारियों से मुलाकात की गई, ज्ञापन दिए गए और साक्ष्य सौंपे गए, लेकिन इसके बावजूद मामले में संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई। उनका कहना था कि प्रशासन की इसी चुप्पी ने पत्रकारों को आंदोलन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर किया।

पत्रकारों ने रखीं पांच प्रमुख मांगें

धरना स्थल पर पत्रकारों ने प्रशासन के सामने पांच प्रमुख मांगें रखीं।

पहली मांग यह थी कि पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मुकदमों की जांच किसी स्वतंत्र और वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में कराई जाए।

दूसरी मांग में कहा गया कि यदि जांच में पुलिस अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है या फर्जी मुकदमे दर्ज करने की पुष्टि होती है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाए।

तीसरी मांग महिला पत्रकार की मूल शिकायत पर त्वरित कार्रवाई और वास्तविक दोषियों की गिरफ्तारी से जुड़ी थी।

चौथी मांग के तहत पत्रकारों ने पुलिस द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे साक्ष्यों को सार्वजनिक करने की बात कही ताकि जांच प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे।

पांचवीं और महत्वपूर्ण मांग जिले में कार्यरत पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और स्वतंत्र कार्य वातावरण सुनिश्चित करने की थी।

एडिशनल कमिश्नर ने दिया भरोसा

धरना स्थल पर पहुंचे एडिशनल पुलिस कमिश्नर केशव कुमार चौधरी ने पत्रकार प्रतिनिधियों से विस्तार से बातचीत की। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में जिले में कई बड़ी आपराधिक घटनाएं हुई थीं, जिसके कारण पुलिस बल कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारियों में व्यस्त था। इसी वजह से इस मामले की जांच में अपेक्षा से अधिक समय लग गया।

उन्होंने पत्रकारों को भरोसा दिलाया कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से की जाएगी और किसी भी निर्दोष व्यक्ति को परेशान नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि तथ्यों और साक्ष्यों की गहन जांच के लिए पांच दिन का समय आवश्यक है।

अधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जांच में जो भी पक्ष दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ बिना किसी दबाव या पक्षपात के कार्रवाई की जाएगी।

आश्वासन के बाद स्थगित हुआ आंदोलन

वरिष्ठ अधिकारी के आश्वासन के बाद पत्रकारों ने आपसी सहमति से फिलहाल अपना धरना और आमरण अनशन पांच दिनों के लिए स्थगित करने का निर्णय लिया। अपूर्वा चौधरी ने मिठाई खाकर अपना अनशन समाप्त किया और कहा कि पत्रकार समुदाय प्रशासन को जांच पूरी करने का अवसर देना चाहता है।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि तय समय सीमा के भीतर निष्पक्ष जांच रिपोर्ट सामने नहीं आती या न्याय सुनिश्चित नहीं होता, तो आंदोलन दोबारा शुरू किया जाएगा।

कई जिलों के पत्रकारों ने दिखाई एकजुटता

इस आंदोलन में केवल गाजियाबाद ही नहीं बल्कि आसपास के कई जिलों के पत्रकारों ने भी भाग लिया। विभिन्न पत्रकार संगठनों के प्रतिनिधियों ने धरना स्थल पर पहुंचकर समर्थन व्यक्त किया और प्रेस की स्वतंत्रता तथा पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई।

आंदोलन में एक्टिव जर्नलिस्ट एसोसिएशन के पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में पत्रकार, छायाकार और डिजिटल मीडिया से जुड़े लोग मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि यह संघर्ष केवल एक एफआईआर का नहीं बल्कि पत्रकारों के सम्मान, सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का मुद्दा है।

अब पांच दिनों पर टिकी हैं निगाहें

फिलहाल गाजियाबाद में स्थिति सामान्य है, लेकिन पूरे मामले पर पत्रकार समुदाय और आम जनता की नजर बनी हुई है। अब सभी की निगाहें पुलिस प्रशासन द्वारा मांगे गए पांच दिनों के समय और उसके बाद सामने आने वाली जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं।

यदि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से पूरी होती है तो विवाद का समाधान निकल सकता है, लेकिन यदि पत्रकारों की मांगों की अनदेखी हुई तो आंदोलन दोबारा तेज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। आने वाले दिन इस पूरे मामले की दिशा तय करेंगे।

A major journalists’ protest erupted outside the Ghaziabad Police Headquarters over allegations of false FIRs, police misconduct, and harassment of media professionals. Journalist Apurva Chaudhary, who led the indefinite hunger strike, suspended her protest after receiving assurances from senior police officials regarding a transparent and fair investigation within five days. The incident has sparked a wider debate on press freedom, journalist safety, police accountability, and media rights in Uttar Pradesh and across India.

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